8 साल बाद ब्रिटिश PM पहुंचे चीन, क्या पश्चिम से दूरी बना रहा है ब्रिटेन?

आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर बुधवार को तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे पर चीन पहुंचे हैं। वर्ष 2018 में तत्कालीन प्रधानमंत्री थेरेसा मे की यात्रा के बाद यह पहला अवसर है जब कोई ब्रिटिश प्रधानमंत्री चीन की धरती पर कदम रख रहा है।

 

बदलती वैश्विक राजनीति का दौर

पिछले आठ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक विदेश नीति और उनके तीखे बयानों ने यूरोपीय राष्ट्रों को नए साझेदारों की तलाश करने पर मजबूर किया है। इस परिस्थिति में चीन उनके लिए एक सशक्त विकल्प के रूप में उभर रहा है।

 

चीन के लिए रवाना होने से पूर्व स्टार्मर ने स्पष्ट किया कि ब्रिटेन को अमेरिका और चीन के बीच किसी एक को चुनने की बाध्यता नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ संबंध यथावत बने रहेंगे, परंतु चीन जैसी महत्वपूर्ण शक्ति को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।

 

चीन के विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा को सकारात्मक संकेत बताते हुए कहा कि यह दोनों देशों के बीच विश्वास को मजबूत करेगी और द्विपक्षीय संबंधों में स्थायित्व लाएगी।

British PM visits China after 8 years

हुआवे प्रकरण: अतीत की छाया

दिलचस्प है कि आज जिस चीन को ब्रिटेन महत्वपूर्ण साझेदार बता रहा है, 2020 में कोरोना महामारी के दौरान उसने चीनी तकनीकी दिग्गज हुआवे को जासूसी के संदेह में देश से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

 

2010 में ब्रिटिश सरकार ने हुआवे को देश में मोबाइल नेटवर्क संचालन की अनुमति प्रदान की थी। उसी दौरान हुआवे के कार्यालय में ‘द सेल’ नामक एक विशेष विभाग स्थापित किया गया, जहां ब्रिटिश साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ हुआवे के खर्च पर उसके प्रत्येक हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की सघन जांच करते थे। इसका उद्देश्य किसी भी संदिग्ध कोड की पहचान करना था जिसका दुरुपयोग किया जा सकता हो।

 

फिर भी लगभग दस वर्षों तक चलने के बाद, 2020 में सरकार ने निर्णय लिया कि हुआवे को ब्रिटेन के 5G नेटवर्क से पूरी तरह हटाया जाएगा। संसदीय जांच में हुआवे और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गठजोड़ के प्रमाण मिले थे। पहले से स्थापित 5G उपकरणों को भी हटाने का आदेश दिया गया।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘द सेल’ चीन के साथ ब्रिटेन के जटिल संबंधों का प्रतीक बन गया है, जहां एक ओर सुरक्षा एजेंसियों की चिंताएं हैं तो दूसरी ओर निजी कंपनियां सस्ती तकनीक चाहती हैं और सरकार आर्थिक विकास की आकांक्षा रखती है।

 

यूरोप में चीन के प्रति बढ़ता रुझान

स्टार्मर की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब यूरोप और चीन के बीच कूटनीतिक गतिविधियां तीव्र हुई हैं। हाल के सप्ताहों में फिनलैंड और आयरलैंड के प्रधानमंत्री भी चीन की यात्रा कर चुके हैं। जर्मन चांसलर की भी फरवरी में चीन यात्रा की संभावना जताई जा रही है।

 

फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओरपो की राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात में, शी ने स्पष्ट किया कि चीन और यूरोपियन यूनियन साझेदार हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं, और सहयोग मतभेदों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

 

व्यावहारिक दृष्टिकोण की जरूरत

स्टार्मर ने स्वीकार किया है कि चीन के प्रति ब्रिटेन का रवैया कभी अत्यधिक उदार रहा तो कभी अत्यधिक कठोर। उनका कहना है कि वे चीन के साथ न तो ‘स्वर्णिम युग’ में विश्वास करते हैं और न ही ‘हिम युग’ जैसी अतिवादी सोच में।

 

किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर केरी ब्राउन के अनुसार, ब्रिटेन अब चीन को न मित्र मान रहा है न शत्रु, बल्कि एक ऐसी वास्तविकता स्वीकार कर रहा है जिसका सामना अवश्यंभावी है।

 

यात्रा के प्रमुख उद्देश्य

इस यात्रा के कई महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं – पिछले कुछ वर्षों में बिगड़े द्विपक्षीय संबंधों को पुनः संतुलित करना, ब्रिटिश कंपनियों के लिए चीन में नए व्यावसायिक अवसर तलाशना, और विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से जुड़कर ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना। साथ ही जलवायु परिवर्तन, तकनीकी सहयोग और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर संवाद स्थापित करना भी प्राथमिकता है।

 

चीन की आर्थिक शक्ति

चीन विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है जिसका GDP लगभग 19 ट्रिलियन डॉलर है। वैश्विक विनिर्माण में उसकी 30% हिस्सेदारी है – अर्थात प्रत्येक तीन में से एक उत्पाद चीन में निर्मित होता है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में उसका प्रभुत्व है। दुर्लभ खनिजों की प्रोसेसिंग में 90% और खनन में 70% हिस्सेदारी के साथ चीन अमेरिका और यूरोप को भी इन संसाधनों के लिए अपने ऊपर निर्भर बनाए हुए है।

 

इतिहास की पुनरावृत्ति?

एक दशक पूर्व 2015 में जब राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिटेन आए थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने उन्हें एक पारंपरिक पब में बीयर पिलाई थी और संबंधों को ‘स्वर्णिम युग’ घोषित किया था। उस समय लंदन को चीनी निवेश का प्रमुख केंद्र बनाने और परमाणु ऊर्जा जैसी बड़ी परियोजनाओं में चीन को शामिल करने की योजना थी।

 

लेकिन 2016 में ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने (ब्रेक्जिट) के फैसले, हांगकांग में चीन की सख्ती, और 2020 में हुआवे पर प्रतिबंध ने संबंधों को गहरा आघात पहुंचाया।

 

ट्रम्प प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प की आक्रामक नीतियां यूरोप और चीन को पुनः निकट ला रही हैं। बीजिंग के शोधकर्ताओं का कहना है कि ट्रम्प की नीतियों ने यूरोपीय संघ को चीन से जुड़ने पर विवश किया है।

 

लंदन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों के अनुसार, पिछली सरकार सख्त नियमों पर जोर देती थी, जबकि वर्तमान सरकार आर्थिक संबंधों को सुधारने पर केंद्रित है।

 

चुनौतियां और आलोचनाएं

हालांकि इस यात्रा की आलोचना भी हो रही है। कुछ पूर्व मंत्री और चीन आलोचक मानते हैं कि संबंध सुधार के प्रयास में शिनजियांग में उइगर मुसलमानों और हांगकांग में मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

 

हाल ही में ब्रिटेन ने लंदन के वित्तीय जिले के निकट चीन को विशाल दूतावास निर्माण की मंजूरी दी है, जो पहले सुरक्षा चिंताओं के कारण लंबित था।

 

स्टार्मर अपने साथ ब्रिटिश कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों को लाए हैं ताकि व्यापार विस्तार की संभावनाएं तलाशी जा सकें। यह यात्रा दर्शाती है कि वैश्विक राजनीति में व्यावहारिकता आदर्शवाद पर भारी पड़ रही है और देश अपने आर्थिक हितों को सर्वोपरि रख रहे हैं।