राजस्थान की पहचान केवल उसके किले, मरुस्थल और संस्कृति से नहीं, बल्कि उन पेड़ों से भी है जिन्होंने सदियों से जीवन को सहारा दिया है। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण है खेजड़ी वृक्ष, जिसे राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया है। हाल ही में बीकानेर में शुरू हुआ ‘खेजड़ी बचाओ आंदोलन’ केवल एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि यह भारत में विकास मॉडल, पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी के बीच उभरते टकराव का प्रतीक बन गया है।
हजारों लोगों की भागीदारी, बाजारों का बंद होना, स्कूलों की छुट्टी और राजनीतिक दलों की साझा उपस्थिति इस आंदोलन को असाधारण बनाती है। यह आंदोलन बताता है कि जब विकास प्रकृति की कीमत पर होता है, तब समाज एकजुट होकर सवाल खड़े करता है।
खेजड़ी वृक्ष: मरुस्थल का जीवन रक्षक
खेजड़ी केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की जीवन रेखा है। यह पेड़ कम पानी में पनपता है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और पशुओं के लिए चारे का प्रमुख स्रोत है। इसकी फलियाँ ‘सांगरी’ के रूप में स्थानीय भोजन का हिस्सा हैं, जिससे आजीविका भी जुड़ी है।
पर्यावरणीय दृष्टि से खेजड़ी मरुस्थल में जैव विविधता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। इसकी गहरी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं और यह जल संरक्षण में भी मदद करता है। यही कारण है कि इसे केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत के रूप में भी देखा जाता है।
इतिहास गवाह है कि 18वीं सदी में बिश्नोई समाज की अमृता देवी ने खेजड़ी की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आज उसी परंपरा की गूंज इस आंदोलन में सुनाई देती है।
सौर ऊर्जा परियोजनाएँ और पेड़ों की कटाई का विवाद
भारत स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और सौर ऊर्जा इस परिवर्तन का अहम स्तंभ है। राजस्थान जैसे राज्यों में बड़े सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब इन परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर खेजड़ी जैसे महत्वपूर्ण पेड़ों की कटाई की जाती है।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि विकास के नाम पर पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जा रही है। पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को कमजोर किया जा रहा है और स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना फैसले लिए जा रहे हैं। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, बल्कि लोगों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान भी खतरे में पड़ रही है।
यह आंदोलन यह सवाल उठाता है कि क्या हरित ऊर्जा के नाम पर हरियाली को ही खत्म किया जा सकता है? क्या विकास का मतलब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर है, या उसमें प्रकृति और समाज की सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए?
जनआंदोलन, राजनीतिक सहमति और शासन की चुनौती
बीकानेर में हुए आंदोलन की सबसे खास बात रही विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक समूहों की एकजुटता। आमतौर पर पर्यावरणीय मुद्दों पर राजनीतिक मतभेद हावी रहते हैं, लेकिन यहां कांग्रेस, भाजपा और निर्दलीय प्रतिनिधि एक मंच पर दिखाई दिए। यह दर्शाता है कि पर्यावरण अब केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि जनभावना बन चुका है।
आंदोलनकारियों की मांग है कि खेजड़ी को कड़े कानूनी संरक्षण में लाया जाए और इसके अवैध कटान पर सख्त दंड सुनिश्चित किया जाए। उनका यह भी कहना है कि वर्तमान कानूनों में अस्पष्टता है, जिसका लाभ उठाकर पेड़ों की कटाई जारी है।
प्रशासन के लिए यह आंदोलन एक बड़ी परीक्षा है। एक ओर ऊर्जा जरूरतें और विकास के लक्ष्य हैं, तो दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण और जनविश्वास। यदि सरकार इस संतुलन को साधने में विफल रहती है, तो ऐसे आंदोलन भविष्य में और व्यापक रूप ले सकते हैं।
निष्कर्ष: टिकाऊ विकास की ओर एक चेतावनी
खेजड़ी बचाओ आंदोलन हमें यह याद दिलाता है कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बनाया जा सकता। सच्चा विकास वही है जो प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाए।
राजस्थान का यह आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि यह उस सोच के खिलाफ है जो प्रकृति को केवल संसाधन मानती है। यदि आज खेजड़ी नहीं बची, तो कल मरुस्थल का जीवन भी खतरे में पड़ सकता है।
यह आंदोलन नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है – विकास तभी स्वीकार्य है, जब वह टिकाऊ, न्यायपूर्ण और जनभागीदारी पर आधारित हो।
UPSC प्रीलिम्स प्रश्न
खेजड़ी वृक्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है।
- यह वृक्ष शुष्क क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होता है।
- खेजड़ी वृक्ष का ऐतिहासिक संबंध बिश्नोई आंदोलन से जुड़ा है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
UPSC मेंस प्रश्न
“भारत में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन एक बड़ी नीति चुनौती बनता जा रहा है।”
खेजड़ी बचाओ आंदोलन के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।
