आवारा कुत्ते बनाम मानव सुरक्षा: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ और देशव्यापी बहस

संदर्भ :

भारत में आवारा कुत्तों से जुड़ा मुद्दा लंबे समय से सामाजिक, प्रशासनिक और भावनात्मक बहस का विषय रहा है। मंगलवार को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में इस विषय पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील बहस सामने आई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की कि अदालत में आवारा कुत्तों के समर्थन में तो कई वकील मजबूती से दलीलें दे रहे हैं, लेकिन मानव जीवन और सुरक्षा के पक्ष में उतनी गंभीरता से कोई तर्क नहीं रखा जा रहा

 

पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि जो लोग सड़कों पर बेसहारा कुत्तों को गोद लेने की बात कर रहे हैं, वे सड़कों पर रह रहे अनाथ बच्चों को गोद लेने की चर्चा क्यों नहीं करते। अदालत की यह टिप्पणी न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी व्यापक बहस को जन्म देती है।

Stray dogs vs. human safety

मामले की पृष्ठभूमि :

इस मामले ने पिछले वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान तब आकर्षित किया, जब सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने दिल्ली नगर निगम को आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर में रखने का निर्देश दिया था। इस आदेश के खिलाफ पशु अधिकार संगठनों ने तीव्र विरोध किया, जिसके बाद अदालत ने अपने निर्देशों में संशोधन किया।


संशोधित आदेशों में कुत्तों को टीकाकरण, नसबंदी और पुनः छोड़े जाने की व्यवस्था पर जोर दिया गया, जो पशु जन्म नियंत्रण नियमों (ABC Rules) के अनुरूप है।

 

इसके बाद अदालत ने इस मामले के दायरे को और विस्तृत किया। 7 नवंबर 2025 को अंतरिम आदेश देते हुए अदालत ने सभी राज्यों और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को निर्देश दिया कि राजमार्गों, अस्पतालों, स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों से आवारा पशुओं को हटाया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि इन संस्थानों से पकड़े गए कुत्तों को उसी परिसर में वापस न छोड़ा जाए।

 

सुनवाई के दौरान उठे मुख्य तर्क :

वरिष्ठ अधिवक्ता वैभव गग्गर, जो एक 80 वर्षीय महिला की ओर से पेश हुए, ने आवारा कुत्तों को गोद लेने के लिए प्रोत्साहन नीति लाने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि वह महिला दिल्ली में “डॉग अम्मा” के नाम से जानी जाती हैं और लगभग 200 कुत्तों की देखभाल करती हैं।


उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर गोद लेने के मिशन और नसबंदी तथा टीकाकरण को प्रोत्साहन के रूप में लागू करने की बात कही।

 

इस पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह संभवतः सबसे लंबी बहस है जो उन्होंने सुनी है, लेकिन मानव पीड़ा और अनाथ बच्चों के लिए इतनी लंबी बहस कभी नहीं हुई। अदालत ने इसे समाज की प्राथमिकताओं से जुड़ा गंभीर प्रश्न बताया।

 

संस्थागत क्षेत्रों में आवारा कुत्तों का मुद्दा :

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने अदालत में दलील दी कि 7 नवंबर 2025 का आदेश पूरी तरह से वैधानिक है और इसे लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थान-जैसे अस्पताल, स्कूल, अदालत या हवाई अड्डा-को सार्वजनिक खुला स्थान नहीं माना जा सकता।


उनके अनुसार, यदि किसी मानव को किसी परिसर में रहने का अधिकार नहीं है, तो किसी जानवर को भी वहां रहने का अधिकार नहीं हो सकता।

 

उन्होंने यह भी कहा कि आवारा कुत्तों को संस्थानों में वापस छोड़ना अवैध अतिक्रमण (trespass) के समान है। इस संदर्भ में अदालत ने गुजरात में एक वकील को कुत्ते के काटने की घटना का भी उल्लेख किया, जहां नगर निगम कर्मचारियों पर कुत्तों को पकड़ने के दौरान हमला किया गया था।

 

पशु जन्म नियंत्रण नियमों पर विवाद :

पशु जन्म नियंत्रण नियमों को लेकर भी अदालत में तीखी बहस हुई। आलोचकों का कहना है कि इन नियमों में कई शब्दों की स्पष्ट परिभाषा नहीं है और यह नियम केवल कुत्तों की जनसंख्या नियंत्रण तक सीमित हैं, जबकि कुत्तों के हमलों और मानव सुरक्षा जैसे मुद्दों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करते।

 

वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद और मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि कुत्तों को हटाने की नीति प्रभावी नहीं है और इससे समस्या और बढ़ सकती है। उनके अनुसार, नसबंदी और टीकाकरण ही वैज्ञानिक और स्थायी समाधान है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 51A (जी) का हवाला देते हुए कहा कि सभी जीवों के प्रति करुणा भारतीय समाज का मूल दर्शन है।

 

मानव सुरक्षा बनाम पशु संरक्षण :

इस पूरे मामले में अदालत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि यह बहस “कुत्ते बनाम इंसान” की नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन की है।


अदालत ने कहा कि आवारा कुत्तों के काटने से होने वाली चोटों का प्रभाव जीवनभर रह सकता है और इसके लिए राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की जाएगी।

 

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि व्यवस्थाएँ नहीं सुधरीं, तो भविष्य में राज्यों पर भारी मुआवजा लगाने पर भी विचार किया जा सकता है।

 

आगे की राह :

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह केंद्र और राज्य सरकारों के साथ विस्तृत चर्चा करना चाहती है, ताकि यह जाना जा सके कि आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कार्य योजना है या नहीं। अदालत ने सभी पक्षों से अपील की कि भावनात्मक बहस के बजाय कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाए।

 

अगली सुनवाई 20 जनवरी को निर्धारित की गई है, जहां इस विषय पर आगे विचार होगा।

 

निष्कर्ष :

आवारा कुत्तों का मुद्दा केवल पशु अधिकार या मानवीय संवेदना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि अब इस समस्या को टालने का समय समाप्त हो चुका है।
आवश्यक है कि पशु कल्याण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए वैज्ञानिक, कानूनी और व्यावहारिक समाधान अपनाए जाएँ, ताकि समाज के सभी वर्गों के हित सुरक्षित रह सकें।

 

UPSC प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न

प्रश्न :
आवारा कुत्तों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की हालिया सुनवाई के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. सुप्रीम कोर्ट ने संस्थागत क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया है।
  2. पशु जन्म नियंत्रण नियम केवल कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण पर केंद्रित हैं।
  3. अदालत ने यह कहा कि आवारा कुत्तों को संस्थानों में वापस छोड़ना अनिवार्य है।

सही कथनों का चयन कीजिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

सही उत्तर : (a)

 

UPSC मुख्य परीक्षा प्रश्न (सामान्य अध्ययन – II)

प्रश्न :
आवारा कुत्तों की समस्या ने भारत में मानव सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन की आवश्यकता को उजागर किया है।
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों के आलोक में इस समस्या से निपटने के लिए प्रशासनिक, कानूनी और सामाजिक उपायों पर चर्चा कीजिए।