संदर्भ :
भारत सरकार देश की जनजातीय स्वास्थ्य व्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है। केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि देशभर के एक लाख आदिवासी पारंपरिक वैद्यों (जनजातीय हीलर्स) को औपचारिक रूप से “जनजातीय समुदायों की स्वास्थ्य सेवाओं के साझेदार” के रूप में मान्यता दी जाए। यह जानकारी हैदराबाद में आयोजित एक क्षमता निर्माण कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों द्वारा दी गई। यह कार्यक्रम जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें देशभर के अनुसूचित जनजाति समुदायों से जुड़े 400 से अधिक पारंपरिक वैद्यों ने भाग लिया।
यह पहल ऐसे समय में आई है जब भारत में जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच, गुणवत्ता और सांस्कृतिक स्वीकार्यता को लेकर लंबे समय से चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
आदिवासी वैद्य: पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक भरोसे की रीढ़
भारत के अनेक आदिवासी समुदायों में पारंपरिक वैद्य पीढ़ियों से स्वास्थ्य सेवा की पहली कड़ी रहे हैं। दुर्गम इलाकों, जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए ये वैद्य केवल उपचारक नहीं, बल्कि विश्वास, संस्कृति और परंपरा के संवाहक भी हैं।
आधुनिक स्वास्थ्य ढांचे की सीमित पहुँच के कारण मलेरिया, क्षय रोग, कुष्ठ रोग, कुपोषण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ जनजातीय क्षेत्रों में आज भी गंभीर बनी हुई हैं। ऐसे में सरकार का यह प्रयास पारंपरिक ज्ञान को औपचारिक स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ने की दिशा में एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत देता है।
केंद्रीय मंत्री का दृष्टिकोण: रोजगार और बाजार से जुड़ाव
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम ने राज्य सरकारों से अपील की कि वे पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में बाजार संपर्क (मार्केट लिंकिज) और एफएमसीजी व फार्मास्यूटिकल कंपनियों के साथ साझेदारी की संभावनाओं को तलाशें।
उनका कहना था कि इससे न केवल पारंपरिक चिकित्सा को पहचान मिलेगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यह सोच आदिवासी कल्याण को केवल कल्याणकारी दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण के नजरिये से देखने की दिशा में एक बदलाव को दर्शाती है।
तकनीकी क्षमता निर्माण और संस्थागत सहयोग
केंद्रीय मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि देश के प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञों के साथ संवाद आदिवासी वैद्यों की क्षमता बढ़ाने में सहायक होगा।
इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने भाग लिया-
- अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS)
- विश्व स्वास्थ्य संगठन
- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR)
- स्वास्थ्य मंत्रालय और आयुष मंत्रालय
इन सत्रों का उद्देश्य पारंपरिक वैद्यों के तकनीकी ज्ञान, रोग पहचान, संदर्भ प्रणाली और सेवा वितरण क्षमताओं को मजबूत करना है, ताकि वे आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ बेहतर तालमेल बैठा सकें।
भारत जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला: एक ऐतिहासिक पहल
इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष रहा-जनजातीय कार्य मंत्रालय और आईसीएमआर-क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान केंद्र, भुवनेश्वर के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU)।
इस MoU के तहत देश की पहली राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला स्थापित की जाएगी, जिसे “भारत जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला” नाम दिया गया है।
वेधशाला के प्रमुख उद्देश्य
- जनजाति-विशिष्ट स्वास्थ्य निगरानी को संस्थागत रूप देना
- स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर कार्यान्वयन आधारित अनुसंधान
- मलेरिया, कुष्ठ रोग और क्षय रोग जैसी बीमारियों के उन्मूलन हेतु शोध-आधारित रणनीतियाँ
- जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी विभाजित आंकड़ों की कमी को दूर करना
सरकार के अनुसार, यह पहल एक लंबे समय से चली आ रही राष्ट्रीय कमी को पूरा करेगी, क्योंकि अब तक जनजातीय समुदायों के लिए साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य योजना बनाने हेतु पर्याप्त और विशिष्ट डेटा उपलब्ध नहीं था।
सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य: समावेशी और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील स्वास्थ्य मॉडल
स्वास्थ्य नीति के सिद्धांतों के अनुसार, प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली वही होती है जो स्थानीय ज्ञान, संस्कृति और सामुदायिक भागीदारी को महत्व दे।
आदिवासी वैद्यों को औपचारिक मान्यता देना-
- समावेशी स्वास्थ्य मॉडल को बढ़ावा देता है
- पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के बीच पूरक संबंध स्थापित करता है
- समुदाय के भरोसे को मजबूत करता है
यह पहल “टॉप-डाउन” मॉडल के बजाय भागीदारी आधारित शासन का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
संभावित चुनौतियाँ
हालाँकि यह कदम ऐतिहासिक है, फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी रह सकती हैं-
- पारंपरिक उपचार और आधुनिक चिकित्सा के बीच वैज्ञानिक मानकीकरण
- बौद्धिक संपदा और पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा
- प्रशिक्षण और निगरानी की निरंतरता
- निजी कंपनियों के साथ साझेदारी में शोषण की आशंका
इन चुनौतियों से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश, नैतिक ढांचा और मजबूत नियामक व्यवस्था आवश्यक होगी।
जनजातीय विकास और स्वास्थ्य का आपसी संबंध
स्वास्थ्य केवल रोगमुक्ति नहीं, बल्कि शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सशक्तिकरण से भी जुड़ा है। जनजातीय क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ-
- स्कूल ड्रॉपआउट कम कर सकती हैं
- श्रम उत्पादकता बढ़ा सकती हैं
- गरीबी और कुपोषण के दुष्चक्र को तोड़ सकती हैं
इस दृष्टि से आदिवासी वैद्यों को मान्यता देना समग्र जनजातीय विकास की नींव रख सकता है।
निष्कर्ष :
एक लाख आदिवासी वैद्यों को औपचारिक मान्यता देने और भारत जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला की स्थापना की पहल भारत की स्वास्थ्य नीति में एक दृष्टिकोणात्मक परिवर्तन का संकेत है। यह न केवल पारंपरिक ज्ञान को सम्मान देती है, बल्कि आधुनिक विज्ञान के साथ उसे जोड़कर जनजातीय समुदायों के लिए सुलभ, भरोसेमंद और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त करती है।
यदि इसे संवेदनशीलता, पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टि से लागू किया गया, तो यह पहल जनजातीय भारत के स्वास्थ्य परिदृश्य को स्थायी रूप से बदल सकती है।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न
प्रश्न :
भारत सरकार द्वारा जनजातीय स्वास्थ्य के सुदृढ़ीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- केंद्र सरकार एक लाख आदिवासी पारंपरिक वैद्यों को औपचारिक मान्यता देने का लक्ष्य रखती है।
- भारत जनजातीय स्वास्थ्य वेधशाला की स्थापना आईसीएमआर के सहयोग से की जा रही है।
- इस पहल का उद्देश्य जनजाति-विशिष्ट स्वास्थ्य डेटा और अनुसंधान को संस्थागत रूप देना है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
मुख्य परीक्षा प्रश्न (सामान्य अध्ययन – II/III)
“पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली का समन्वय जनजातीय समुदायों के स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बना सकता है।”
भारत सरकार द्वारा आदिवासी वैद्यों को औपचारिक मान्यता देने की पहल के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।
