संदर्भ :
पूर्वी एशिया में भू-राजनीतिक संतुलन पिछले कुछ वर्षों से लगातार बदल रहा है। इसी संदर्भ में चीन और जापान के बीच बढ़ता तनाव एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के रूप में सामने आया है। हाल ही में चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने जापान को ऐसे “दोहरे उपयोग” वाले सामानों के निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जिनका उपयोग नागरिक उद्देश्यों के साथ-साथ सैन्य तैयारियों में भी किया जा सकता है। यह निर्णय ऐसे समय पर लिया गया है जब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं।
चीन का कहना है कि इन वस्तुओं का जापान द्वारा सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे उसकी सैन्य क्षमता में वृद्धि होगी। इसी कारण ऐसे सभी निर्यातों को रोकना राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक माना गया है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई संगठन या व्यक्ति इस प्रतिबंध का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, चीन ने अभी तक उन वस्तुओं की विस्तृत सूची सार्वजनिक नहीं की है, जिन पर यह रोक लागू होगी।
यह पूरा विवाद मुख्य रूप से ताइवान को लेकर उठे राजनीतिक बयानों से जुड़ा हुआ है। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने नवंबर में कहा था कि यदि चीन ताइवान पर हमला करता है, तो इसे जापान के लिए अस्तित्वगत खतरे के रूप में देखा जा सकता है। चीन ने इस बयान को उकसाने वाला और उसकी संप्रभुता के खिलाफ बताया। बीजिंग का स्पष्ट रुख है कि ताइवान उसका आंतरिक मामला है और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को वह स्वीकार नहीं करेगा।
दोहरे उपयोग (Dual-Use) वस्तुएँ –
दोहरे उपयोग वाली वस्तुएँ वे सामान, तकनीक या सॉफ्टवेयर होते हैं जिनका इस्तेमाल सामान्य नागरिक कार्यों और सैन्य उद्देश्यों-दोनों में किया जा सकता है। यानी एक ही चीज़ से खेती, उद्योग या संचार जैसे शांतिपूर्ण काम भी हो सकते हैं और उसी का उपयोग हथियार, निगरानी प्रणाली या सैन्य उपकरण बनाने में भी किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर ड्रोन का उपयोग फसल सर्वे या आपदा राहत में होता है, लेकिन वही ड्रोन सैन्य निगरानी या हमलों में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसी तरह दुर्लभ पृथ्वी तत्व मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर बनाने में लगते हैं, पर वे मिसाइल, रडार और आधुनिक हथियार प्रणालियों के लिए भी आवश्यक होते हैं।
दोहरे उपयोग वाले सामान और उनका रणनीतिक महत्व
दोहरे उपयोग वाले सामान वे वस्तुएँ, तकनीक या सॉफ्टवेयर होते हैं जिनका इस्तेमाल सामान्य नागरिक कार्यों के साथ-साथ सैन्य प्रणालियों के विकास और संचालन में भी किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर ड्रोन तकनीक को कृषि, सर्वेक्षण और आपदा प्रबंधन में उपयोग किया जाता है, लेकिन वही तकनीक सैन्य निगरानी और हमलों में भी अहम भूमिका निभाती है। इसी प्रकार उच्च-प्रदर्शन सेमीकंडक्टर और दुर्लभ पृथ्वी तत्व आधुनिक हथियार प्रणालियों, मिसाइलों, रडार और संचार उपकरणों के लिए अनिवार्य माने जाते हैं।
चीन इन दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। जापान, अपनी तकनीकी और औद्योगिक क्षमताओं के बावजूद, इन तत्वों के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर है। अनुमान के अनुसार जापान की लगभग 60 प्रतिशत दुर्लभ पृथ्वी आयात जरूरतें चीन से पूरी होती हैं। ऐसे में इन निर्यातों पर रोक जापान के ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उद्योग पर दबाव बना सकती है। हालांकि अभी तक उपलब्ध व्यापार आंकड़ों में निर्यात में कोई तात्कालिक गिरावट नहीं दिखी है, लेकिन अनिश्चितता का माहौल जरूर बना है।
राजनीतिक और सैन्य प्रभाव
इस निर्णय का असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक और सैन्य निहितार्थ भी हैं। जापान ने हाल के वर्षों में अपनी रक्षा नीति में बदलाव करते हुए रक्षा बजट में लगातार वृद्धि की है। उसका तर्क है कि बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और क्षेत्रीय खतरों को देखते हुए यह आवश्यक है। हाल ही में जापानी मंत्रिमंडल ने रिकॉर्ड रक्षा बजट को मंजूरी दी, जिससे कुल रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया।
चीन इस रुझान को “पुनः-सैन्यीकरण” के रूप में देखता है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि जापान की यह दिशा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए खतरा बन सकती है। चीन के सरकारी मीडिया, जैसे शिन्हुआ, ने भी जापान की नीतियों पर चिंता जताते हुए कहा है कि इतिहास के अनुभवों को देखते हुए इस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सतर्क रहने की आवश्यकता है।
दूसरी ओर, जापान ने चीन के प्रतिबंधों को “अस्वीकार्य” और “अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के खिलाफ” बताया है। टोक्यो का कहना है कि ये कदम केवल जापान को निशाना बनाते हैं और मुक्त व्यापार की भावना के विपरीत हैं। जापान ने यह भी दोहराया है कि वह अपने शांतिवादी संविधान और गैर-परमाणु सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है।
क्षेत्रीय और वैश्विक असर
चीन-जापान तनाव का प्रभाव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। पूर्वी एशिया में पहले से ही कई संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं, जिनमें दक्षिण चीन सागर, कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान की स्थिति शामिल है। ऐसे में दो प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों के बीच बढ़ता टकराव पूरे क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी इसका असर पड़ सकता है, खासकर उन उद्योगों पर जो उच्च तकनीक और दुर्लभ संसाधनों पर निर्भर हैं।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह कदम प्रतीकात्मक दबाव बनाने के लिए उठाया गया है, ताकि जापान की घरेलू राजनीति में भी बहस तेज हो। लेकिन यदि भविष्य में प्रतिबंधों को सख्ती से लागू किया गया, तो इसके आर्थिक और रणनीतिक परिणाम कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं।
निष्कर्ष : कुल मिलाकर, चीन द्वारा जापान पर दोहरे उपयोग वाले सामानों के निर्यात पर लगाया गया प्रतिबंध केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह गहराते राजनीतिक अविश्वास और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है। ताइवान मुद्दे, बढ़ते रक्षा खर्च और बदलती सुरक्षा नीतियों ने दोनों देशों के रिश्तों को एक नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है। यदि संवाद और कूटनीति के माध्यम से तनाव कम करने के प्रयास नहीं किए गए, तो यह टकराव आने वाले समय में न केवल चीन और जापान के संबंधों को, बल्कि पूरे पूर्वी एशिया की शांति, स्थिरता और आर्थिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।
प्रश्न : हाल ही में चीन द्वारा जापान पर लगाए गए Dual-Use (दोहरे उपयोग) वस्तुओं के निर्यात प्रतिबंध के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- ड्यूल-यूज़ वस्तुएँ वे होती हैं जिनका उपयोग नागरिक और सैन्य-दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
- चीन ने ऐसे सभी ड्यूल-यूज़ निर्यातों पर रोक लगाई है जिनसे जापान की सैन्य क्षमता बढ़ सकती है।
- दुर्लभ पृथ्वी तत्व (Rare Earth Elements) आधुनिक रक्षा, सेमीकंडक्टर और ड्रोन तकनीक के लिए आवश्यक होते हैं।
- ताइवान मुद्दे पर जापान के हालिया बयान चीन-जापान तनाव का प्रमुख कारण बने हैं।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2, 3 और 4
(d) केवल 2 और 4
प्रश्न (GS-II – अंतरराष्ट्रीय संबंध)
प्रश्न :
चीन द्वारा जापान पर ड्यूल-यूज़ वस्तुओं के निर्यात पर लगाया गया प्रतिबंध केवल व्यापारिक कदम नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक संकेत देता है।
इस कथन के आलोक में चीन-जापान संबंधों में ताइवान मुद्दे, सैन्य आधुनिकीकरण और आपूर्ति-शृंखला राजनीति की भूमिका की चर्चा कीजिए।
