सदन में हंगामा, देश में सवाल: किससे डरती है सत्ता?

भारतीय संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। यहां सरकार और विपक्ष के बीच बहस, असहमति और सवाल–जवाब लोकतांत्रिक संतुलन को मजबूत करते हैं। लेकिन हाल के दिनों में संसद का माहौल बार-बार गतिरोध और हंगामे की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। बजट सत्र के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच एक नया टकराव उभरकर सामने आया है, जिसके केंद्र में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने की अनुमति न मिलना और पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक का संदर्भ है।

 

यह विवाद केवल किसी एक भाषण या पुस्तक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संसदीय परंपराओं, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे व्यापक मुद्दों को सामने लाता है।

Uproar in the House questions in the country

संसद में क्या हुआ?

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन में बोलने की इच्छा जताई। उनका कहना था कि वे पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा के कुछ अंशों के माध्यम से वर्ष 2020 के भारत–चीन सीमा संकट से जुड़े तथ्यों को उजागर करना चाहते हैं।

 

सरकार पक्ष ने इस पर आपत्ति जताई और तर्क दिया कि किसी अप्रकाशित और असत्यापित सामग्री का सदन में हवाला देना नियमों के विरुद्ध है। इसके बाद लोकसभा में जोरदार हंगामा शुरू हो गया। बार-बार कार्यवाही स्थगित हुई और अंततः प्रधानमंत्री का धन्यवाद प्रस्ताव पर उत्तर लोकसभा में नहीं हो सका।

 

विपक्ष ने साफ संदेश दिया कि यदि राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया गया, तो प्रधानमंत्री के भाषण को भी बाधित किया जाएगा। यह टकराव बाद में राज्यसभा तक पहुंच गया, जहां प्रधानमंत्री के संभावित भाषण को लेकर भी माहौल तनावपूर्ण बना रहा।

 

विवाद की जड़: नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक

इस पूरे विवाद के केंद्र में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा है, जो अभी प्रकाशित नहीं हुई है। मीडिया में पहले से इसके कुछ अंश सामने आए थे, जिनमें पूर्वी लद्दाख में 2020 के दौरान चीन के साथ हुए तनाव और सैन्य निर्णयों का उल्लेख बताया गया है।

 

राहुल गांधी का दावा है कि इस पुस्तक में यह संकेत मिलता है कि सीमा संकट के समय सेना को राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं मिले और कई निर्णय सैन्य नेतृत्व पर छोड़ दिए गए। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस विषय पर चर्चा से डर रही है और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बहस को दबाया जा रहा है।

 

वहीं सरकार का पक्ष है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों पर बिना आधिकारिक पुष्टि के चर्चा करना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि देशहित के खिलाफ भी हो सकता है।

 

संसदीय नियम और ‘अप्रकाशित सामग्री’

संसद की कार्यवाही कुछ स्पष्ट नियमों से संचालित होती है। लोकसभा के नियमों के अनुसार, किसी सांसद को सदन में ऐसे दस्तावेज, पुस्तक या सामग्री का हवाला देने से पहले अनुमति लेनी होती है, जो सार्वजनिक रूप से प्रमाणित और प्रकाशित हो।

 

सरकार का तर्क है कि अप्रकाशित पुस्तक का हवाला देना सदन की गरिमा और नियमों के खिलाफ है। वहीं विपक्ष का कहना है कि यदि मीडिया में वही अंश पहले से प्रकाशित हो चुके हैं, तो उन्हें पूरी तरह असत्य या अप्रमाणिक नहीं कहा जा सकता।

 

यह टकराव यह सवाल उठाता है कि संसद में “प्रामाणिकता” की परिभाषा क्या होनी चाहिए और क्या संवेदनशील मुद्दों पर बहस को पूरी तरह रोका जा सकता है।

 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा

यह विवाद एक बड़े संवैधानिक द्वंद्व को सामने लाता है-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन।

 

संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों और निर्वाचित प्रतिनिधियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसी अनुच्छेद के तहत राज्य को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और संप्रभुता के हित में उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार भी है।

 

विपक्ष का आरोप है कि सरकार “राष्ट्रीय सुरक्षा” का इस्तेमाल आलोचना से बचने के लिए कर रही है। वहीं सरकार का कहना है कि सेना और सीमा से जुड़े मामलों में गैर-जिम्मेदार बयान देश के हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

 

लोकतांत्रिक विमर्श पर असर

संसद का बार-बार स्थगित होना केवल राजनीतिक दलों की हार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की भी क्षति है।

 

जब संसद में बहस नहीं होती, तो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और जवाबदेही तय करने का सबसे महत्वपूर्ण मंच कमजोर पड़ता है। विपक्ष का काम केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की जांच करना है। उसी तरह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आलोचना से भागने के बजाय उसका जवाब दे।

 

यह गतिरोध दर्शाता है कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र में संवाद की संस्कृति कमजोर हो रही है और टकराव राजनीति का स्थायी तरीका बनता जा रहा है।

 

राजनीतिक संदेश और भविष्य के संकेत

इस पूरे घटनाक्रम से दोनों पक्षों के राजनीतिक संदेश स्पष्ट हैं।

  • विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ रहा है।
  • सरकार यह संदेश देना चाहती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर वह किसी भी “अनुशासनहीन” बहस की अनुमति नहीं देगी।

आने वाले समय में यह विवाद केवल एक सत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य में संसद की कार्यशैली, विपक्ष की भूमिका और राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहस की सीमाओं को प्रभावित कर सकता है।

 

निष्कर्ष:

संसद में हुआ यह टकराव किसी एक नेता या पुस्तक का मामला नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली से जुड़ा प्रश्न है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।

 

यदि संसद संवाद का मंच नहीं रहेगी, तो लोकतंत्र का आधार कमजोर होगा। सरकार और विपक्ष-दोनों की जिम्मेदारी है कि वे नियमों के दायरे में रहकर, लेकिन खुलकर बहस करें। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

 

UPSC प्रीलिम्स प्रश्न

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. लोकसभा के नियमों के अनुसार अप्रकाशित और असत्यापित दस्तावेज़ों का हवाला देने के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक होती है।
  2. भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ उचित प्रतिबंधों की भी अनुमति देता है।
  3. संसद का बार-बार स्थगन लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत करता है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

 

UPSC मेंस प्रश्न

“संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक शासन की एक बड़ी चुनौती है।”
हालिया संसदीय गतिरोध के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए।