संदर्भ :
भारत की विदेश नीति में आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि स्पष्ट कूटनीतिक सिद्धांत बन चुकी है। इसी क्रम में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की के साथ द्विपक्षीय बातचीत के दौरान पाकिस्तान को लेकर भारत का रुख बिना किसी संकोच के सामने रखा।
जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि पाकिस्तान में मौजूद आतंकवाद के इंफ्रास्ट्रक्चर को किसी भी प्रकार का “खाद-पानी” नहीं दिया जाना चाहिए, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस विषय में चुनिंदा रवैये से बचना होगा।
यह बयान केवल भारत-पोलैंड संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की सिद्धांत आधारित विदेश नीति को दर्शाता है।
सिकोरस्की ने पोलैंड के 2025 के पाकिस्तान यात्रा के दौरान आए संयुक्त बयान का हवाला दिया था, जिसमें जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का पक्ष और ‘शांतिपूर्वक समाधान’ की बात रखी गई थी। इससे भारत ने इसे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और पाकिस्तान के दृष्टिकोण को अनर्गल समर्थन जैसा माना। जयशंकर ने इस बयान पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि आतंकवाद को बढ़ावा देने या पाकिस्तान को समर्थन देने वाली किसी भी टिप्पणी को वह स्वीकार नहीं करेंगे और आतंकवाद के प्रति “जीरो टॉलरेंस” की आवश्यकता दोहराई।
आतंकवाद पर भारत की ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ नीति
जयशंकर ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता-
- न वैचारिक आधार पर
- न भौगोलिक मजबूरियों के नाम पर
- और न ही राजनीतिक लाभ के लिए
उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से सीमा-पार आतंकवाद का सामना करता आ रहा है और यह अनुभव उसे यह सिखाता है कि आतंकवाद को पालने-पोसने वाले ढांचे अंततः पूरे क्षेत्र और विश्व के लिए खतरा बनते हैं।
उनका संदेश था कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय वास्तव में शांति और स्थिरता चाहता है, तो उसे आतंकवाद के स्रोतों पर भी उतनी ही सख्ती दिखानी होगी जितनी उसके परिणामों पर।
पाकिस्तान और आतंकवादी ढांचे का प्रश्न
भारत का यह रुख कोई नया नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसे अधिक स्पष्ट और मुखर रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
जयशंकर के वक्तव्य का सैद्धांतिक आधार यह है कि-
- आतंकवादी संगठनों को केवल “गैर-राज्य तत्व” कहना समस्या को अधूरा समझना है
- जब किसी राज्य की भूमि, संसाधन या संरक्षण आतंकवाद को मिलते हैं, तो वह राज्य-प्रायोजित आतंकवाद की श्रेणी में आता है
भारत का तर्क है कि पाकिस्तान में दशकों से ऐसा ही ढांचा मौजूद रहा है, जिसे समय-समय पर भू-राजनीतिक कारणों से अनदेखा किया गया।
यूक्रेन संघर्ष और ‘चुनिंदा निशाना’ बनाने का मुद्दा
जयशंकर ने अपने वक्तव्य में यूक्रेन संघर्ष का भी उल्लेख किया और कहा कि भारत ने इस विषय पर हमेशा अपने विचार खुले तौर पर रखे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि-
“भारत को सेलेक्टिव तौर पर टारगेट करना न केवल अनुचित है, बल्कि पूरी तरह बेबुनियाद भी है।”
यह टिप्पणी उन पश्चिमी आलोचनाओं की ओर संकेत करती है, जिनमें भारत से अपेक्षा की जाती है कि वह वैश्विक मुद्दों पर एक-तरफा रुख अपनाए।
भारत का दृष्टिकोण यह है कि-
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोहरे मापदंड स्वीकार्य नहीं
- नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए
पोलैंड की सहमति और साझा अनुभव
पोलैंड के विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की ने जयशंकर के विचारों से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि पोलैंड स्वयं-
- आतंकवाद
- आगजनी
- और अस्थिरता
का शिकार रहा है, इसलिए वह सीमा-पार आतंकवाद से निपटने की आवश्यकता को भली-भांति समझता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद और वैश्विक व्यापार में असंतुलन, दोनों ही अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरे हैं।
टैरिफ और वैश्विक व्यापार में ‘चुनिंदा नीति’
टैरिफ के मुद्दे पर पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री ने कहा कि चुनिंदा देशों को निशाना बनाना वैश्विक व्यापार को अस्थिर कर सकता है।
इस पर जयशंकर ने स्पष्ट किया कि-
“चुनिंदा निशाना बनाना केवल टैरिफ तक सीमित नहीं है; यह कई अन्य क्षेत्रों में भी देखा गया है।”
यह कथन भारत की उस सोच को दर्शाता है जिसमें-
- व्यापार
- राजनीति
- और सुरक्षा
को अलग-अलग खांचों में नहीं, बल्कि एक समग्र ढांचे के रूप में देखा जाता है।
सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य: भारत की सिद्धांत आधारित विदेश नीति
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों में भारत की वर्तमान विदेश नीति को Normative Realism के रूप में देखा जा सकता है-
- जहाँ राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं
- लेकिन नैतिक और कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की जाती
आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का आग्रह इसी सिद्धांत से निकलता है। भारत यह मानता है कि-
- यदि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई चयनात्मक होगी
- तो वह कभी भी निर्णायक नहीं हो सकती
भारत-यूरोप संबंध और पोलैंड की भूमिका
जयशंकर ने यह भी संकेत दिया कि भारत यूरोप के साथ अपने संबंधों को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता है।
पोलैंड जैसे देश-
- यूरोपीय संघ के भीतर
- और पूर्वी यूरोप में
भारत के लिए अहम साझेदार बन सकते हैं, विशेषकर सुरक्षा, ऊर्जा और कनेक्टिविटी के क्षेत्रों में।
निष्कर्ष :
पोलैंड में एस. जयशंकर का बयान केवल एक कूटनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति का सिद्धांतात्मक घोषणापत्र है।
भारत स्पष्ट कर चुका है कि-
- आतंकवाद के प्रति कोई समझौता नहीं
- दोहरे मापदंड स्वीकार्य नहीं
- और राष्ट्रीय हितों से समझौता असंभव है
यह रुख आने वाले समय में भारत को एक आत्मविश्वासी और सिद्धांत-निष्ठ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा।
प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न
भारत की विदेश नीति के संदर्भ में ‘आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता’ नीति का क्या अर्थ है?
(a) केवल घरेलू आतंकवाद से निपटना
(b) आतंकवाद के सभी रूपों और स्रोतों का विरोध
(c) केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा सूचीबद्ध संगठनों का विरोध
(d) आतंकवाद को आंतरिक मामला मानना
मुख्य परीक्षा प्रश्न (सामान्य अध्ययन – II)
आतंकवाद के प्रति भारत की ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ नीति उसके विदेश नीति दृष्टिकोण को कैसे परिभाषित करती है?
पोलैंड में दिए गए एस. जयशंकर के वक्तव्य के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
