बग़दाद की कुर्सी पर वॉशिंगटन की नज़र: नूरी अल-मलिकी की वापसी से क्यों कांप रहा है अमेरिका?

मिडिल ईस्ट पहले से ही अस्थिरता, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और महान शक्तियों के टकराव से जूझ रहा है। ऐसे समय में इराक की आंतरिक राजनीति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा यह चेतावनी देना कि यदि इराक में नूरी अल‑मलिकी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाया गया तो अमेरिका अपना समर्थन वापस ले लेगा-यह बयान केवल कूटनीतिक असहमति नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व की शक्ति-संतुलन राजनीति का संकेत है।

 

यह विवाद इराक के आगामी सरकार गठन, अमेरिका-ईरान प्रतिस्पर्धा, और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के भविष्य से गहराई से जुड़ा हुआ है।

 

नूरी अल-मलिकी का राजनीतिक अतीत:

नूरी अल-मलिकी ने 2006 से 2014 तक इराक के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया-यह पोस्ट-सद्दाम काल का सबसे लंबा कार्यकाल था। 2003 में अमेरिकी आक्रमण के बाद जब इराक संस्थागत शून्यता और संप्रदायिक हिंसा में फंसा था, तब मलिकी को एक “समझौता उम्मीदवार” के रूप में सत्ता सौंपी गई।

 

प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने शिया-सुन्नी-कुर्द साझेदारी की सरकार चलाई और अमेरिकी सैन्य सहयोग के साथ अल-कायदा तथा मिलिशिया समूहों के खिलाफ कार्रवाई की। इसी काल में 2006 में सद्दाम हुसैन को फांसी की मंजूरी भी दी गई-जिसे कई विश्लेषक इराक में संप्रदायिक विभाजन को गहरा करने वाला क्षण मानते हैं।

 

समय के साथ मलिकी पर सत्ता के केंद्रीकरण, सुरक्षा बलों के राजनीतिकरण, भ्रष्टाचार और नेपोटिज्म के आरोप लगे। सुन्नी समुदाय के हाशियाकरण ने असंतोष को जन्म दिया, जिसका लाभ उठाकर ISIS जैसे उग्रवादी संगठन उभरे। 2014 में आईएसआईएस के मोसुल पर कब्जे के बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव में उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

अमेरिका की चिंता:

मलिकी को शिया राजनीति का प्रतिनिधि माना जाता है और वे ईरान के करीबी सहयोगी माने जाते हैं। ट्रम्प प्रशासन ईरान को मध्य-पूर्व में अपने प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। इसीलिए मलिकी की वापसी को अमेरिका इराक में ईरानी प्रभाव के विस्तार के रूप में देख रहा है।

 

ट्रम्प का यह कथन कि “अमेरिकी सहायता के बिना इराक के पास समृद्धि या सुरक्षा का कोई रास्ता नहीं”-इराक की संप्रभुता बनाम बाहरी निर्भरता की बहस को भी उजागर करता है। यह चेतावनी उस समय आई है जब अमेरिकी विदेश मंत्री ने वर्तमान प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल‑सुदानी से संवाद कर क्षेत्रीय स्थिरता की अपेक्षा जताई थी।

 

इराक का संवैधानिक संकट और सत्ता-गणित

नवंबर 2025 में हुए संसदीय चुनावों के बाद इराक में कोई भी गठबंधन स्पष्ट बहुमत नहीं ला सका। 329 सदस्यीय संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद सरकार गठन के लिए व्यापक गठबंधन आवश्यक है। राष्ट्रपति चुनाव में देरी और कुर्द गुटों की असहमति ने राजनीतिक अनिश्चितता को और बढ़ा दिया।

 

24 जनवरी 2026 को शिया गठबंधन द्वारा मलिकी को प्रधानमंत्री पद के लिए नामित करना-इस जटिल सत्ता-गणित का परिणाम है। परंतु यह नामांकन इराक के भीतर ही नहीं, बाहर भी विवाद का कारण बन गया है।

 

अमेरिका-इराक रणनीतिक ढांचा: सहयोग और शर्तें

अमेरिका और इराक के संबंध केवल सैन्य सहायता तक सीमित नहीं हैं। 2008 में अमेरिका‑इराक स्ट्रैटेजिक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत सुरक्षा, आर्थिक विकास, शिक्षा, ऊर्जा और संस्थागत निर्माण में सहयोग का ढांचा बना।

 

इस समझौते के तहत अमेरिका इराकी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण, उपकरण और परामर्श देता है, साथ ही आर्थिक पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता में भी भूमिका निभाता है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा इस सहयोग को “शर्तों के साथ जारी” रखने की बात-यह दर्शाती है कि भविष्य में समर्थन राजनीतिक संरेखण पर निर्भर हो सकता है।

 

क्षेत्रीय और वैश्विक निहितार्थ

मलिकी की संभावित वापसी के कई दूरगामी परिणाम हो सकते हैं-

  • इराक में संप्रदायिक संतुलन फिर से बिगड़ने का खतरा
  • ईरान-अमेरिका टकराव का नया मोर्चा
  • आतंकवाद-रोधी सहयोग पर असर
  • तेल-ऊर्जा बाजारों और खाड़ी सुरक्षा पर प्रभाव

इराक भौगोलिक रूप से पश्चिम एशिया के केंद्र में स्थित है। उसकी अस्थिरता सीरिया, ईरान, खाड़ी देशों और वैश्विक शक्तियों के हितों को सीधे प्रभावित करती है।

 

निष्कर्ष:

नूरी अल-मलिकी की वापसी केवल एक व्यक्ति की राजनीति नहीं, बल्कि इराक की शासन-दिशा, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की सीमा का प्रश्न है। अमेरिका की चेतावनी यह दिखाती है कि मध्य-पूर्व में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ भी अक्सर भू-राजनीतिक गणनाओं से बंधी रहती हैं।

 

इराक के लिए चुनौती यह है कि वह आंतरिक स्थिरता, संप्रदायिक संतुलन और बाहरी शक्तियों के दबाव-तीनों के बीच संतुलन बनाए। वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए सबक यह है कि दीर्घकालिक शांति केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि समावेशी संस्थागत निर्माण से ही संभव है।