वेंस की ‘पीस डिविडेंड’ पहल के बीच अमेरिका ने आर्मेनिया के साथ परमाणु समझौता किया, क्या है अमेरिका कि रणनीति?

दक्षिण कॉकस क्षेत्र (South Caucasus) में भू-राजनीतिक संतुलन एक बार फिर तेजी से बदलता नजर आ रहा है। लंबे समय तक रूस का करीबी सहयोगी रहा आर्मेनिया अब धीरे-धीरे अपनी विदेश और ऊर्जा नीति में विविधता (diversification) लाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में सोमवार को आर्मेनिया और अमेरिका के बीच नागरिक परमाणु ऊर्जा (civil nuclear energy) क्षेत्र में सहयोग को लेकर एक अहम समझौता हुआ, जिसे दोनों देशों के संबंधों में एक नया मोड़ माना जा रहा है।

 

यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद, पूर्व सोवियत देशों में अपनी कूटनीतिक और आर्थिक मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। वहीं आर्मेनिया भी रूस और ईरान पर अपनी पारंपरिक निर्भरता कम करने के रास्ते तलाश रहा है।

 

123 समझौता क्या है और इसका महत्व

आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान (Nikol Pashinyan) और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने येरेवन में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान घोषणा की कि दोनों देशों ने तथाकथित “123 एग्रीमेंट” (123 Agreement) पर बातचीत पूरी कर ली है।

 

123 समझौता अमेरिका का एक कानूनी ढांचा (legal framework) होता है, जिसके तहत वह किसी अन्य देश को परमाणु तकनीक (nuclear technology), उपकरण (equipment) और सेवाएं निर्यात करने की अनुमति देता है। इसके बिना अमेरिका किसी भी देश के साथ परमाणु क्षेत्र में औपचारिक सहयोग नहीं कर सकता।

 

इस समझौते के तहत अमेरिका आर्मेनिया को शुरुआती चरण में लगभग 5 अरब डॉलर तक के परमाणु उपकरण और तकनीकी निर्यात कर सकता है। इसके अलावा, दीर्घकालिक (long-term) ईंधन आपूर्ति और रखरखाव (fuel and maintenance) के लिए अतिरिक्त 4 अरब डॉलर के अनुबंधों की संभावना भी जताई गई है।

 

ऊर्जा साझेदारी में “नया अध्याय”

प्रधानमंत्री पशिनयान ने इस मौके पर कहा कि यह समझौता अमेरिका और आर्मेनिया के बीच ऊर्जा सहयोग को एक नई दिशा देगा। उनके अनुसार, यह केवल तकनीकी करार नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास और दीर्घकालिक साझेदारी का संकेत भी है।

 

आर्मेनिया लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस और ईरान पर निर्भर रहा है। देश का एकमात्र परमाणु ऊर्जा संयंत्र, मेट्सामोर (Metsamor), सोवियत काल में रूस की मदद से बनाया गया था और अब वह काफी पुराना हो चुका है। सुरक्षा और तकनीकी कारणों से आर्मेनिया उसे बदलने या आधुनिक बनाने पर विचार कर रहा है।

us signed nuclear deal with Armenia

नया रिएक्टर: कई देशों की दौड़

आर्मेनिया फिलहाल एक नए परमाणु रिएक्टर (nuclear reactor) के निर्माण के लिए अलग-अलग देशों के प्रस्तावों की समीक्षा कर रहा है। इन प्रस्तावों में अमेरिका के अलावा रूस, चीन, फ्रांस और दक्षिण कोरिया की कंपनियां भी शामिल हैं।

 

हालांकि अमेरिका के साथ हुआ नया समझौता आर्मेनिया को अमेरिकी रिएक्टर खरीदने के लिए बाध्य नहीं करता, लेकिन यह अमेरिका को एक मजबूत विकल्प (strong contender) के रूप में जरूर स्थापित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे रूस की पारंपरिक पकड़ को झटका लग सकता है, क्योंकि दक्षिण कॉकस को वह लंबे समय से अपने प्रभाव क्षेत्र (sphere of influence) के रूप में देखता रहा है।

 

रूस की प्रतिक्रिया

इस घटनाक्रम पर रूस की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। रूसी उप विदेश मंत्री मिखाइल गालुज़िन (Mikhail Galuzin) ने रूसी अखबार इज़वेस्तिया (Izvestia) को दिए इंटरव्यू में कहा कि आर्मेनिया के लिए रूस का प्रस्ताव सबसे बेहतर विकल्प है।

 

उनका दावा है कि रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम (Rosatom) के पास विश्वसनीय और प्रमाणित (proven) तकनीक है और वह वित्तीय शर्तों (financial parameters) के मामले में भी आकर्षक प्रस्ताव दे रही है। गालुज़िन के अनुसार, अगर आर्मेनिया चाहे तो रूस इस परियोजना पर तेजी से काम शुरू कर सकता है।

 

“भागीदारों में विविधता जरूरी”

येरेवन स्थित राजनीतिक विश्लेषक नारेक सुकियासयान (Narek Sukiasyan) का मानना है कि आर्मेनिया के लिए परमाणु सहयोग में विविधता लाना एक राजनीतिक प्राथमिकता बन चुका है। उनके अनुसार, रूस पर अत्यधिक निर्भरता ने अतीत में कई रणनीतिक सीमाएं पैदा की हैं, इसलिए अब आर्मेनिया नए साझेदारों की तलाश कर रहा है।

 

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका इस समय आर्मेनिया की पहली पसंद बनता दिख रहा है, खासकर तब जब दोनों देशों के रिश्ते तेजी से गहराते जा रहे हैं।

 

शांति समझौते की पृष्ठभूमि

जेडी वेंस की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच दशकों पुराने संघर्ष को खत्म करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। महज छह महीने पहले दोनों देशों के नेताओं ने व्हाइट हाउस में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे लगभग 40 वर्षों के संघर्ष के बाद शांति की दिशा में पहला बड़ा कदम माना गया।

 

नागोर्नो-कराबाख (Nagorno-Karabakh) क्षेत्र को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। 2020 के युद्ध और 2023 की सैन्य कार्रवाई के बाद क्षेत्र की स्थिति में बड़ा बदलाव आया, जिससे हजारों जातीय अर्मेनियाई लोगों को पलायन करना पड़ा।

 

TRIPP कॉरिडोर: रणनीतिक परियोजना

वेंस की यात्रा का एक अहम एजेंडा “ट्रंप रूट फॉर इंटरनेशनल पीस एंड प्रॉस्पेरिटी” (Trump Route for International Peace and Prosperity – TRIPP) भी रहा। यह प्रस्तावित परिवहन गलियारा (transit corridor) दक्षिणी आर्मेनिया से होकर गुजरेगा और अज़रबैजान को उसके नखचिवान (Nakhchivan) एक्सक्लेव से जोड़ेगा।

 

इस परियोजना में रेलवे लाइन, सड़क नेटवर्क, तेल और गैस पाइपलाइन तथा फाइबर-ऑप्टिक केबल बिछाने की योजना है। अमेरिका के लिए इसका सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ यह है कि यह मार्ग रूस और ईरान को बायपास करेगा, जिससे यूरोप और एशिया के बीच वैकल्पिक व्यापार और ऊर्जा मार्ग तैयार हो सकेंगे।

 

क्षेत्रीय राजनीति पर असर

TRIPP कॉरिडोर को लेकर रूस भी सतर्क नजर आ रहा है। गालुज़िन ने कहा कि मॉस्को इस प्रस्ताव का अध्ययन कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना साकार होती है तो दक्षिण कॉकस क्षेत्र की आर्थिक और राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

 

वेंस ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका सिर्फ शांति की मध्यस्थता नहीं कर रहा, बल्कि आर्मेनिया और अमेरिका दोनों के लिए वास्तविक समृद्धि (real prosperity) का रास्ता तैयार कर रहा है।

 

अमेरिका का बढ़ता प्रभाव

इस परमाणु समझौते के अलावा अमेरिका ने आर्मेनिया को उन्नत कंप्यूटर चिप्स (advanced computer chips) और निगरानी ड्रोन (surveillance drones) निर्यात करने की भी इच्छा जताई है। यह संकेत देता है कि दोनों देशों का सहयोग सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तकनीक और सुरक्षा के क्षेत्रों तक भी फैलेगा।

 

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कॉकस क्षेत्र के कई देश रूस से दूरी बनाकर अमेरिका और यूरोपीय संघ के करीब आ रहे हैं। आर्मेनिया ने भी रूस के साथ अपने सुरक्षा समझौते को स्थगित कर दिया है और अब पश्चिमी देशों के साथ संबंध मजबूत करने पर जोर दे रहा है।

 

निष्कर्ष:

अमेरिका और आर्मेनिया के बीच हुआ यह परमाणु ऊर्जा समझौता केवल एक तकनीकी करार नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक है। आर्मेनिया जहां अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राजनीतिक स्वतंत्रता को मजबूत करना चाहता है, वहीं अमेरिका दक्षिण कॉकस जैसे रणनीतिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

 

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि आर्मेनिया किस देश के साथ परमाणु रिएक्टर परियोजना को आगे बढ़ाता है और यह फैसला क्षेत्रीय राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।