मध्य-पूर्व एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। ईरान ने अमेरिका के सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक चेतावनियों को सिरे से खारिज करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम से किसी भी परिस्थिति में पीछे नहीं हटेगा। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची का यह बयान केवल एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि ईरान की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच और उसकी संप्रभुता की धारणा को भी दर्शाता है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब कई वर्षों बाद ईरान और अमेरिका के बीच ओमान में परमाणु मुद्दे पर बातचीत दोबारा शुरू हुई है। एक ओर ईरान आर्थिक प्रतिबंधों से राहत चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की कोशिश कर रहा है। इन दोनों विरोधी लक्ष्यों के बीच टकराव ही मौजूदा संकट का मूल है।
यूरेनियम संवर्धन: ईरान के लिए सम्मान और संप्रभुता का प्रश्न
ईरान बार-बार यह स्पष्ट करता रहा है कि यूरेनियम संवर्धन उसका वैध अधिकार है। अब्बास अराघची ने दोहा में आयोजित अल-जजीरा फोरम में कहा कि किसी भी देश को यह हक नहीं है कि वह ईरान को बताए कि उसे क्या करना चाहिए। उनके अनुसार, सैन्य धमकियों या प्रतिबंधों के जरिए ईरान की परमाणु नीति नहीं बदली जा सकती।
ईरान की नजर में यह मुद्दा केवल तकनीकी या ऊर्जा नीति से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सम्मान, आत्मनिर्भरता और विदेशी दबाव के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है। यही कारण है कि ईरान किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार करने को तैयार नहीं है, जो उसकी स्वतंत्रता और गरिमा के विरुद्ध हो।
अमेरिकी दबाव और सैन्य संकेत
दूसरी ओर, अमेरिका ईरान के आसपास लगातार अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। USS अब्राहम लिंकन जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती और अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के दौरे इस बात का संकेत हैं कि वाशिंगटन ‘शांति के लिए ताकत’ की नीति पर चल रहा है। अमेरिका का दावा है कि यह तैनाती क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए है, लेकिन ईरान इसे डराने की कोशिश के रूप में देखता है।
अराघची ने स्पष्ट कहा कि अमेरिकी सैन्य ताकत का प्रदर्शन ईरान को प्रभावित नहीं करेगा। उनके अनुसार, अमेरिका की कार्रवाइयाँ यह संदेह पैदा करती हैं कि क्या वाशिंगटन वास्तव में कूटनीतिक समाधान चाहता है या केवल दबाव की रणनीति अपनाए हुए है।
परमाणु हथियार के आरोप और ईरान का पक्ष
पश्चिमी देश और इज़राइल लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार विकसित करने का आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि ईरान इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों, जैसे बिजली उत्पादन और वैज्ञानिक शोध, के लिए है।
अराघची के अनुसार, ईरान की असली ताकत परमाणु बम नहीं, बल्कि बड़ी शक्तियों को ‘न’ कहने की क्षमता है। यह बयान ईरान की वैचारिक राजनीति को दर्शाता है, जिसमें वह खुद को पश्चिमी दबाव के सामने झुकने वाला देश नहीं मानता।
यूरेनियम संवर्धन और परमाणु बम का संबंध
यूरेनियम संवर्धन का अर्थ है यूरेनियम में मौजूद U-235 आइसोटोप की मात्रा बढ़ाना। प्राकृतिक यूरेनियम में U-235 बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। जब इसे 3–5 प्रतिशत तक संवर्धित किया जाता है, तो इसका उपयोग परमाणु बिजलीघरों में किया जा सकता है। लेकिन जब संवर्धन का स्तर 90 प्रतिशत या उससे अधिक हो जाता है, तो इसे हथियार-ग्रेड यूरेनियम माना जाता है, जो परमाणु बम बनाने में इस्तेमाल हो सकता है।
परमाणु बम का सिद्धांत नाभिकीय विखंडन पर आधारित होता है। इसमें U-235 या प्लूटोनियम जैसे तत्वों के परमाणु टूटते हैं और अत्यधिक ऊर्जा निकलती है। यह प्रक्रिया चेन रिएक्शन के रूप में कुछ ही क्षणों में भयानक विस्फोट में बदल जाती है। हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले इस विनाश की ऐतिहासिक मिसाल हैं।
बातचीत और प्रतिबंध: विरोधाभासी संकेत
हाल ही में ओमान में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता को दोनों पक्षों ने सकारात्मक बताया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे “बहुत अच्छा” कहा, जबकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियन ने इसे शांति की दिशा में एक कदम बताया। लेकिन बातचीत के तुरंत बाद अमेरिका द्वारा नए टैरिफ और प्रतिबंधों की घोषणा ने ईरान की आशंकाओं को और गहरा कर दिया।
ईरान का कहना है कि ऐसे कदम अमेरिका की गंभीरता पर सवाल खड़े करते हैं। अराघची के अनुसार, ईरान आगे की बातचीत इन्हीं संकेतों के आधार पर तय करेगा।
ईरान के भीतर आंतरिक दबाव
यह पूरा संकट ऐसे समय चल रहा है जब ईरान के भीतर आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक असंतोष के कारण हालात तनावपूर्ण हैं। हाल के महीनों में विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की खबरें सामने आई हैं। सरकार और मानवाधिकार संगठनों के आंकड़ों में मृतकों की संख्या को लेकर भारी अंतर है, जो स्थिति की संवेदनशीलता को और बढ़ाता है।
निष्कर्ष:
ईरान-अमेरिका परमाणु विवाद केवल दो देशों के बीच का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ता है। ईरान का यूरेनियम संवर्धन पर अडिग रुख यह दिखाता है कि दबाव और प्रतिबंधों की राजनीति की सीमाएँ हैं। यदि किसी स्थायी समाधान की उम्मीद की जाती है, तो उसे आपसी सम्मान, विश्वास और संतुलित कूटनीति के आधार पर ही संभव बनाया जा सकता है।
UPSC प्रीलिम्स प्रश्न
यूरेनियम संवर्धन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 3–5% तक संवर्धित यूरेनियम का उपयोग परमाणु बिजलीघरों में किया जाता है।
- 90% या उससे अधिक संवर्धित यूरेनियम को हथियार-ग्रेड माना जाता है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
UPSC मेंस प्रश्न
“ईरान-अमेरिका परमाणु विवाद केवल परमाणु तकनीक का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह संप्रभुता, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ है।” इस कथन की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
