चागोस द्वीप विवाद फिर सुर्खियों में, ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते पर मालदीव की आपत्ति, जानिए क्या है मामला?

हिंद महासागर (Indian Ocean) के बीच स्थित चागोस द्वीपसमूह (Chagos Archipelago) एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति (International Politics) के केंद्र में आ गया है। इस बार विवाद की वजह बना है ब्रिटेन (United Kingdom) और मॉरीशस (Mauritius) के बीच हुआ वह समझौता, जिसके तहत चागोस द्वीपों की संप्रभुता (Sovereignty) ब्रिटेन से मॉरीशस को सौंपी जानी है। इस समझौते पर अब मालदीव (Maldives) ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराकर पूरे मामले को और जटिल बना दिया है।

 

मालदीव की नाराज़गी: संप्रभुता पर सवाल

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू (Mohamed Muizzu) ने संसद (Parliament) को जानकारी दी कि उनकी सरकार ने ब्रिटेन को 8 नवंबर 2024 और 18 जनवरी 2026 को औपचारिक पत्र भेजकर इस समझौते पर आपत्ति (Objection) जताई है। इन पत्रों में मालदीव सरकार ने साफ शब्दों में इस फैसले को अस्वीकार (Rejection) करने की बात कही है।

 

राष्ट्रपति कार्यालय (Presidential Office) के बयान के अनुसार, मुइज्जू ने 15 दिसंबर को ब्रिटेन के उप-प्रधानमंत्री (Deputy Prime Minister) डेविड लैमी (David Lammy) से फोन पर बातचीत के दौरान इस मुद्दे पर अतिरिक्त परामर्श (Further Consultations) की मांग रखी थी। मालदीव का तर्क है कि चागोस द्वीपों से जुड़े समुद्री क्षेत्रों (Maritime Areas) पर इस समझौते का सीधा असर पड़ता है।

 

कानूनी लड़ाई की शुरुआत

राष्ट्रपति मुइज्जू ने यह भी बताया कि मालदीव ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण (International Tribunal for the Law of the Sea – ITLOS) के फैसले के बाद खोए समुद्री क्षेत्र को वापस पाने के लिए कानूनी प्रक्रिया (Legal Proceedings) शुरू कर दी है। यह कदम दिखाता है कि मालदीव इस मुद्दे को केवल कूटनीतिक (Diplomatic) नहीं, बल्कि कानूनी स्तर पर भी चुनौती देने के मूड में है।

 

इसके अलावा, मालदीव सरकार ने एक और बड़ा फैसला लेते हुए पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह (Ibrahim Mohamed Solih) द्वारा 22 अगस्त 2022 को मॉरीशस को भेजे गए उस पत्र को रद्द (Rescind) कर दिया है, जिसमें चागोस द्वीपों पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता दी गई थी।

Chagos Islands dispute in the headlines again

अमेरिका और ट्रंप की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका (United States) की भूमिका भी अहम है। गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ब्रिटेन द्वारा चागोस द्वीप मॉरीशस को लौटाने के समझौते का विरोध करना छोड़ दिया। हालांकि, उन्होंने एक शर्त भी जोड़ दी।

 

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर (Keir Starmer) से बातचीत के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल (Truth Social) पर लिखा कि यदि यह समझौता विफल होता है या डिएगो गार्सिया (Diego Garcia) द्वीप पर अमेरिका की मौजूदगी को खतरा होता है, तो अमेरिका को वहां अपनी सैन्य उपस्थिति सुरक्षित और मजबूत (Secure and Reinforce) करने का अधिकार रहेगा।

 

डिएगो गार्सिया द्वीप पर अमेरिका और ब्रिटेन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा (Military Base) स्थित है, जो हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक संतुलन (Strategic Balance) बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

 

ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता और विवाद

पिछले साल मई में ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए समझौते के तहत चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को देने पर सहमति बनी थी। इसके बदले मॉरीशस ने अमेरिका और ब्रिटेन को अगले 99 वर्षों तक डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डे का संचालन जारी रखने की अनुमति दी।

 

यह समझौता ब्रिटेन के 200 साल से अधिक पुराने औपनिवेशिक शासन (Colonial Rule) के अंत का प्रतीक माना गया। लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन के भीतर ही इस पर तीखी बहस (Debate) शुरू हो गई। ब्रिटेन की संसद में इस समझौते पर प्रस्तावित चर्चा को ट्रंप की नाराज़गी के चलते पिछले महीने टाल दिया गया था।

 

ट्रंप ने इस समझौते को पहले “बेहद मूर्खतापूर्ण कदम (An act of great stupidity)” करार दिया था, जिससे पश्चिमी सहयोगियों (Western Allies) के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए।

 

चागोस द्वीपसमूह: रणनीतिक महत्व

चागोस द्वीपसमूह सात एटोल्स (Atolls) और 60 से अधिक द्वीपों का समूह है, जो मालदीव से लगभग 500 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति (Geographical Location) इसे हिंद महासागर के सबसे रणनीतिक क्षेत्रों में से एक बनाती है।

इतिहास पर नजर डालें तो:

  • 1814 में ब्रिटेन ने फ्रांस से चागोस द्वीप हासिल किए
  • 1966 में अमेरिका को डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति दी गई
  • 1968 में मॉरीशस को आज़ादी मिली, लेकिन चागोस ब्रिटेन के पास रहा
  • 1970-73 के बीच स्थानीय आबादी को हटाकर अमेरिकी सैन्य बेस स्थापित किया गया
  • 2019 में संयुक्त राष्ट्र (United Nations) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) ने मॉरीशस के दावे का समर्थन किया

 

भारत के लिए क्यों अहम है चागोस?

 

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन (Observer Research Foundation – ORF) के अनुसार, बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों (Geopolitical Dynamics) में चागोस द्वीप और मॉरीशस भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। भारत ने 23 मई 2025 को ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते का स्वागत किया था।

 

भारत ने पिछले एक दशक में विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के भीतर इंडियन ओशन रीजन डिवीजन (Indian Ocean Region Division) बनाया है, जिसमें मॉरीशस, सेशेल्स, मेडागास्कर, कोमोरोस, रीयूनियन द्वीप, श्रीलंका और मालदीव शामिल हैं।

 

चीन की बढ़ती चुनौती

हिंद महासागर क्षेत्र में चीन (China) की बढ़ती आर्थिक और सैन्य गतिविधियां (Military Activities) भारत और पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। पिछले 10-15 वर्षों में चीन ने दर्जनों बंदरगाहों (Ports) में निवेश किया है, जहां सैन्य जहाजों (Naval Vessels) की मौजूदगी संभव है।

 

भारत ने इस चुनौती का जवाब देते हुए मॉरीशस के अगालेगा द्वीप (Agaléga Island) पर सैन्य उपयोग के लिए बुनियादी ढांचा (Infrastructure) विकसित किया है, ताकि निगरानी (Surveillance) और खुफिया जानकारी (Intelligence) जुटाई जा सके।

 

निष्कर्ष: शक्ति संतुलन की जंग

चागोस द्वीप विवाद अब केवल ब्रिटेन और मॉरीशस तक सीमित नहीं रहा। इसमें मालदीव की आपत्ति, अमेरिका की शर्तें, चीन की बढ़ती मौजूदगी और भारत की रणनीतिक चिंताएं जुड़ चुकी हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा हिंद महासागर में शक्ति संतुलन (Balance of Power) तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

 

यह साफ है कि छोटे दिखने वाले द्वीप, वैश्विक राजनीति में कितने बड़े मायने रखते हैं।