दिल्ली HC ने कूलिंग-ऑफ पीरियड पर उठाया सवाल, सिर्फ कागज़ों का रिश्ता तो क्या जबरन निभाना ज़रूरी?

दिल्ली हाईकोर्ट ने पारिवारिक कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि पति-पत्नी के बीच विवाह केवल कागज़ों तक सीमित रह गया हो और कभी वैवाहिक जीवन शुरू ही न हुआ हो, तो ऐसे रिश्ते को जबरन बनाए रखना कानून का उद्देश्य नहीं हो सकता। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आपसी सहमति से तलाक के लिए अनिवार्य एक वर्ष की प्रतीक्षा अवधि (कूलिंग-ऑफ पीरियड) माफ करने से इनकार कर दिया गया था।


न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की खंडपीठ ने कहा कि जिस विवाह में न तो सहवास हुआ हो, न संतान हो और न ही भविष्य में साथ रहने की कोई वास्तविक संभावना हो, उसमें पति-पत्नी को एक साल तक इंतजार करने के लिए बाध्य करना “अनावश्यक और टालने योग्य मानसिक कष्ट” के समान है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 19 तथा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 28 के तहत दायर की गई थी। अपील दिसंबर 9, 2025 को पारित उस आदेश के खिलाफ थी, जो साकेत स्थित फैमिली कोर्ट-02 (दक्षिण जिला) के प्रधान न्यायाधीश द्वारा दिया गया था।

 

मामले के अनुसार, पक्षकारों का विवाह 30 मार्च 2025 को आर्य समाज मंदिर में संपन्न हुआ था और 2 अप्रैल 2025 को इसका पंजीकरण कराया गया। हालांकि, विवाह के तुरंत बाद ही दोनों अपने-अपने माता-पिता के घरों में रहने लगे। यह तथ्य निर्विवाद रहा कि न तो पति-पत्नी ने कभी साथ रहना शुरू किया और न ही विवाह का कभी उपभोग (consummation) हुआ।

 

सात महीने में ही तलाक की अर्जी

विवाह के लगभग सात महीने के भीतर ही दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से तलाक लेने का निर्णय किया। इसके लिए उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-B(1) के तहत संयुक्त याचिका दायर की। चूंकि कानून के अनुसार विवाह के एक वर्ष पूरे होने से पहले तलाक की याचिका दाखिल नहीं की जा सकती, इसलिए उन्होंने धारा 14 के तहत एक अलग आवेदन भी दायर किया, जिसमें एक वर्ष की अवधि से छूट (leave) देने की मांग की गई।

 

हालांकि, फैमिली कोर्ट ने इस आवेदन को खारिज कर दिया। निचली अदालत का मानना था कि पक्षकार “असाधारण कठिनाई” (exceptional hardship) को साबित नहीं कर पाए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह को बचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए और विवाह का पंजीकरण, असाधारण कठिनाई के दावे को कमजोर करता है।

 

हाईकोर्ट में क्या दलीलें रखी गईं

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि पति वर्तमान में कनाडा में रह रहा है, जबकि पत्नी भारत में निवास कर रही है। पत्नी अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल के कारण विदेश जाकर बसने में असमर्थ है, वहीं पति के लिए भारत आकर स्थायी रूप से रहना संभव नहीं है।

 

वकील ने तर्क दिया कि ये परिस्थितियां जानबूझकर नहीं बनाई गईं, बल्कि व्यावहारिक और पारिवारिक मजबूरियों के कारण उत्पन्न हुई हैं। इन हालात में दांपत्य जीवन को फिर से शुरू करने की कोई वास्तविक संभावना नहीं है, जो अपने आप में असाधारण कठिनाई का मामला बनता है।

 

हाईकोर्ट की कानूनी व्याख्या

दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-B(1) और धारा 14 का विस्तार से परीक्षण किया। कोर्ट ने अपने ही पूर्ण पीठ के हालिया फैसले शिक्षा कुमारी बनाम संतोष कुमार (निर्णय दिनांक 17 दिसंबर 2025) का हवाला दिया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि यदि मामले में असाधारण कठिनाई या प्रतिवादी की ओर से असाधारण दुराचार हो, तो एक वर्ष की वैधानिक अवधि को माफ किया जा सकता है।

 

कोर्ट ने वर्तमान मामले के तथ्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि यह निर्विवाद है कि:

  • पति-पत्नी कभी साथ नहीं रहे
  • विवाह का कभी उपभोग नहीं हुआ
  • विवाह की शुरुआत से ही दोनों अलग-अलग रह रहे हैं
  • दंपती की कोई संतान नहीं है
  • भविष्य में साथ रहने की कोई यथार्थ संभावना नहीं है

 

न्यायालय ने कहा कि ये तथ्य एक जीवित और कार्यशील वैवाहिक संबंध की मूल आधारशिला को ही समाप्त कर देते हैं।

 

फैमिली कोर्ट की दलीलों पर असहमति

हाईकोर्ट ने विवाह पंजीकरण को लेकर फैमिली कोर्ट की टिप्पणी को भी खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह का पंजीकरण केवल एक वैधानिक औपचारिकता है और इससे वैवाहिक सामंजस्य, साथ रहने की इच्छा या विवाह की व्यवहारिकता का निर्धारण नहीं किया जा सकता।

 

इसके अलावा, विवाह को “बचाने” के प्रयासों पर फैमिली कोर्ट की टिप्पणी पर भी हाईकोर्ट ने कहा कि जब विवाह कभी व्यवहार में आया ही नहीं, तो उसे बचाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

 

अहम टिप्पणी

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि ऐसा विवाह, जो केवल कानून की नजर में मौजूद हो और वास्तविक जीवन में कभी अस्तित्व में ही न आया हो, उसे जारी रखने पर जोर देना पक्षकारों को बेवजह कष्ट झेलने के लिए मजबूर करना होगा। यह न तो कानून की भावना के अनुरूप है और न ही न्याय के हित में।

 

अंतिम आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के 9 दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 के तहत दायर आवेदन को मंजूरी दे दी और पक्षकारों को एक वर्ष की अवधि पूरी होने का इंतजार किए बिना, आपसी सहमति से तलाक की याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी।

 

मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया गया है, जिसे निर्देश दिया गया है कि वह कानून के अनुसार तलाक की याचिका पर शीघ्रता से आगे की कार्यवाही करे।