ऊर्जा क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक संस्था एम्बर की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था का विद्युतीकरण चीन की तुलना में अधिक तेज़ी से कर रहा है और विकास के समान स्तर पर प्रति व्यक्ति जीवाश्म ईंधन की खपत भी काफी कम रखे हुए है। यह रिपोर्ट उभरती अर्थव्यवस्थाओं के ऊर्जा विकास को लेकर बनी पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देती है।
पुरानी विकास अवधारणा से अलग रास्ता
अब तक यह माना जाता रहा है कि विकासशील देशों को पहले बायोमास से कोयला और तेल जैसे जीवाश्म ईंधन की ओर बढ़ना पड़ता है और उसके बाद ही वे स्वच्छ ऊर्जा को अपनाते हैं। पश्चिमी देशों और चीन ने भी इसी मॉडल का पालन किया था।
हालांकि, भारत का अनुभव दिखाता है कि यह रास्ता अब अनिवार्य नहीं रह गया है।
एम्बर के रणनीतिकार और रिपोर्ट के सह-लेखक किंग्समिल बॉन्ड ने कहा कि भारत यह साबित कर रहा है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ सीधे स्वच्छ ऊर्जा और बिजली आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ा जा सकता है।
चीन से निष्पक्ष तुलना
भारत और चीन की तुलना करते समय एम्बर ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर समायोजित किया, जिससे जीवन-यापन की लागत के अंतर को शामिल किया जा सके।
इस आधार पर भारत की वर्तमान प्रति व्यक्ति आय लगभग 11,000 डॉलर है, जो चीन की 2012 की आय के बराबर मानी जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, इसी आय स्तर पर भारत अपनी अर्थव्यवस्था का विद्युतीकरण चीन की तुलना में तेज़ी से कर रहा है और प्रति व्यक्ति कोयला व तेल का उपयोग काफी कम कर रहा है।
जीवाश्म ईंधन की सीमित भूमिका
रिपोर्ट बताती है कि विकास के समान चरणों पर भारत की प्रति व्यक्ति कोयला और तेल की खपत, चीन की तुलना में बहुत कम है। कुल स्तर पर भी भारत में जीवाश्म ईंधन की खपत की वृद्धि चीन की तुलना में धीमी बनी हुई है, जबकि भारत अभी औद्योगीकरण के शुरुआती चरण में है।
कोयला और तेल अभी भी मौजूद
रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि भारत अभी पूरी तरह जीवाश्म ईंधन से मुक्त नहीं हुआ है। कोयला अभी भी बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत बना हुआ है और सरकार 2047 तक कोयला आधारित क्षमता बढ़ाने की योजनाओं पर विचार कर रही है।
इसके अलावा, देश में तेल की मांग भी बढ़ रही है और हाल के वर्षों में इसकी वृद्धि दर चीन से अधिक रही है।
सस्ती तकनीक से मिल रहा फायदा
इसके बावजूद, भारत की ऊर्जा दिशा अलग दिखाई देती है। सौर ऊर्जा, बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहनों की लागत में भारी गिरावट आई है, जिससे भारत को लाभ मिल रहा है। जब चीन ने बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण शुरू किया था, तब ये तकनीकें कहीं अधिक महंगी थीं।
इलेक्ट्रिक वाहन बदल रहे तस्वीर
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत में नई कारों की बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत रही।
जब चीन इस स्तर पर पहुंचा था, उस समय सड़क परिवहन में उसकी प्रति व्यक्ति तेल खपत आज के भारत की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत अधिक थी।
इससे संकेत मिलता है कि भारत की तेल मांग का भविष्य चीन से अलग हो सकता है।
‘इलेक्ट्रोस्टेट’ की ओर भारत
एम्बर के विशेषज्ञ भारत को एक उभरते हुए ‘इलेक्ट्रोस्टेट’ के रूप में देखते हैं – ऐसा देश जो अपनी अधिकांश ऊर्जा जरूरतें घरेलू स्तर पर उत्पादित स्वच्छ बिजली से पूरी करता है, न कि आयातित जीवाश्म ईंधन से।
आर्थिक कारण सबसे अहम
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और चीन स्वच्छ ऊर्जा की ओर केवल जलवायु कारणों से नहीं बढ़ रहे हैं, बल्कि इसके पीछे मजबूत आर्थिक तर्क हैं।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, भारत अपनी प्राथमिक ऊर्जा जरूरतों का 40 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, जिससे हर साल लगभग 150 अरब डॉलर का बोझ पड़ता है।
चीन पर निर्भरता बनी चुनौती
हालांकि, भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा में एक बड़ी चुनौती चीन पर निर्भर आपूर्ति श्रृंखला है। सोलर पैनल, बैटरी और उनसे जुड़े उपकरणों के निर्माण में चीन का दबदबा है।
हाल ही में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को चीन से जरूरी उपकरण न मिलने के कारण लिथियम-आयन बैटरी निर्माण की योजना रोकनी पड़ी।
निष्कर्ष:
एम्बर की रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए विकास का रास्ता अब बदल रहा है। भारत का अनुभव दिखाता है कि तेज़ आर्थिक वृद्धि के साथ जीवाश्म ईंधन पर लंबी निर्भरता जरूरी नहीं है।
स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक मजबूती को एक साथ साधने का यह मॉडल आने वाले वर्षों में अन्य विकासशील देशों के लिए भी दिशा दिखा सकता है।
