संदर्भ :
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति को चुनौती दी थी। यह समिति उनके विरुद्ध प्रस्तुत महाभियोग (हटाने) प्रस्ताव की प्रारंभिक जांच के लिए बनाई गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों को दी गई सुरक्षा इतनी व्यापक नहीं हो सकती कि वह न्यायाधीशों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया को ही निष्क्रिय कर दे। यदि जस्टिस वर्मा की व्याख्या स्वीकार कर ली जाती, तो संसद सदस्यों को हर बार “शून्य बिंदु” पर लौटना पड़ता, जिससे जवाबदेही की पूरी व्यवस्था ठप हो जाती।
यह मामला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
मामले की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
जस्टिस यशवंत वर्मा उस समय विवादों में आए जब मार्च 2025 में दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के बाद नकदी मिलने का आरोप सामने आया। उस समय वे दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे।
इस प्रकरण की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के भीतर एक इन-हाउस जांच समिति गठित की गई। इस समिति ने जस्टिस वर्मा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को असंतोषजनक पाया। इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजिव खन्ना ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को आगे की कार्रवाई की सिफारिश की।
इसके पश्चात 21 जुलाई 2025 को जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा-दोनों सदनों में नोटिस प्रस्तुत किए गए।
संसदीय प्रक्रिया और विवाद का केंद्र
लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त 2025 को प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। इसके विपरीत, राज्यसभा में स्थिति अलग रही।
तत्कालीन उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद, उपसभापति ने प्रस्ताव को दोषपूर्ण (डिफेक्टिव) बताते हुए स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
यहीं से विवाद ने संवैधानिक रूप ले लिया।
जस्टिस वर्मा का तर्क था कि जब एक ही दिन दोनों सदनों में प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ, तो न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के प्रावधान के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को मिलकर संयुक्त जांच समिति बनानी चाहिए थी। ऐसा न होना, उनके अनुसार, पूरी प्रक्रिया को अवैध बनाता है।
सरकार और लोकसभा सचिवालय का पक्ष
लोकसभा सचिवालय और केंद्र सरकार ने इस दलील का विरोध किया। उनका कहना था कि राज्यसभा का प्रस्ताव कभी स्वीकार ही नहीं हुआ, इसलिए वह कानूनी रूप से अस्तित्व में नहीं आया।
ऐसी स्थिति में लोकसभा अध्यक्ष को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने और जांच समिति गठित करने का पूरा अधिकार था।
केंद्र की ओर से पेश हुए तुषार मेहता ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी राज्यसभा सदस्य ने प्रस्ताव खारिज किए जाने को चुनौती नहीं दी, और स्वयं जस्टिस वर्मा ने भी उस निर्णय को चुनौती नहीं दी क्योंकि वह उनके पक्ष में था।
उनका तर्क था कि इस स्तर पर न्यायालय का हस्तक्षेप संवैधानिक जवाबदेही तंत्र को पटरी से उतार सकता है।
संविधानिक प्रश्न और न्यायालय की भूमिका
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि उसे दो मूल्यों के बीच संतुलन बनाना है-
- उस न्यायाधीश के अधिकार, जिसके विरुद्ध महाभियोग की कार्यवाही चल रही है
- संसद सदस्यों की इच्छा, जो जनता की संप्रभुता का प्रतिनिधित्व करते हैं
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्यसभा सभापति के अभाव में पूरी प्रक्रिया को रोक दिया जाए, तो गंभीर दुराचार या शारीरिक अक्षमता जैसे मामलों में भी न्यायाधीशों को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था पंगु हो जाएगी।
उपसभापति की भूमिका और संवैधानिक वैधता
जस्टिस वर्मा के वकीलों ने यह दलील दी कि राज्यसभा में प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार केवल सभापति के पास है, उपसभापति के पास नहीं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 91 का संदर्भ लेते हुए कहा कि सभापति के पद में रिक्ति होने पर उपसभापति कार्यवाहक सभापति के रूप में कार्य कर सकता है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल संभावित “हितों के टकराव” जैसे काल्पनिक तर्कों के आधार पर संवैधानिक प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता।
राज्यसभा सचिवालय की आंतरिक राय
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि राज्यसभा के महासचिव ने प्रस्ताव को “नॉन-एस्ट” बताया था।
उनकी राय में नोटिस में कई कानूनी, प्रक्रियात्मक और तथ्यात्मक त्रुटियाँ थीं-जैसे गलत कानूनी प्रावधानों का उल्लेख, प्रमाणिक सामग्री का अभाव और ऐसी घटनाओं का संदर्भ जो आग की घटना से पहले की थीं।
इसी राय के आधार पर उपसभापति ने प्रस्ताव को अस्वीकार किया।
जांच समिति और आगे की प्रक्रिया
लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति में-
- सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरविंद कुमार
- मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनींद्र मोहन श्रीवास्तव
- वरिष्ठ अधिवक्ता बी वी आचार्य
शामिल हैं।
जस्टिस वर्मा ने 12 जनवरी को समिति को अपना उत्तर सौंपते हुए आरोपों के तथ्यात्मक आधार को नकारा है और कहा है कि उनके आवास से कोई नकदी बरामद नहीं हुई। वे 24 जनवरी को समिति के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होंगे।
सैद्धांतिक विश्लेषण: स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही
यह पूरा प्रकरण भारतीय संवैधानिक ढांचे के एक मूलभूत सिद्धांत को उजागर करता है-न्यायपालिका की स्वतंत्रता पूर्ण निरंकुशता नहीं है।
न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए जटिल प्रक्रिया अपनाई गई है, लेकिन उसका उद्देश्य उन्हें जवाबदेही से मुक्त करना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी संतुलन को पुनः स्थापित करता है।
निष्कर्ष :
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह स्पष्ट करता है कि संवैधानिक सुरक्षा कवच का उपयोग न्यायिक प्रक्रिया को अवरुद्ध करने के लिए नहीं किया जा सकता।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही-दोनों का सह-अस्तित्व ही संविधान की आत्मा है। यह फैसला भविष्य में न्यायाधीशों के महाभियोग से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मार्गदर्शक सिद्ध होगा
प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 न्यायाधीशों के महाभियोग की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
- लोकसभा अध्यक्ष को कुछ परिस्थितियों में स्वतंत्र रूप से जांच समिति गठित करने का अधिकार है।
- राज्यसभा सभापति के पद में रिक्ति होने पर उपसभापति कार्यवाहक सभापति की भूमिका निभा सकता है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
मुख्य परीक्षा प्रश्न (सामान्य अध्ययन – II)
“न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना भारतीय संविधान की अनिवार्य आवश्यकता है।”
जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।
