भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो (ISRO – Indian Space Research Organisation) ने अपने आगामी और अब तक के सबसे चुनौतीपूर्ण मिशन चंद्रयान-4 (Chandrayaan-4) की दिशा में एक अहम कदम आगे बढ़ा दिया है। वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के साउथ पोल (South Pole) के पास एक संभावित लैंडिंग साइट (Landing Site) की पहचान कर ली है, जिसे मिशन के लिए बेहद उपयुक्त माना जा रहा है। यह क्षेत्र मॉन्स माउटन (Mons Mouton) नामक पर्वतीय इलाके में स्थित है, जिसे अध्ययन के दौरान MM-4 के नाम से चिन्हित किया गया।
मॉन्स माउटन क्यों बना वैज्ञानिकों की पसंद
मॉन्स माउटन, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के समीप स्थित लगभग 6,000 मीटर ऊँचा पर्वत (Mountain) है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी चोटी काफी हद तक सपाट (Flat) है, जिससे अंतरिक्ष यान की सुरक्षित लैंडिंग की संभावना बढ़ जाती है। इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार, चंद्रमा के इस हिस्से में ज़मीन की ढलान (Slope) अपेक्षाकृत कम है, जो लैंडर के लिए अनुकूल मानी जाती है।
हालाँकि, इसरो ने यह भी स्पष्ट किया है कि लैंडिंग साइट को लेकर अंतिम निर्णय (Final Decision) मिशन के लॉन्च के नज़दीक लिया जाएगा, ताकि उस समय तक उपलब्ध सभी नवीनतम डेटा का विश्लेषण किया जा सके।
सूर्य की रोशनी और पानी की बर्फ दो बड़े कारण
वैज्ञानिक दृष्टि से यह क्षेत्र इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ लंबे समय तक सूर्य की रोशनी (Sunlight Exposure) मिलती है। चंद्रयान-4 जैसे सोलर-पावर्ड मिशन के लिए यह एक अहम शर्त है। अनुमान है कि MM-4 साइट पर लगातार 11 से 12 दिन तक सूर्य का प्रकाश उपलब्ध रह सकता है।
इसके अलावा, इस क्षेत्र में वॉटर आइस (Water Ice) यानी पानी की जमी हुई बर्फ मौजूद होने की भी संभावना जताई जा रही है। भविष्य के चंद्र मिशनों और मानव अभियानों के लिए यह संसाधन बेहद कीमती माना जाता है।
चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिली निर्णायक मदद
इस लैंडिंग साइट के चयन में चंद्रयान-2 ऑर्बिटर (Chandrayaan-2 Orbiter) की भूमिका बेहद अहम रही। वैज्ञानिकों ने ऑर्बिटर पर लगे ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा (OHRC – Orbiter High Resolution Camera) से प्राप्त तस्वीरों का गहराई से अध्ययन किया।
यह कैमरा चंद्र सतह को लगभग 32 सेंटीमीटर प्रति पिक्सल (32 cm per pixel Resolution) की सूक्ष्मता से दिखाने में सक्षम है। इसकी मदद से वैज्ञानिकों ने छोटे-छोटे क्रेटर (Craters), पत्थर, ढलान और सतह की बनावट का विश्लेषण किया, ताकि लैंडिंग के दौरान किसी भी संभावित खतरे से बचा जा सके।
MM-4 साइट को सबसे सुरक्षित क्यों माना गया
वैज्ञानिकों ने मॉन्स माउटन क्षेत्र की कुल चार संभावित लैंडिंग साइट्स (Potential Landing Sites) का मूल्यांकन किया। इन सभी में MM-4 को सबसे सुरक्षित और संतुलित पाया गया।
- इस क्षेत्र की औसत ढलान लगभग 5 डिग्री (Degrees) है, जबकि चंद्रयान-4 का लैंडर 10 डिग्री तक की ढलान पर उतरने में सक्षम है।
- यहाँ बड़े पत्थरों की संख्या बेहद कम है और अधिकांश बोल्डर (Boulders) का आकार 0.3 मीटर से कम पाया गया।
- इस साइट पर रेडियो कम्युनिकेशन (Radio Communication) पृथ्वी के साथ बिना किसी बड़ी रुकावट के संभव है।
- कुल मिलाकर इस क्षेत्र का जोखिम स्तर (Risk Level) मात्र 9.89% आँका गया है, जो अन्य साइट्स की तुलना में काफी कम है।
चंद्रयान-4: भारत का पहला सैंपल रिटर्न मिशन
करीब ₹2104 करोड़ की लागत वाले इस मिशन का उद्देश्य चंद्रमा की सतह से चट्टानों और मिट्टी के नमूने (Lunar Samples) इकट्ठा कर उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। यह भारत का पहला लूनर सैंपल रिटर्न मिशन (Lunar Sample Return Mission) होगा।
इस मिशन में दो अलग-अलग प्रक्षेपण यान यानी रॉकेट (Launch Vehicles) इस्तेमाल किए जाएंगे-
- LVM-3 (Heavy Lift Launch Vehicle)
- PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle)
जटिल मिशन संरचना
चंद्रयान-4 की मिशन आर्किटेक्चर (Mission Architecture) को अब तक की सबसे जटिल संरचनाओं में से एक माना जा रहा है। इसे दो हिस्सों यानी स्टैक (Stack) में विभाजित किया गया है।
- स्टैक-1 में शामिल हैं:
- डिसेंडर मॉड्यूल (Descender Module)
- एसेंडर मॉड्यूल (Ascender Module)
- स्टैक-2 में शामिल हैं:
- प्रोपल्शन मॉड्यूल (Propulsion Module)
- ट्रांसफर मॉड्यूल (Transfer Module)
- री-एंट्री मॉड्यूल (Re-Entry Module)
लैंडिंग के बाद विक्रम लैंडर (Vikram Lander) की सहायता से रोबोटिक सिस्टम चंद्र सतह से सैंपल इकट्ठा करेंगे। इसके बाद एसेंडर मॉड्यूल इन नमूनों को चंद्र कक्षा में ले जाएगा और अंततः री-एंट्री मॉड्यूल के ज़रिये उन्हें पृथ्वी पर लाया जाएगा।
भारत के चंद्र मिशनों की यात्रा
भारत अब तक तीन चंद्रयान मिशन लॉन्च कर चुका है-
- चंद्रयान-1 (2008): चांद पर पानी की खोज
- चंद्रयान-2 (2019): ऑर्बिटर सफल, लैंडिंग असफल
- चंद्रयान-3 (2023): साउथ पोल पर ऐतिहासिक सफल लैंडिंग
अब चंद्रयान-4, भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा कर सकता है, जिन्होंने चंद्रमा या अन्य खगोलीय पिंडों से सैंपल वापस लाने में सफलता हासिल की है।
