कम दिखती महंगाई, ज्यादा महसूस होती महंगाई: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की बड़ी चुनौती

संदर्भ :

दिसंबर 2025 की खुदरा महंगाई दर 1.33% दर्ज की गई, जो मौजूदा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) श्रृंखला (आधार वर्ष 2012) की अंतिम कड़ी है। इसके बाद महंगाई के आंकड़े नए आधार वर्ष 2024 और नए भारांक (वेटेज) के साथ जारी किए जाएंगे। तकनीकी रूप से देखें तो दिसंबर 2025 की महंगाई तीन महीनों के उच्चतम स्तर पर थी, लेकिन यह भी सच है कि यह पूरी श्रृंखला में तीसरी सबसे कम महंगाई रही।


अप्रैल से दिसंबर 2025 की अवधि में औसत महंगाई 1.7% रही, जबकि इसी अवधि में 2024 में यह 4.9% थी। कागजों पर महंगाई काफी कम दिख रही है, लेकिन आम लोगों को ऐसा महसूस नहीं हो रहा। यही विरोधाभास आज नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

Big challenge of the Consumer Price Index

आंकड़ों और अनुभव के बीच बढ़ता फासला

यदि वास्तव में महंगाई इतनी कम होती, तो उपभोग में तेजी आनी चाहिए थी। लेकिन सरकार के अपने जीडीपी के प्रथम अग्रिम अनुमान बताते हैं कि इस वर्ष निजी उपभोग की वृद्धि पिछले वर्ष की तुलना में धीमी रहने वाली है।
यह संकेत देता है कि उपभोक्ताओं पर कीमतों का दबाव अब भी बना हुआ है।

 

इस अंतर को और स्पष्ट करती है भारतीय रिज़र्व बैंक की मुद्रास्फीति अपेक्षा सर्वेक्षण (दिसंबर 2025)। इसके अनुसार-

  • घरों ने मौजूदा महंगाई को 6.6% के आसपास महसूस किया
  • तीन महीने बाद इसे 7.6% तक बढ़ने की आशंका जताई
  • एक साल बाद यह 8% तक जा सकती है

 

यानी लोगों की धारणा और आधिकारिक आंकड़ों के बीच 5–6 प्रतिशत अंकों का अंतर है। लोगों को लगता है कि न केवल कीमतें बढ़ रही हैं, बल्कि पहले से तेज़ गति से बढ़ रही हैं। इस अनुभूति को पकड़ पाने में मौजूदा आंकड़े विफल दिखते हैं।

 

एक देश, एक आंकड़ा: स्वाभाविक सीमा

किसी भी राष्ट्रीय महंगाई आंकड़े की मूल समस्या यह है कि वह एक ही संख्या में पूरे देश की कीमतों का हाल बताने की कोशिश करता है।
भारत जैसे विविध देश में-

  • कश्मीर के शहर
  • केरल के गांव
  • महानगरों की शहरी बस्तियाँ
  • ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र

 

सबकी खपत की आदतें, आय, और कीमतें अलग-अलग हैं। जब इन सबको मिलाकर एक औसत निकाला जाता है, तो कई स्थानीय सच्चाइयाँ छूट जाती हैं। यह समस्या हर देश में होती है, लेकिन भारत में इसकी तीव्रता कहीं अधिक है।

 

पुराना CPI: असली समस्या की जड़

इस स्वाभाविक सीमा के ऊपर एक और बड़ी समस्या जुड़ जाती है-पुराना आधार वर्ष (2012)
CPI के भारांक 2012 की उपभोग संरचना पर आधारित हैं। तब से लेकर अब तक-

  • डिजिटल सेवाओं की खपत बढ़ी
  • शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ा
  • ईंधन, परिवहन और सेवाओं की भूमिका बदली
  • केंद्र और राज्यों की सब्सिडी योजनाओं ने उपभोग का स्वरूप बदला

 

लेकिन CPI में इन बदलावों का समुचित प्रतिबिंब नहीं दिखता। नतीजा यह कि जिन मदों पर आज लोग ज्यादा खर्च कर रहे हैं, उनका वजन सूचकांक में कम है; और जिनका महत्व घट चुका है, उनका वजन ज्यादा बना हुआ है।

 

नई CPI श्रृंखला: देर से सही, जरूरी सुधार

सरकार ने घोषणा की है कि 12 फरवरी को जनवरी 2026 की महंगाई दर नई CPI श्रृंखला के आधार पर जारी की जाएगी। इस श्रृंखला में-

  • आधार वर्ष 2024 होगा
  • घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023–24 के आधार पर नए भारांक शामिल होंगे

यह बदलाव लंबे समय से लंबित था और अब बेहद जरूरी हो चुका है। नई श्रृंखला से उम्मीद है कि-

  • सेवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन जैसे क्षेत्रों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिलेगा
  • शहरी–ग्रामीण अंतर अधिक सटीक रूप से दिखेगा
  • लोगों की वास्तविक महंगाई अनुभूति के ज्यादा करीब आंकड़े सामने आएंगे

 

नीति-निर्माण पर असर

महंगाई के आंकड़े केवल सूचना नहीं होते, बल्कि नीतियों की दिशा तय करते हैं

  • मौद्रिक नीति (ब्याज दरें)
  • राजकोषीय नीति (सब्सिडी, कर)
  • वेतन और पेंशन समायोजन

 

सब कुछ CPI पर निर्भर करता है। यदि आंकड़े वास्तविक महंगाई को कम दिखाते हैं, तो-

  • ब्याज दरें जरूरत से ज्यादा कम रह सकती हैं
  • गरीब और मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति का नुकसान अनदेखा हो सकता है
  • नीतिगत फैसले जमीन की सच्चाई से कट सकते हैं

यही वजह है कि CPI का अद्यतन केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता से जुड़ा मुद्दा है।

 

क्या नई श्रृंखला सब कुछ ठीक कर देगी?

नई CPI श्रृंखला एक बड़ा सुधार होगी, लेकिन यह भी कोई जादुई समाधान नहीं है।

  • क्षेत्रीय असमानताएँ बनी रहेंगी
  • अलग-अलग आय वर्गों की महंगाई अलग होगी
  • औसत आंकड़ा फिर भी सब कुछ नहीं बताएगा

फिर भी, एक समय-संगत और प्रासंगिक सूचकांक पुराने और अप्रासंगिक आंकड़ों से कहीं बेहतर होगा।

 

निष्कर्ष :

दिसंबर 2025 की खुदरा महंगाई भले ही रिकॉर्ड रूप से कम दिखे, लेकिन आम आदमी की जेब पर उसका असर वैसा नहीं है। आंकड़ों और अनुभव के बीच बढ़ता अंतर बताता है कि पुराने CPI ढांचे की सीमाएँ अब खुलकर सामने आ चुकी हैं


आधार वर्ष 2024 के साथ नई CPI श्रृंखला इस खाई को पाटने की दिशा में एक जरूरी कदम है। यदि महंगाई को सही तरीके से मापा जाएगा, तभी नीतियाँ भी सही दिशा में बन सकेंगी। महंगाई को केवल कम दिखाना नहीं, बल्कि सही दिखाना आज भारत की आर्थिक नीति की सबसे बड़ी जरूरत है।

 

प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न


भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. दिसंबर 2025 की खुदरा महंगाई दर मौजूदा CPI (आधार वर्ष 2012) की अंतिम कड़ी है।
  2. नई CPI श्रृंखला का आधार वर्ष 2024 होगा।
  3. CPI के भारांक घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण पर आधारित होते हैं।

सही कथनों का चयन कीजिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

 

मुख्य परीक्षा प्रश्न (सामान्य अध्ययन – III)


भारत में आधिकारिक खुदरा महंगाई दर और आम लोगों द्वारा महसूस की जा रही महंगाई के बीच बढ़ता अंतर नीति-निर्माण के लिए चुनौती बन गया है।
इस संदर्भ में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की सीमाओं और नए CPI आधार वर्ष के महत्व की चर्चा कीजिए।