भारत 2047-48 तक 26 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर: Ernst & Young रिपोर्ट

अर्नस्ट एंड यंग (EY) की हालिया रिपोर्ट के अनुमानों के अनुसार, भारत ऐतिहासिक आर्थिक उपलब्धि की ओर लगातार अग्रसर है। 2047-48 तक, देश के 26 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने की उम्मीद है, जो समावेशी समृद्धि और वैश्विक आर्थिक नेतृत्व के प्रति भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण को दर्शाती है।

India on track to become a $26 trillion economy by 2047-48

भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति

  • समग्र आर्थिक परिदृश्य: वर्ष 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में भारत की अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। आधिकारिक आकलनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के अनुमानों के अनुसार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) चालू मूल्यों पर लगभग 4.1 से 4.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है। यह बीते दस वर्षों में अर्थव्यवस्था के आकार के लगभग दोगुना हो जाने को दर्शाती है। वर्ष 2015 में जहां भारत की अर्थव्यवस्था करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर की थी, वहीं 2025 तक यह 4.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गई है, जो दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती को दर्शाता है।
  • वैश्विक रैंकिंग और विकास दर: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने यह विस्तार लगभग 6.5% की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के साथ हासिल किया। इस निरंतर वृद्धि के परिणामस्वरूप भारत ने जापान को पीछे छोड़ते हुए नाममात्र जीडीपी के आधार पर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान प्राप्त किया है। वर्तमान में भारत से आगे केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और जर्मनी हैं। यह उपलब्धि भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति में बढ़ते प्रभाव को स्पष्ट करती है।
  • तिमाही प्रदर्शन और आर्थिक गति: तिमाही आंकड़े भी अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाते हैं। जुलाई–सितंबर 2025 की तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 8.2% रही, जो अधिकांश अर्थशास्त्रियों के अनुमानों से अधिक थी। यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि घरेलू मांग, उत्पादन गतिविधि और सेवा क्षेत्र ने मिलकर आर्थिक रफ्तार को बनाए रखा। निजी खपत और औद्योगिक गतिविधियों में निरंतरता ने विकास को स्थिर आधार प्रदान किया।
  • खपत आधारित विकास मॉडल: भारत की मौजूदा वृद्धि का प्रमुख आधार घरेलू खपत है। वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और अमेरिकी शुल्क नीतियों जैसी बाहरी चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत सुरक्षित रही। निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) में 7.9% की वृद्धि दर्ज की गई, जो दर्शाती है कि घरेलू परिवारों का खर्च मजबूत बना हुआ है।
  • द्वितीयक क्षेत्र की भूमिका: द्वितीयक क्षेत्र, जिसमें विनिर्माण और निर्माण गतिविधियां शामिल हैं, ने 8.1% की वृद्धि दर्ज की। विशेष रूप से विनिर्माण क्षेत्र में 9.1% की तेज वृद्धि देखने को मिली। यह औद्योगिक उत्पादन, निजी निवेश और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते खर्च का परिणाम है। बढ़ती फैक्ट्री गतिविधियां और निर्माण कार्य रोजगार सृजन और मांग विस्तार में योगदान दे रहे हैं।
  • सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूती: भारत का तृतीयक या सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। इस क्षेत्र में 9.2% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं में वृद्धि दर 10.2% तक पहुंच गई। यह क्षेत्र न केवल घरेलू रोजगार प्रदान करता है, बल्कि वैश्विक बाजारों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
  • ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स और डिजिटल आधार: भारत में लगभग 1,500 ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) कार्यरत हैं, जो दुनिया के कुल जीसीसी का लगभग 45% हैं। यह भारत की कुशल और स्केलेबल मानव संसाधन क्षमता को दर्शाता है। इसके साथ ही 1.2 अरब टेलीकॉम उपभोक्ता और 83.7 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता भारत को डिजिटल सेवाओं और नवाचार के लिए एक विशाल मंच प्रदान करते हैं।
  • सेवा निर्यात और वैश्विक एकीकरण: भारत का सेवा निर्यात बीते दो दशकों में लगभग 14% की दर से बढ़ा है। आईटी और बीपीओ सेवाओं ने अकेले 2021–22 में 157 अरब डॉलर का योगदान दिया। यह भारत की वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में मजबूत भागीदारी और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को स्पष्ट करता है।

 

भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले प्रमुख कारक

  • मजबूत घरेलू उपभोग: भारत की आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी नींव घरेलू खपत है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च लगातार बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024–25 में निजी उपभोग में 7 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जो कुल GDP का लगभग 62 प्रतिशत रहा। यह स्तर पिछले दो दशकों में सबसे ऊँचा माना जाता है। बढ़ती खपत से रिटेल, ऑटोमोबाइल, आवास और FMCG जैसे क्षेत्रों को सीधा लाभ मिला है। 
  • अवसंरचना में भारी निवेश: हाल के वर्षों में भारत सरकार ने बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर निवेश किया है। वित्त वर्ष 2025–26 के बजट में 11 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजीगत व्यय राशि निर्धारित की गई। यह निवेश सड़कों, बंदरगाहों, रेलवे, शहरी विकास और लॉजिस्टिक्स पर केंद्रित रहा। इस खर्च से न केवल रोजगार के अवसर पैदा हुए, बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों में भी तेजी आई। बेहतर कनेक्टिविटी से उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हुई और निजी क्षेत्र को विस्तार के लिए प्रोत्साहन मिला।
  • नीतिगत सुधारों की भूमिका: भारत की आर्थिक गति को बनाए रखने में नीतिगत सुधार अहम भूमिका निभा रहे हैं। मेक इन इंडिया, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं, और श्रम व भूमि सुधारों ने व्यापार संचालन को सरल बनाया है। PLI योजनाओं ने विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और उन्नत विनिर्माण को बढ़ावा दिया है। इसके साथ ही GST 2.0, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस 2.0 और मौद्रिक छूट जैसी पहलों ने निवेश माहौल को अधिक अनुकूल बनाया।
  • डिजिटल परिवर्तन: भारत का डिजिटल रूपांतरण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है। डिजिटल भुगतान, फिनटेक, ई-कॉमर्स और आईटी सेवाओं में तेज़ विस्तार हुआ है। 2022–23 में एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से लेनदेन ने रिकॉर्ड स्तर छुआ। डिजिटल माध्यमों ने पारदर्शिता बढ़ाई, लागत घटाई और छोटे व्यवसायों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा।
  • विदेशी निवेश का बढ़ता प्रवाह: भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) लगातार मजबूत बना हुआ है। अप्रैल 2000 से दिसंबर 2024 के बीच कुल FDI प्रवाह लगभग 1.05 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (₹89.85 लाख करोड़) तक पहुंच गया। यह पूंजी मुख्य रूप से विनिर्माण, प्रौद्योगिकी और अवसंरचना क्षेत्रों में आई है। विदेशी निवेश न केवल पूंजी उपलब्ध कराता है, बल्कि नई तकनीक, प्रबंधन कौशल और रोजगार के अवसर भी लाता है।
  • सेवा क्षेत्र की अग्रणी भूमिका: भारत का सेवा क्षेत्र आर्थिक वृद्धि का प्रमुख इंजन है। यह कुल सकल मूल्य वर्धन (GVA) का 55 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है। आईटी, वित्त, पर्यटन और पेशेवर सेवाएं इसमें प्रमुख हैं। तकनीक और वित्तीय सेवाओं ने निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। भारत के सेवा निर्यात लगातार दोहरे अंकों की दर से बढ़ रहे हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत हुई है।
  • श्रम शक्ति और जनसांख्यिकीय लाभ: भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा श्रम शक्ति है। देश की लगभग 26 प्रतिशत आबादी 10–24 आयु वर्ग में है। यह जनसांख्यिकीय संरचना उत्पादक क्षमता, बचत, उपभोग और उद्यमिता को बढ़ावा देती है। बड़ी कार्यशील आबादी से श्रम-प्रधान क्षेत्रों को सहारा मिलता है और दीर्घकालिक विकास की संभावनाएं मजबूत होती हैं।

 

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौतियाँ

  • बढ़ती बेरोज़गारी की समस्या: तेज़ GDP वृद्धि के बावजूद भारत में बेरोज़गारी एक गंभीर चिंता बनी हुई है। विशेष रूप से युवा वर्ग के लिए स्थायी रोजगार पाना कठिन होता जा रहा है। हर वर्ष बड़ी संख्या में शिक्षित युवा श्रम बाज़ार में प्रवेश करते हैं, लेकिन औपचारिक क्षेत्र में रोजगार सृजन उस अनुपात में नहीं हो पा रहा। कई नए स्नातक अल्पकालिक या असुरक्षित नौकरियों तक सीमित रह जाते हैं। इससे सामाजिक असंतोष बढ़ता है और उपभोग क्षमता पर भी दबाव पड़ता है, जो दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए चुनौती बन सकता है।
  • आय असमानता का बना रहना: भारत में आय और संपत्ति का असमान वितरण अभी भी एक बड़ी संरचनात्मक समस्या है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश की कुल आय का बड़ा हिस्सा शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास केंद्रित है, जबकि शेष 90 प्रतिशत को अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों में जीवन यापन करना पड़ता है। आय असमानता से सामाजिक गतिशीलता सीमित होती है और विकास के लाभ समान रूप से नहीं पहुंच पाते, जिससे समावेशी विकास पर प्रश्न उठता है।
  • अवसंरचना में शेष अंतर: हालांकि सरकार ने बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश किया है, फिर भी कई क्षेत्रों में कमी बनी हुई है। परिवहन, ऊर्जा आपूर्ति और शहरी सेवाओं में असंतुलन दिखाई देता है। अनेक परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण, नियामकीय प्रक्रियाओं और वित्तीय सीमाओं के कारण समय पर पूरी नहीं हो पातीं। अपर्याप्त अवसंरचना से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ जाती है, जिससे भारतीय उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता प्रभावित होती है।
  • वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का प्रभाव: भारत की आर्थिक प्रगति आंतरिक कारकों के साथ-साथ वैश्विक परिस्थितियों से भी प्रभावित होती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मंदी, भूराजनीतिक तनाव और व्यापार नीतियों में बदलाव से भारतीय निर्यात पर दबाव पड़ता है। कपड़ा, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाएं जैसे क्षेत्रों में बाहरी मांग कमजोर होने के संकेत मिले हैं। हाल के महीनों में औद्योगिक ऑर्डर बुक में सुस्ती इस बाहरी दबाव को दर्शाती है, जो विकास की गति को सीमित कर सकती है।
  • पर्यावरणीय और संसाधन संबंधी चुनौतियाँ: दीर्घकालिक विकास के मार्ग में पर्यावरणीय दबाव एक गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं। जल संकट कई राज्यों में गंभीर रूप ले चुका है, जिसका कारण जलवायु परिवर्तन और जल संसाधनों का असमान वितरण है। तेज़ औद्योगीकरण और शहरीकरण से वायु और जल प्रदूषण बढ़ा है। ये समस्याएं न केवल जनस्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं, बल्कि कृषि, उद्योग और शहरी जीवन की स्थिरता पर भी नकारात्मक असर डालती हैं।

 

आगे की राह 

  • रोज़गार सृजन को प्राथमिकता: आगे बढ़ने के लिए भारत को विनिर्माण और आधुनिक सेवा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन पर ध्यान देना होगा। श्रम-प्रधान उद्योगों को प्रोत्साहन देकर युवाओं के लिए स्थायी अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
  • कौशल विकास और मानव पूंजी: कौशल प्रशिक्षण को उद्योग की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना आवश्यक है। तकनीकी, डिजिटल और हरित कौशल पर निवेश से कार्यबल की उत्पादकता बढ़ेगी और रोजगार की गुणवत्ता सुधरेगी।
  • निजी निवेश और नीति स्थिरता: नीति स्थिरता, तेज़ अनुमतियाँ और स्पष्ट नियम निजी निवेश को आकर्षित करेंगे। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधि को बल मिलेगा।
  • संतुलित अवसंरचना विकास: शहरी अवसंरचना और ग्रामीण उत्पादकता को साथ-साथ सुधारना जरूरी है। यह क्षेत्रीय असंतुलन घटाएगा और समावेशी विकास को बढ़ावा देगा।
  • वित्तीय अनुशासन और सतत विकास: सरकार को वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए पूंजीगत व्यय बढ़ाना चाहिए। साथ ही जलवायु लचीलापन और स्वच्छ ऊर्जा पर ठोस कदम भारत की दीर्घकालिक वृद्धि को सुरक्षित करेंगे।