भारत की आर्थिक दिशा, निवेश की बदलती प्रवृत्ति और तकनीक के भविष्य को लेकर बुधवार को मुंबई में एक अहम संवाद देखने को मिला। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी और दुनिया की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनी ब्लैकरॉक के सीईओ लैरी फिंक एक मंच पर आए और भारतीय अर्थव्यवस्था की संभावनाओं पर विस्तार से अपने विचार रखे। यह चर्चा ऐसे समय पर हुई जब वैश्विक बाजार अनिश्चितताओं से गुजर रहे हैं और भारत निवेशकों के लिए एक उभरते हुए अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
भारतीयों से निवेश की आदत बदलने का आह्वान
इस संवाद का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भारतीय नागरिकों के लिए था-बचत की परंपरागत सोच से बाहर निकलने का। मुकेश अंबानी और लैरी फिंक दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत में आज भी बड़ी मात्रा में घरेलू बचत सोने और चांदी जैसी भौतिक संपत्तियों में फंसी हुई है, जो आर्थिक विकास में सक्रिय भूमिका नहीं निभाती।
मुकेश अंबानी ने स्पष्ट रूप से कहा कि सोना और चांदी जैसी संपत्तियों में रखी गई पूंजी उत्पादक नहीं होती। उनका मानना है कि शेयर बाजार और अन्य वित्तीय साधनों में निवेश ही वास्तविक अर्थों में संपत्ति निर्माण करता है, क्योंकि वहीं चक्रवृद्धि (कंपाउंडिंग) का पूरा लाभ मिलता है।
शेयर बाजार बनाम सोना: बदलता नजरिया
यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है और भारतीय शेयर बाजार भी अस्थिरता से गुजर रहा है। इस वर्ष अब तक निफ्टी 50 इंडेक्स में करीब 2 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। इसके बावजूद, दोनों उद्योगपतियों का मानना है कि लंबी अवधि में इक्विटी बाजार ही संपत्ति बढ़ाने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
लैरी फिंक ने भी इस बात पर सहमति जताई कि इतिहास गवाह है-जो लोग पूंजी बाजारों में भागीदार बने, वे समय के साथ आर्थिक रूप से कहीं अधिक मजबूत हुए, जबकि केवल बैंक जमा या सोने पर निर्भर रहने वालों को सीमित लाभ मिला।
भारतीय बचत की शक्ति को निवेश में बदलने की कोशिश
मुकेश अंबानी ने कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां बचत की संस्कृति सदियों से रही है, लेकिन अब समय आ गया है कि इस बचत को उत्पादक दिशा दी जाए। जियो और ब्लैकरॉक की साझेदारी का उद्देश्य भी इसी दिशा में काम करना है-घरेलू पूंजी को ऐसे निवेश विकल्पों में लगाना, जो देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिक दोनों के लिए लाभकारी हों।
उन्होंने यह भी कहा कि केवल बैंक खाते में रखा पैसा सीमित ब्याज देता है, जबकि इक्विटी और म्यूचुअल फंड जैसे साधन लंबी अवधि में वास्तविक संपत्ति निर्माण में मदद करते हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर आशावाद
चर्चा के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का विषय भी प्रमुखता से उठा। मुकेश अंबानी ने कहा कि भारत नई तकनीकों को अपनाने में हमेशा आगे रहा है और AI को लेकर किसी प्रकार के भय की आवश्यकता नहीं है।
लैरी फिंक ने इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहा कि भारत की युवा और विशाल जनसंख्या AI को एक अवसर में बदल सकती है। उनके अनुसार, AI भले ही पारंपरिक नौकरियों के स्वरूप को बदले, लेकिन यह नए क्षेत्रों में रोजगार और उत्पादकता के अवसर भी पैदा करेगा। भारत इस बदलाव को कई विकसित देशों की तुलना में बेहतर ढंग से अपना सकता है।
अगले दशक में भारत की तेज रफ्तार
ब्लैकरॉक के सीईओ ने अनुमान जताया कि आने वाले दस वर्षों में भारत की आर्थिक विकास दर 8 से 10 प्रतिशत के बीच रह सकती है। उन्होंने इसे वैश्विक परिदृश्य में एक असाधारण उपलब्धि बताया।
मुकेश अंबानी ने भी भविष्य को लेकर भरोसा जताया और कहा कि अगले दशक तक भारत ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा लेगा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़े भी इस आशावाद को बल देते हैं। IMF के अनुसार, वर्ष 2026 में भारत की विकास दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि दर लगभग 3.3 प्रतिशत रह सकती है।
स्टार्टअप्स और नए उद्योग
मुकेश अंबानी ने भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में देश में दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों बड़ी कंपनियां उभर सकती हैं, जो भविष्य में रिलायंस जैसी विशाल संस्थाओं का रूप लेंगी।
उनका मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था अब उस अवस्था में पहुंच चुकी है, जहां लंबे समय से किए गए नीतिगत सुधारों का फल मिलना शुरू हो गया है। स्थिर नीतियां और उद्यमिता का माहौल देश को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है।
म्यूचुअल फंड उद्योग की संभावनाएं
ब्लैकरॉक के सीओओ रॉब गोल्डस्टीन ने बताया कि फिलहाल भारत का म्यूचुअल फंड उद्योग एक ट्रिलियन डॉलर से कम का है, जो देश की आबादी और आर्थिक क्षमता को देखते हुए काफी कम है। इसमें विस्तार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
जियो फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन केवी कामथ ने उम्मीद जताई कि अगले पांच वर्षों में म्यूचुअल फंड में निवेश दोगुने से भी अधिक हो सकता है। उनके अनुसार, भारतीय निवेशक अब केवल बचत तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि निवेश को लेकर अधिक जागरूक हो रहे हैं।
भौतिक संपत्ति से वित्तीय निवेश की ओर झुकाव
बैन एंड कंपनी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय परिवार अब भी अपनी कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा सोने और रियल एस्टेट में रखते हैं। वित्तीय वर्ष 2025 में यह हिस्सा लगभग 59 प्रतिशत रहा, जबकि 2015 में यह 66 प्रतिशत था। यह आंकड़ा दर्शाता है कि धीरे-धीरे सही, लेकिन बचत का वित्तीयकरण बढ़ रहा है।
सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए निवेश में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2021 से 2025 के बीच SIP निवेश तीन गुना बढ़कर 2.89 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया।
‘भारत का युग’ आने वाला है
लैरी फिंक ने कहा कि अगले 20 से 25 वर्ष भारत के लिए निर्णायक होंगे। उन्होंने भारतीय नागरिकों से अपील की कि वे पूंजी बाजारों के माध्यम से देश की विकास यात्रा में भागीदार बनें।
उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां जिन लोगों ने देश की वृद्धि में निवेश किया, वे आज आर्थिक रूप से कहीं बेहतर स्थिति में हैं। इसके विपरीत, केवल बैंक खातों पर निर्भर रहने वालों को सीमित लाभ ही मिला।
एक अलग साक्षात्कार में फिंक ने यह भी कहा कि अगले दो दशकों में भारतीय इक्विटी बाजार कई गुना बढ़ सकता है, जबकि सोने में ऐसी संभावनाएं उन्हें नहीं दिखतीं।
बाजार की मौजूदा स्थिति और घरेलू निवेश की भूमिका
हालांकि पिछले एक साल से विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में शुद्ध विक्रेता बने हुए हैं, लेकिन घरेलू निवेशकों की मजबूत भागीदारी ने बाजार को संभाले रखा है। बीते एक वर्ष में MSCI इंडिया इंडेक्स का डॉलर रिटर्न 2.61 प्रतिशत रहा, जबकि MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स ने कहीं अधिक रिटर्न दिया। इसके बावजूद, पिछले पांच वर्षों में भारत ने उभरते बाजारों की तुलना में लगभग दोगुना रिटर्न दिया है।
निष्कर्ष:
मुकेश अंबानी और लैरी फिंक की यह चर्चा केवल निवेश पर संवाद नहीं थी, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य की एक झलक भी थी। संदेश साफ है-भारत अवसरों के दौर में प्रवेश कर चुका है। जरूरत है तो केवल सोच बदलने की, बचत को सही दिशा देने की और देश की विकास कहानी में सक्रिय भागीदार बनने की।
