अफगान युद्ध पर ट्रम्प के बयान से NATO सहयोगियों में नाराज़गी, ब्रिटेन की तीखी प्रतिक्रिया

जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा यह कहना कि अफगानिस्तान युद्ध के दौरान गैर-अमेरिकी NATO सेनाएँ “फ्रंट लाइन से थोड़ा पीछे रहीं”, केवल एक तथ्यात्मक भूल नहीं थी, बल्कि यह NATO सहयोगियों के बलिदान को कमतर आँकने वाला बयान माना गया।


इस टिप्पणी ने विशेष रूप से ब्रिटेन में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की, क्योंकि अफगान युद्ध में ब्रिटेन ने अमेरिका के बाद सबसे अधिक सैनिकों को तैनात किया था और भारी जान-माल की क्षति झेली थी।

 

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इस बयान को “अपमानजनक और भयावह” बताते हुए कहा कि यह स्वाभाविक है कि इससे पूरे देश में पीड़ा और आक्रोश फैला है। उन्होंने उन 457 ब्रिटिश सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने अफगानिस्तान में अपने प्राण गंवाए, और यह स्पष्ट किया कि ब्रिटेन उनके बलिदान को कभी नहीं भूलेगा।

 

यह विवाद ऐसे समय उभरा है जब ट्रम्प पहले से ही NATO की उपयोगिता, सामूहिक सुरक्षा और गठबंधन-आधारित व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। इसीलिए यह बयान केवल अतीत का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा राजनीति पर भी संकेत देता है।

अफगानिस्तान युद्ध और NATO की वास्तविक भूमिका

अफगानिस्तान युद्ध 2001 में 9/11 आतंकी हमलों के बाद शुरू हुआ था। यह वह एकमात्र अवसर है जब NATO के अनुच्छेद-5 को सक्रिय किया गया, जिसके तहत किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना गया।


इसके बाद अमेरिका के आह्वान पर ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी, पोलैंड सहित अनेक देशों ने अपने सैनिक भेजे।

 

ब्रिटेन की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। ब्रिटिश सेनाएँ हेलमंद प्रांत जैसे अत्यंत खतरनाक इलाकों में तैनात रहीं, जहाँ प्रत्यक्ष युद्ध, बम विस्फोट और गुरिल्ला हमले आम थे। 2014 तक ब्रिटिश सैनिकों की सक्रिय भागीदारी बनी रही, जबकि अमेरिका 2021 तक वहाँ मौजूद रहा।

 

अंतरराष्ट्रीय आँकड़ों के अनुसार, गठबंधन सेनाओं के लगभग 3,486 सैनिक अफगान युद्ध में मारे गए, जिनमें से 2,300 से अधिक अमेरिकी थे, लेकिन शेष बलिदान भी किसी भी तरह “पीछे रहकर” नहीं दिए गए थे।


यही कारण है कि ट्रम्प का बयान ऐतिहासिक तथ्यों और सैन्य वास्तविकताओं—दोनों के विपरीत माना गया।

 

ट्रान्स-अटलांटिक संबंधों पर असर: स्मृति, सम्मान और भरोसा

ब्रिटेन-अमेरिका संबंधों को लंबे समय से “विशेष संबंध” (Special Relationship) कहा जाता है। प्रधानमंत्री स्टारमर ने भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ निकटता ब्रिटेन की विदेश नीति का आधार बनी रहेगी। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि इसी गठबंधन की वजह से ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी

 

यहाँ मूल प्रश्न स्मृति और सम्मान का है। किसी युद्ध में भागीदारी केवल रणनीतिक निर्णय नहीं होती, बल्कि वह राष्ट्रीय पीड़ा, शहीदों की स्मृति और सामाजिक-राजनीतिक जिम्मेदारी से जुड़ी होती है।


जब एक सहयोगी देश का नेता उस बलिदान को कमतर बताता है, तो यह केवल राजनयिक असहमति नहीं रह जाती—यह सार्वजनिक भरोसे और गठबंधन की नैतिक नींव को प्रभावित करती है।

 

ब्रिटेन के रक्षा मंत्री, विपक्षी नेता, यहाँ तक कि शाही परिवार के सदस्य Prince Harry तक ने यह कहा कि अफगान युद्ध में सहयोगी देशों ने एक-दूसरे के लिए जान दी और उन बलिदानों के साथ सत्य और सम्मान से पेश आना चाहिए।

 

NATO का भविष्य और ‘अमेरिका-फर्स्ट’ सोच

ट्रम्प ने हालिया वर्षों में NATO पर बार-बार यह आरोप लगाया है कि सहयोगी देश अमेरिका पर निर्भर हैं और पर्याप्त योगदान नहीं देते। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अमेरिका को NATO की ज़रूरत नहीं पड़ी।


यह दृष्टिकोण ‘अमेरिका-फर्स्ट’ नीति का विस्तार है, जिसमें बहुपक्षीय गठबंधनों को बोझ के रूप में देखा जाता है।

 

लेकिन आधुनिक सुरक्षा वातावरण में—जहाँ रूस-यूक्रेन संघर्ष, आतंकवाद और हिंद-प्रशांत तनाव मौजूद हैं—NATO केवल एक सैन्य संगठन नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास और सामूहिक प्रतिरोध का ढांचा है।


यदि गठबंधन के भीतर सम्मान और सत्य पर आधारित संवाद कमजोर पड़ता है, तो इसका असर यूरोपीय सुरक्षा, वैश्विक स्थिरता और अमेरिका की विश्वसनीयता—तीनों पर पड़ सकता है।

 

पोलैंड जैसे देशों की प्रतिक्रिया बताती है कि यह मुद्दा केवल ब्रिटेन तक सीमित नहीं है। कई NATO सदस्य इसे साझा इतिहास और साझे बलिदान के अपमान के रूप में देख रहे हैं।

 

निष्कर्ष:

ट्रम्प का अफगानिस्तान संबंधी बयान एक व्यक्तिगत टिप्पणी से कहीं अधिक है। यह इतिहास, गठबंधन और स्मृति-राजनीति से जुड़ा प्रश्न है। अफगान युद्ध ने दिखाया था कि NATO सहयोगियों ने अमेरिका के आह्वान पर एकजुट होकर कार्य किया और भारी कीमत चुकाई।
ऐसे में उन बलिदानों को कमतर आँकना ट्रान्स-अटलांटिक रिश्तों की आत्मा को ठेस पहुँचाता है।

 

भविष्य में NATO की मजबूती केवल सैन्य बजट या सैनिक संख्या पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि सदस्य देश एक-दूसरे के इतिहास, दर्द और योगदान का कितना सम्मान करते हैं। यही सम्मान किसी भी गठबंधन की असली ताकत होता है।

 

UPSC प्रीलिम्स प्रश्न

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. NATO के अनुच्छेद-5 को अब तक केवल एक बार सक्रिय किया गया है।
  2. अफगानिस्तान युद्ध में ब्रिटेन ने 2014 तक सक्रिय सैन्य भूमिका निभाई।
  3. अफगानिस्तान युद्ध में सबसे अधिक हताहत NATO देशों में पोलैंड के हुए।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) 1 और 2 केवल
(b) 1 और 3 केवल
(c) 2 और 3 केवल
(d) 1, 2 और 3

 

UPSC मेन्स प्रश्न (GS-II)

अफगानिस्तान युद्ध के संदर्भ में NATO सहयोगियों के बलिदान पर हालिया विवाद ट्रान्स-अटलांटिक संबंधों की किन कमजोरियों को उजागर करता है?
गठबंधन राजनीति में स्मृति और सम्मान की भूमिका पर चर्चा कीजिए।