भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: अवसरों की उम्मीद या भारतीय किसानो के लिए खतरे की घंटी?

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित अंतरिम व्यापार ढांचे ने देश की राजनीति, कृषि व्यवस्था और किसान आंदोलनों में नई हलचल पैदा कर दी है। सरकार जहां इसे भारत की वैश्विक व्यापार स्थिति मजबूत करने वाला कदम बता रही है, वहीं किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का मानना है कि यह समझौता भारतीय किसानों के लिए दीर्घकालिक संकट पैदा कर सकता है।

 

इस समझौते को लेकर उठी आपत्तियां केवल आर्थिक नहीं हैं, बल्कि इसमें खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और आत्मनिर्भर कृषि मॉडल से जुड़े गहरे सवाल भी शामिल हैं। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों की तैयारी शुरू हो चुकी है।

 

समझौते की पृष्ठभूमि: क्यों हुआ यह करार?

भारत और अमेरिका लंबे समय से व्यापारिक रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच शुल्क विवाद, आयात-निर्यात असंतुलन और बाजार पहुंच को लेकर कई दौर की बातचीत होती रही है। हालिया अंतरिम व्यापार समझौते को इसी दिशा में एक अस्थायी लेकिन अहम कदम माना जा रहा है।

 

संयुक्त बयान के अनुसार, अमेरिका भारतीय उत्पादों पर लगाए जाने वाले आयात शुल्क को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने के लिए तैयार हुआ है। इसके बदले भारत ने अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों और कृषि आधारित वस्तुओं पर शुल्क घटाने या समाप्त करने की सहमति दी है।

India-US trade deal

कौन-कौन से उत्पाद आएंगे भारतीय बाजार में?

इस व्यापार ढांचे के तहत जिन अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों के आयात का रास्ता साफ हुआ है, उनमें ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स (DDGS), पशु आहार के लिए लाल ज्वार, सोयाबीन तेल, ट्री नट्स, ताजे और प्रसंस्कृत फल, वाइन और अन्य स्पिरिट शामिल हैं।

 

इसके अलावा भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर मूल्य के ऊर्जा उत्पाद, विमान और उनके पुर्जे, कीमती धातुएं, उन्नत तकनीकी उपकरण और कोकिंग कोल खरीदने का इरादा भी जताया है। यह आंकड़ा अपने आप में इस समझौते के आर्थिक दायरे की व्यापकता को दर्शाता है।

 

सरकार का दावा: किसानों के हित सुरक्षित

सरकार का कहना है कि इस समझौते में भारत के संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि मक्का, गेहूं, चावल, सोयाबीन, पोल्ट्री, दूध, डेयरी उत्पाद, इथेनॉल, तंबाकू, मांस और कई सब्जियों पर किसी भी तरह की टैरिफ छूट नहीं दी गई है।

 

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी दो टूक कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह स्पष्ट नीति रही है कि देश के किसान और कृषि क्षेत्र के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उनके अनुसार, इस व्यापार ढांचे में वही संतुलन अपनाया गया है।

 

सरकार का यह भी दावा है कि अमेरिका ने भारतीय कृषि उत्पादों-जैसे मसाले, चाय, कॉफी, नारियल, सुपारी, काजू, आम, केला, पपीता, अनानास और अन्य फलों-पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती की है, जिससे भारतीय निर्यातकों को लाभ मिलेगा।

 

किसान संगठनों की आशंका: असली नुकसान छिपा है

सरकारी दावों के उलट, किसान संगठनों का मानना है कि इस समझौते का असर प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय कृषि को कमजोर करेगा। 100 से अधिक संगठनों के गठबंधन संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने इसे अमेरिकी कृषि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगे आत्मसमर्पण करार दिया है।

 

एसकेएम का कहना है कि सब्सिडी प्राप्त अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर पहुंचेंगे, जिससे घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ेगा। इसका सीधा असर छोटे और सीमांत किसानों की आय पर पड़ेगा, जो पहले से ही लागत बढ़ने और न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं।

 

2020-21 आंदोलन की यादें फिर ताजा

किसान संगठनों के विरोध में 2020-21 के कृषि कानून आंदोलन की छाया साफ नजर आती है। उस आंदोलन में भी किसानों को आशंका थी कि कॉर्पोरेट कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए कृषि व्यवस्था में बदलाव किया जा रहा है। अंततः सरकार को तीनों कानून वापस लेने पड़े थे।

 

अब एक बार फिर किसान संगठन चेतावनी दे रहे हैं कि अगर इस समझौते को बिना व्यापक विमर्श के लागू किया गया, तो देशव्यापी आंदोलन अपरिहार्य होगा।

 

सेब उत्पादकों की अलग चिंता

कश्मीर घाटी के सेब उत्पादकों ने भी इस समझौते को लेकर प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा है। उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सात लाख से अधिक परिवार सेब उत्पादन पर निर्भर हैं।

 

उत्पादकों का डर है कि यदि अमेरिकी सेब कम शुल्क पर भारतीय बाजार में आए, तो घरेलू सेब की कीमतें गिरेंगी और बागवानी आधारित अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा। उन्होंने अमेरिकी सेब पर 100 प्रतिशत से अधिक आयात शुल्क बनाए रखने की मांग की है।

 

विपक्ष का तीखा हमला

कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने इस व्यापार समझौते को राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि इस समझौते से भारत अमेरिका के लिए एक डंपिंग ग्राउंड बनता जा रहा है।

 

उनका तर्क है कि अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर का आयात करने का अर्थ है कि भारत को अपना वर्तमान आयात लगभग तीन गुना बढ़ाना पड़ेगा। इससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और घरेलू उद्योगों पर दबाव आएगा।

 

कृषि विशेषज्ञों की चेतावनी

प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का मानना है कि यह समझौता भारतीय कृषि बाजार को पहली बार बड़े पैमाने पर अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल देगा। उनके अनुसार, दशकों से अमेरिका और विश्व व्यापार संगठन भारत पर कृषि बाजार खोलने का दबाव बना रहे थे, जो अब इस समझौते के जरिए पूरा होता दिख रहा है।

 

उन्होंने रेसिप्रोकल टैरिफ व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब एक तरफ शून्य प्रतिशत शुल्क और दूसरी ओर 18 प्रतिशत शुल्क हो, तो इसे समान व्यापार नहीं कहा जा सकता।

 

सब्सिडी का असमान खेल

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और भारत के किसानों के बीच तुलना ही असमान है। अमेरिकी सरकार अपने किसानों को प्रति किसान औसतन 64,000 डॉलर सालाना सब्सिडी देती है, जबकि भारत में यह आंकड़ा लगभग 64 डॉलर के आसपास है।

 

उन्होंने कपास का उदाहरण देते हुए बताया कि अमेरिका में केवल आठ हजार कपास उत्पादक किसान हैं, जबकि भारत में लगभग 98 लाख किसान कपास की खेती करते हैं। अमेरिका में खेतों का औसत आकार 600 हेक्टेयर है, जबकि भारत में अधिकांश किसानों के पास एक से तीन एकड़ भूमि ही है।

 

DDGS: सस्ता विकल्प या खतरा?

DDGS, जो इथेनॉल उत्पादन का उपोत्पाद है, अमेरिका में बड़े पैमाने पर पशु आहार के रूप में इस्तेमाल होता है। यह प्रोटीन युक्त और अपेक्षाकृत सस्ता होता है। भारत में फिलहाल पशु आहार के लिए सोयाबीन खली, मूंगफली खली और सरसों खली का इस्तेमाल होता है, जो DDGS की तुलना में महंगे हैं।

 

यदि DDGS बड़े पैमाने पर आयात हुआ, तो पशु आहार बाजार में अमेरिकी कंपनियों का वर्चस्व बढ़ सकता है और भारतीय तिलहन प्रसंस्करण उद्योग प्रभावित हो सकता है।

 

प्रस्तावित विरोध और हड़ताल

एसकेएम ने 12 फरवरी को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। इसके साथ ही केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भी श्रम संहिताओं और व्यापार समझौतों के खिलाफ एक दिवसीय आम हड़ताल की घोषणा की है।

 

किसान नेताओं का कहना है कि गांव-गांव में प्रदर्शन होंगे और सरकार पर इस समझौते की समीक्षा का दबाव बनाया जाएगा।

 

निष्कर्ष:

भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता फिलहाल संभावनाओं और आशंकाओं के बीच झूलता हुआ नजर आता है। सरकार इसे वैश्विक व्यापार में भारत की मजबूती के रूप में देख रही है, जबकि किसान संगठन और विशेषज्ञ इसे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए खतरा मान रहे हैं।

 

आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि सरकार किसानों की चिंताओं को कैसे संबोधित करती है और क्या इस समझौते में कोई संशोधन किया जाता है। फिलहाल इतना तय है कि यह मुद्दा देश की राजनीति और कृषि विमर्श के केंद्र में बना रहेगा।