जनवरी 2026 में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से कमजोर होकर लगभग 92 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक पहुँच गया। हालांकि दिन के अंत में इसमें हल्की रिकवरी दिखी, फिर भी यह गिरावट आर्थिक और नीतिगत दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह गिरावट ऐसे समय में हुई है जब भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत विकास दर, नियंत्रित महंगाई और बेहतर औद्योगिक उत्पादन के संकेत दे रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब आर्थिक बुनियाद मजबूत है, तब मुद्रा क्यों कमजोर हो रही है।
रुपये पर दबाव बढ़ने का एक प्रमुख तात्कालिक कारण डॉलर की बढ़ी हुई मांग रही। नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) सौदों की मैच्योरिटी, आयातकों की भुगतान जरूरतें और कंपनियों द्वारा किए गए हेजिंग सौदों ने बाजार में डॉलर की मांग को अचानक बढ़ा दिया। इसके अलावा महीने के अंत में होने वाले अंतरराष्ट्रीय भुगतान भी रुपये पर दबाव डालते हैं।
वैश्विक कारक और डॉलर की मजबूती
रुपये की कमजोरी को केवल घरेलू कारणों से नहीं समझा जा सकता। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बनाया है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने के बावजूद, डॉलर इंडेक्स में सुधार देखा गया, जिससे निवेशकों का रुझान सुरक्षित अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर बढ़ा।
इसके साथ ही, भू-राजनीतिक अनिश्चितता, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (risk aversion) को बढ़ाया। इसका सीधा असर यह हुआ कि विदेशी निवेशकों ने उभरते बाजारों से पूंजी निकालनी शुरू की, जिससे रुपये जैसी मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया।
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भी एक अहम कारण है। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत का आयात बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग और रुपये पर दबाव दोनों बढ़ जाते हैं।
RBI की भूमिका और नीतिगत दुविधा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये की अत्यधिक गिरावट को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया। आमतौर पर RBI डॉलर बेचकर रुपये की आपूर्ति को संतुलित करता है, ताकि बाजार में घबराहट न फैले और गिरावट नियंत्रित रहे। हालांकि, इस हस्तक्षेप का एक दूसरा पहलू भी है।
जब RBI डॉलर बेचता है, तो बैंकिंग सिस्टम से रुपये की तरलता (liquidity) निकल जाती है। इससे ब्याज दरों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है। हाल के दिनों में यह देखा गया है कि ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप (OIS) दरें बढ़ी हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि बाजार को कड़ा मौद्रिक रुख दिख रहा है, जबकि वास्तव में महंगाई और विकास दर ऐसी सख्ती की मांग नहीं करती।
यह स्थिति RBI के लिए एक नीतिगत दुविधा पैदा करती है। एक ओर उसे रुपये की स्थिरता बनाए रखनी है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक वृद्धि को सहारा देने के लिए पर्याप्त तरलता भी सुनिश्चित करनी है। इसके अलावा, लगातार हस्तक्षेप करने से विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव पड़ सकता है।
मजबूत आर्थिक संकेतक लेकिन कमजोर मुद्रा
रुपये की कमजोरी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि भारत के आर्थिक संकेतक मजबूत बने हुए हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, आने वाले वित्त वर्ष में भारत की GDP वृद्धि दर 6.8% से 7.2% के बीच रहने की संभावना है। औद्योगिक उत्पादन में तेजी आई है और महंगाई RBI के लक्ष्य दायरे में है।
फिर भी, मुद्रा बाजार केवल घरेलू विकास दर से संचालित नहीं होता। विदेशी निवेश प्रवाह, वैश्विक ब्याज दरें, व्यापार संतुलन और भू-राजनीतिक कारक भी मुद्रा की दिशा तय करते हैं। हाल के महीनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर निकासी ने रुपये को कमजोर किया है।
हालांकि, कमजोर रुपया पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। इससे भारतीय निर्यात अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं और ऊँचे अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है। समस्या तब होती है जब गिरावट तेज और अस्थिर हो, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ता है और आयातित महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा होता है।
निष्कर्ष:
भारतीय रुपये की हालिया गिरावट यह दिखाती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ी किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए केवल मजबूत घरेलू आंकड़े पर्याप्त नहीं होते। पूंजी प्रवाह, डॉलर की वैश्विक स्थिति, तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक घटनाएँ मुद्रा की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। RBI के लिए चुनौती यह है कि वह रुपये की स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक विकास को बाधित न होने दे। दीर्घकाल में, निर्यात विविधीकरण, ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करना, और स्थिर विदेशी निवेश आकर्षित करना ही रुपये को स्थायी मजबूती दे सकता है।
UPSC प्रारंभिक परीक्षा प्रश्न
निम्नलिखित में से कौन-से कारक भारतीय रुपये के अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होने का कारण बन सकते हैं?
- कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी
- डॉलर की वैश्विक मजबूती
- औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि
नीचे दिए गए कूट का उपयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) 1, 2 और 3
(b) 1 और 4
(c) 2 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
UPSC मुख्य परीक्षा प्रश्न
भारतीय रुपये की हालिया गिरावट के लिए घरेलू और वैश्विक कारकों का विश्लेषण कीजिए। इस संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक के समक्ष उत्पन्न नीतिगत चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।
