उड़ानें रद्द, यात्री परेशान- 65% बाजार एक एयरलाइन के हाथ, आखिर इंडिगो की बादशाहत पर कब लगेगी लगाम?

भारत का नागरिक विमानन क्षेत्र इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। बीते कुछ वर्षों में हवाई यात्रा आम नागरिक की पहुंच में आई है, लेकिन इसके साथ ही बाजार में असंतुलन और एकाधिकार जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो की लगभग 65 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी यह दिखाती है कि भारतीय आसमान में प्रतिस्पर्धा सीमित है। हाल के महीनों में इंडिगो की बड़ी संख्या में उड़ानों के रद्द होने से यात्रियों को भारी असुविधा हुई, जिसने सरकार को यह सोचने पर मजबूर किया कि यात्रियों के पास विकल्पों की कमी एक गंभीर संरचनात्मक समस्या बन चुकी है।

 

सरकार की नई पहल: ज्यादा एयरलाइंस, ज्यादा विकल्प

इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने विमानन बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। हाल ही में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने दो नई एयरलाइनों को ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) जारी किए हैं। इससे पहले शंख एयर को यह मंजूरी मिल चुकी थी, जबकि अल हिंद एयर और फ्लाईएक्सप्रेस को हाल ही में हरी झंडी दी गई है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू के अनुसार, सरकार का मानना है कि भारत जैसे विशाल और तेजी से बढ़ते बाजार में कम से कम पांच बड़ी एयरलाइनों के लिए पर्याप्त संभावनाएं हैं।

 

यह कदम केवल नई कंपनियों को लाइसेंस देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यात्रियों को अधिक विकल्प देना, सेवाओं की गुणवत्ता सुधारना और किसी एक एयरलाइन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धी बाजार न केवल किरायों को संतुलित रखता है, बल्कि संकट के समय यात्रियों के हितों की भी बेहतर रक्षा करता है।

IndiGo dominance be curbed

भारत का विमानन बाजार: अवसरों से भरा लेकिन चुनौतियों से घिरा

भारत आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में शामिल है। उड़ान (UDAN) योजना के तहत छोटे शहरों और दूरदराज़ के इलाकों को हवाई नेटवर्क से जोड़ने में उल्लेखनीय सफलता मिली है। स्टार एयर, इंडिया वन एयर और फ्लाई91 जैसी क्षेत्रीय एयरलाइनों ने यह साबित किया है कि भारत में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की अपार संभावनाएं हैं।

 

हालांकि, इस चमकती तस्वीर के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी है। भारत में एयरलाइनों के लिए ऑपरेटिंग कॉस्ट दुनिया में सबसे अधिक मानी जाती है। उच्च एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) कीमतें, भारी कर संरचना और एयरपोर्ट चार्जेस एयरलाइनों की वित्तीय सेहत पर लगातार दबाव डालते हैं। यही कारण है कि पिछले तीन दशकों में भारत ने कई एयरलाइनों को आते और बंद होते देखा है।

 

ऊंची लागत और असंतुलित इकोसिस्टम

विमानन विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय एविएशन इकोसिस्टम में एक विचित्र असंतुलन है। एयरपोर्ट ऑपरेटर, ईंधन आपूर्तिकर्ता, मेंटेनेंस एजेंसियां और अन्य सेवा प्रदाता मुनाफा कमा लेते हैं, लेकिन एयरलाइनों को लगातार घाटे का सामना करना पड़ता है। नई एयरलाइन शुरू करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन उसे लंबे समय तक टिकाए रखना एक बड़ी चुनौती है।

 

इस स्थिति के पीछे कई कारण हैं—ऊंची ईंधन लागत, राज्य सरकारों द्वारा लगाया गया वैट, कमजोर वित्तीय योजना, प्रबंधन की कमी और पूंजी की अनुपलब्धता। जब तक इन संरचनात्मक समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता, तब तक केवल नई एयरलाइनों को लाइसेंस देना पर्याप्त नहीं होगा।

 

हवाई यात्रा: अब लग्जरी नहीं, आवश्यकता

एक समय था जब हवाई यात्रा को विलासिता माना जाता था, लेकिन आज यह व्यवसाय, पर्यटन और सामाजिक गतिशीलता का अहम साधन बन चुकी है। मध्यम वर्ग की बढ़ती आकांक्षाएं और समय की बचत की जरूरत ने हवाई यात्रा को अनिवार्य बना दिया है। ऐसे में लागत और कर ढांचे को तर्कसंगत बनाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

 

यदि हवाई यात्रा को वास्तव में जनसुलभ बनाना है, तो ईंधन पर टैक्स में कटौती, एयरपोर्ट शुल्क की समीक्षा और क्षेत्रीय मार्गों पर अतिरिक्त प्रोत्साहन जैसे कदम जरूरी हैं। इससे न केवल नई एयरलाइनों को टिकाऊ मॉडल मिलेगा, बल्कि मौजूदा कंपनियां भी बेहतर सेवाएं देने में सक्षम होंगी।

 

आगे का रास्ता: संतुलित सुधारों की जरूरत

सरकार की यह पहल कि वह विमानन बाजार में अधिक खिलाड़ियों को प्रवेश दे, एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन इसके साथ-साथ नीति स्तर पर व्यापक सुधार भी आवश्यक हैं। केवल प्रतिस्पर्धा बढ़ाना ही नहीं, बल्कि एयरलाइनों के लिए अनुकूल व्यावसायिक माहौल बनाना भी उतना ही जरूरी है।

 

यदि ईंधन लागत कम की जाए, टैक्स संरचना को सरल बनाया जाए और दीर्घकालिक नीति स्थिरता सुनिश्चित की जाए, तो भारत वास्तव में एक मजबूत, टिकाऊ और यात्रियों के अनुकूल विमानन बाजार विकसित कर सकता है। इससे रोजगार सृजन, क्षेत्रीय विकास और आर्थिक वृद्धि को भी गति मिलेगी।

 

निष्कर्ष:

भारतीय विमानन क्षेत्र एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। इंडिगो और एयर इंडिया के दबदबे के बीच सरकार द्वारा नई एयरलाइनों को बढ़ावा देना प्रतिस्पर्धा और यात्रियों के हित में एक सही कदम है। हालांकि, यह तभी सफल होगा जब इसके साथ लागत, टैक्स और प्रबंधन से जुड़ी मूलभूत समस्याओं का समाधान किया जाए। एक संतुलित और समावेशी नीति ही भारतीय आसमान को वास्तव में सबके लिए खुला और सुरक्षित बना सकती है।

 

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims)

 

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत में नागरिक विमानन बाजार में इंडिगो की बाजार हिस्सेदारी लगभग 65% है।
  2. ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा नई एयरलाइनों को परिचालन की अनुमति देने के लिए जारी किया जाता है।
  3. उड़ान योजना का उद्देश्य केवल अंतरराष्ट्रीय हवाई संपर्क बढ़ाना है।

सही कथन चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

 

 

 मुख्य परीक्षा (Mains)

 

“भारतीय नागरिक विमानन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के प्रयास तभी सफल होंगे, जब संरचनात्मक लागत और नीति संबंधी बाधाओं का समाधान किया जाए।”
इस कथन के आलोक में भारत के विमानन क्षेत्र की चुनौतियों और हालिया सरकारी पहलों की चर्चा कीजिए।