शांति के नाम पर शक्ति-प्रदर्शन:दावोस के बाद वॉशिंगटन की नाराज़गी, कनाडा को बाहर कर ट्रम्प ने क्या संदेश दिया?

जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कनाडा को तथाकथित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से बाहर किए जाने की घोषणा को केवल एक व्यक्तिगत नाराज़गी या राजनयिक बयान के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। यह घटना उस व्यापक वैश्विक परिवर्तन का हिस्सा है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय संबंध सहयोग से हटकर दबाव, प्रतिस्पर्धा और शक्ति-प्रदर्शन की ओर बढ़ रहे हैं

 

यह विवाद ऐसे समय सामने आया जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने विश्व आर्थिक मंच (WEF) (दावोस) में अपने भाषण के दौरान महाशक्तियों द्वारा टैरिफ, वित्तीय प्रणालियों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को “राजनीतिक हथियार” के रूप में इस्तेमाल करने की खुली आलोचना की। यद्यपि उन्होंने अमेरिका या ट्रम्प का नाम नहीं लिया, लेकिन संकेत स्पष्ट थे।

 

इसके कुछ ही दिनों बाद ट्रम्प द्वारा कनाडा का आमंत्रण सार्वजनिक रूप से रद्द करना यह दिखाता है कि आज की वैश्विक राजनीति में असहमति की कीमत चुकानी पड़ सकती है, विशेषकर तब जब आलोचना किसी महाशक्ति की नीतियों पर हो।

‘बोर्ड ऑफ पीस’: बहुपक्षीयता का विकल्प या शक्ति का औज़ार?

ट्रम्प द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को उन्होंने “इतिहास का सबसे प्रतिष्ठित वैश्विक नेतृत्व मंच” बताया, लेकिन इसके स्वरूप, अधिकार और उद्देश्य को लेकर कोई स्पष्ट संस्थागत ढांचा सामने नहीं आया। न यह संयुक्त राष्ट्र जैसी किसी बहुपक्षीय संस्था से जुड़ा है, न ही इसकी सदस्यता के नियम पारदर्शी हैं।

 

यहीं से यह प्रश्न उठता है कि क्या यह मंच वास्तव में शांति और सहयोग के लिए है, या फिर महाशक्ति के नेतृत्व में एक ऐसा मंच है जहाँ शामिल होने की शर्त राजनीतिक अनुकूलता और निष्ठा हो। कनाडा को पहले आमंत्रित करना और फिर असहमति के बाद बाहर कर देना इस आशंका को मजबूत करता है।

 

यह प्रवृत्ति बताती है कि पारंपरिक बहुपक्षीय संस्थाओं की जगह अब अनौपचारिक, व्यक्ति-केंद्रित और शक्ति-आधारित मंच उभर रहे हैं, जिनमें नियमों से अधिक महत्व राजनीतिक वफादारी का है। यह वैश्विक शासन की अवधारणा के लिए एक गंभीर चुनौती है।

 

शक्तियाँ बनाम महाशक्तियाँ

कनाडा जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मध्य शक्ति कहा जाता है। ये देश न तो अमेरिका या चीन जैसी महाशक्तियाँ हैं, और न ही इतने कमजोर कि उनकी आवाज़ अनसुनी कर दी जाए। मध्य शक्तियाँ अक्सर नियम-आधारित व्यवस्था, बहुपक्षीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून पर ज़ोर देती हैं, क्योंकि यही उनके हितों की रक्षा करता है।

 

मार्क कार्नी का दावोस भाषण इसी सोच का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आज की दुनिया में “नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” व्यवहार में कमजोर पड़ चुकी है और उसकी जगह भू-आर्थिक दबाव (Geoeconomic Coercion) ने ले ली है—जहाँ व्यापार, टैरिफ, तकनीक और सप्लाई चेन को राजनीतिक दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

इसके विपरीत, ट्रम्प की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि महाशक्तियाँ आलोचना को केवल असहमति नहीं, बल्कि अपने नेतृत्व को चुनौती के रूप में देखती हैं। उनका यह कथन कि “कनाडा अमेरिका की वजह से जीवित है” सुरक्षा सहयोग को अधीनता और कृतज्ञता से जोड़ता है, जो आधुनिक कूटनीति की मूल भावना से टकराता है।

 

व्यापक भू-आर्थिक संदर्भ और वैश्विक प्रभाव

इस विवाद को चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भी देखना आवश्यक है। कनाडा द्वारा चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना और अमेरिका पर निर्भरता कम करने की कोशिश ट्रम्प प्रशासन को असहज करती रही है। आज की वैश्विक राजनीति में देशों से अपेक्षा की जा रही है कि वे “किस खेमे में हैं” यह स्पष्ट करें, जबकि रणनीतिक स्वायत्तता की गुंजाइश सिकुड़ती जा रही है।

 

यह प्रवृत्ति केवल कनाडा तक सीमित नहीं है। यूरोप, एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी कई देश इसी दुविधा का सामना कर रहे हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण सबक देता है कि बहुपक्षीय मंचों की कमजोरी के दौर में संतुलित, आत्मनिर्भर और विविधीकृत कूटनीति अत्यंत आवश्यक है

 

निष्कर्ष:

कनाडा को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से बाहर किया जाना एक प्रतीकात्मक घटना है, जो यह दिखाती है कि 21वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति सहयोग से अधिक दबाव और प्रतिस्पर्धा पर आधारित होती जा रही है। यह विवाद बताता है कि आज मंचों की सदस्यता, आमंत्रण और बहिष्कार भी शक्ति-प्रदर्शन के औज़ार बन चुके हैं।

 

मार्क कार्नी का भाषण मध्य शक्तियों की बढ़ती बेचैनी को दर्शाता है, जबकि ट्रम्प की प्रतिक्रिया महाशक्तियों की असहिष्णुता को। आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यवस्था इस टकराव से ही आकार लेगी—जहाँ सवाल यह होगा कि क्या दुनिया फिर से नियमों और सहयोग की ओर लौटेगी, या शक्ति और दबाव ही नया सामान्य बन जाएगा।

 

प्रीलिम्स प्रश्न

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भू-आर्थिक दबाव (Geoeconomic Coercion) में व्यापार, टैरिफ और वित्तीय प्रणालियों का राजनीतिक उद्देश्य से प्रयोग किया जाता है।
  2. World Economic Forum संयुक्त राष्ट्र की एक औपचारिक एजेंसी है।
  3. मध्य शक्तियाँ सामान्यतः बहुपक्षीयता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करती हैं।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) 1 और 3 केवल
(b) 1 और 2 केवल
(c) 2 और 3 केवल
(d) 1, 2 और 3

 

मेन्स प्रश्न (GS-II)

“भू-आर्थिक दबाव समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक प्रमुख विशेषता बनता जा रहा है।” अमेरिका-कनाडा के हालिया विवाद के संदर्भ में इस कथन की सैद्धांतिक और आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।

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