न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता: उत्तराखंड उच्च न्यायालय के नए मुख्य न्यायाधीश

संदर्भ :

देश के न्यायिक तंत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता को Uttarakhand High Court के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। यह नियुक्ति 9 जनवरी, 2026 को प्रभावी होगी जब मौजूदा मुख्य न्यायाधीश गुहाँथन नरेंद्र  सेवानिवृत्त हो जाएंगे। न्यायमूर्ति गुप्ता वर्तमान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में सेवा दे रहे हैं, और उनके पास लगभग तीन दशकों का न्यायिक अनुभव है।

 

यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 217 और सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम प्रणाली के तहत न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। देश में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए यह प्रक्रिया संवैधानिक रूप से स्थापित की गई है।

Justice Manoj Kumar Gupta

न्यायिक नियुक्ति का प्रक्रिया और कॉलेजियम प्रणाली :

भारत में उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति एक सुस्पष्ट और संवैधानिक प्रक्रिया के द्वारा होती है, जिसे कॉलेजियम प्रणाली  कहा जाता है। इस प्रणाली के तहत सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च न्यायाधीश-मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश-मिलकर नई नियुक्तियों के लिए नाम सुझाते हैं।

 

कॉलेजियम की सिफारिश के बाद, यह सूची केंद्रीय सरकार के पास भेजी जाती है, जो इसे औपचारिक मंजूरी देती है। इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति का आदेश जारी किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करना और नियुक्तियों में निष्पक्षता बनाए रखना है।

 

विशेष रूप से जब किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने की स्थिति होती है, तो कॉलेजियम नए मुख्य न्यायाधीश का चयन वरिष्ठता, अनुभव, प्रशासनिक क्षमता तथा न्यायिक कार्यों की गुणवत्ता के आधार पर करता है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता की नियुक्ति भी इसी कारण वरिष्ठता, विधिक दक्षता और नेतृत्व क्षमता के आधार पर की गई है।

 

मुख्य न्यायाधीश का चयन केवल न्यायिक प्रवीणता के आधार पर ही नहीं, बल्कि ओवरऑल प्रबंधन और न्यायपालिका के विश्वास को बनाए रखने की क्षमता के आधार पर भी किया जाता है।

 

मनोज कुमार गुप्ता का कानूनी सफर और अनुभव :

न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता का करियर भारतीय न्यायपालिका में एक प्रतिष्ठित मुकाम रहा है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से कानून (LL.B.) की डिग्री हासिल करने के बाद 6 दिसंबर 1987 को अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया।

 

अपने प्रारंभिक वर्षों में, उन्होंने मुख्य रूप से सिविल, किराया नियंत्रण और संवैधानिक कानून के मामलों में प्रैक्टिस की। बाद में 12 अप्रैल 2013 को उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीश  नियुक्त किया गया और 10 अप्रैल 2015 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया।

 

अपनी न्यायिक सेवा के दौरान, न्यायमूर्ति गुप्ता ने संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण मामलों में फैसले दिए हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने 2025 में अत्यंत विवादास्पद मामला में 17 वर्षीय व्यक्ति को 31 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हुई।

 

इसके अलावा उन्होंने भूमि अधिग्रहण, सेवा कानून, शिक्षा, पुलिस सेवा नियम तथा बड़े बुनियादी ढांचा मामलों पर भी महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं, जिससे न्यायपालिका में उनकी विशेषज्ञता और व्याप्ति का पता चलता है।

 

उनके अनुभव और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें न केवल वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में स्थापित किया है, बल्कि एक मजबूत प्रशासनिक क्षमता वाले न्यायाधीश के रूप में भी पहचान दी है-जो एक उच्च न्यायालय का नेतृत्व संभालने के लिए आवश्यक है।

 

उत्तराखंड हाई कोर्ट में अपेक्षित प्रभाव :

उत्तराखंड उच्च न्यायालय एक अपेक्षाकृत छोटा, लेकिन संवेदनशील जूरीडिक्शन है जहाँ न्यायाधीशों की संख्या सीमित होती है और मामलों की पेंडेंसी अक्सर उच्च रहती है। ऐसे में एक अनुभवी और कुशल मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से जब न्यायपालिका की प्रभावशीलता और समयबद्ध निपटान की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना होता है।

 

न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर प्रभाव डालने वाले कई कारक होते हैं-जैसे कि मामलों की पेंडेंसी, न्यायाधीशों की संख्या, न्यायमित्रों का अनुभव, और स्थानीय कानूनी चुनौतियाँ। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुभवी नेतृत्व से इन चुनौतियों को मुकाबला करने में मदद मिलेगी और न्याय वितरण की गति में सुधार होगा।

 

उत्तराखंड हाई कोर्ट की पेंडेंसी को कम करने, संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और न्यायाधीशों के बीच संतुलित कार्यभार सुनिश्चित करने जैसे पहलुओं को मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में सुव्यवस्थित किया जा सकता है।

 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान :

न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय संविधान का मूल स्तंभ है। इसे सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया को स्वतंत्रता, पारदर्शिता और मुफ्त निर्णय क्षमता के साथ संचालित करना अनिवार्य माना जाता है। कॉलेजियम प्रणाली इसी उद्देश्य को पूरा करती है-क्योंकि इसमें न्यायपालिका स्वयं अपने वरिष्ठ सदस्यों को निर्धारण करने में भूमिका निभाती है।

 

तथापि, इस प्रणाली पर समय-समय पर बहसें होती रही हैं-जैसे कि पारदर्शिता की कमी, नियुक्ति में राजनीतिक दबाव, तथा संतुलन बनाये रखने की चुनौतियाँ। इन मुद्दों का समाधान संविधान, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और सार्वजनिक विश्वास को बचाए रखते हुए किया जाना आवश्यक है।

 

निष्कर्ष :

न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता की उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि यह भारत के न्यायिक तंत्र में विश्वास, नेतृत्व और अनुभव को दर्शाता है। यह कदम न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और निष्पक्ष न्याय वितरण को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत देता है।

 

आने वाले वर्षों में न्यायमूर्ति गुप्ता की नेतृत्व क्षमता-न केवल उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मामलों के निष्पादन को तेज करने में, बल्कि न्यायपालिका की सुशासन और संवैधानिक न्याय सुनिश्चित करने में-एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

 

प्रश्न : भारत में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  2. इस नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम की सिफारिश केंद्रीय भूमिका निभाती है।
  3. मुख्य न्यायाधीश का चयन केवल केंद्र सरकार द्वारा एकतरफा रूप से किया जाता है।
  4. वरिष्ठता, विधिक दक्षता और नेतृत्व क्षमता मुख्य न्यायाधीश के चयन में महत्वपूर्ण मापदंड होते हैं।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 1, 2 और 4

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2, 3 और 4

 

प्रश्न (GS-II : भारतीय संविधान एवं शासन)


भारत में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली की भूमिका का परीक्षण कीजिए। न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता की उत्तराखंड उच्च न्यायालय में नियुक्ति के संदर्भ में इस प्रक्रिया के महत्व और उससे जुड़ी चुनौतियों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)