भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर अमेरिका ने बदला रुख: क्या बदला, क्यों बदला और भारत पर क्या असर?

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापार समझौते को लेकर अब नई चर्चा शुरू हो गई है। कारण यह है कि अमेरिका ने 9 फरवरी को जारी किए गए अपने तथ्यों के दस्तावेज (फैक्टशीट) में बदलाव किया है। साथ ही 6 फरवरी के भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में भी एक अहम शब्द बदला गया है।

 

इन बदलावों से यह संकेत मिलता है कि समझौते के कुछ प्रावधान कानूनी रूप से बाध्यकारी (binding) नहीं हैं, बल्कि इरादे (intention) के स्तर पर हैं। आइए समझते हैं कि क्या बदला है, क्यों बदला है और इसका भारत पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

 

‘Committed’ से ‘Intends’ – शब्दों का महत्व

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव भाषा में किया गया है। पहले अमेरिकी फैक्टशीट में कहा गया था कि भारत ने अमेरिकी उत्पादों की बड़ी मात्रा में खरीद के लिए “committed” यानी प्रतिबद्धता जताई है। इसमें यह भी लिखा था कि भारत पांच साल में 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी ऊर्जा, आईटी, कोयला और अन्य उत्पाद खरीदेगा।

 

अब इस शब्द को बदलकर “intends” यानी “इरादा रखता है” कर दिया गया है। यही बदलाव संयुक्त बयान में भी किया गया है।

 

इस बदलाव का अर्थ है कि यह कोई कानूनी वादा नहीं, बल्कि एक लक्ष्य या मंशा है। सरकार के अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि क्योंकि खरीद निजी कंपनियों द्वारा की जाएगी, इसलिए इसे सरकारों के बीच बाध्यकारी समझौता नहीं माना जा सकता।

US changes stance on India-US trade deal

‘पल्सेज’ यानी दालों का उल्लेख हटाया गया

पहले फैक्टशीट में कहा गया था कि भारत कुछ कृषि उत्पादों पर शुल्क (टैरिफ) कम करेगा, जिनमें “certain pulses” यानी कुछ दालें भी शामिल थीं। लेकिन अब संशोधित दस्तावेज से दालों का जिक्र हटा दिया गया है।

 

हालांकि संयुक्त बयान में दालों का नाम पहले भी नहीं था। वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों ने संकेत दिया है कि दालों के लिए बाजार पहुंच (market access) समझौते का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इसकी सीमा अभी स्पष्ट नहीं है।

 

भारत में दालों की स्थिति

भारत अपनी कुल खपत का लगभग 20% हिस्सा आयात करता है। 2025-26 के पहले नौ महीनों में दालों का आयात 2.53 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 33% कम है। पूरे 2024-25 में यह आयात 46% बढ़कर 5.48 अरब डॉलर तक पहुंचा था।

 

अमेरिका से दालों का आयात केवल 90 मिलियन डॉलर का रहा, यानी वह बहुत छोटा आपूर्तिकर्ता है। भारत मुख्य रूप से कनाडा, रूस, ब्राजील, म्यांमार और अफ्रीकी देशों से दालें मंगाता है।

 

इस बीच केंद्र सरकार दालों में आत्मनिर्भरता पर जोर दे रही है। हाल ही में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि दालों का आयात “हमारे लिए शर्म की बात” है और भारत को निर्यातक देश बनना चाहिए।

 

किसानों की चिंता और विरोध

व्यापार समझौते की घोषणा के बाद किसान संगठनों ने चिंता जताई। संयुक्त किसान मोर्चा ने 12 फरवरी को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। राष्ट्रीय किसान महासंघ ने आरोप लगाया कि समझौता गुप्त तरीके से हुआ और पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।

 

किसानों की सबसे बड़ी चिंता कृषि क्षेत्र में बाजार खुलने को लेकर है। उनका कहना है कि पश्चिमी देशों में कृषि को भारी सब्सिडी मिलती है, जिससे भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं।

 

DDGs को लेकर विवाद

संशोधित फैक्टशीट में सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGs), लाल ज्वार, सोयाबीन तेल, मेवे, फल, वाइन और अन्य उत्पादों का उल्लेख है।

 

कुछ किसान मानते हैं कि DDGs पशु चारे के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। लेकिन अन्य समूहों का कहना है कि यह आनुवंशिक रूप से परिवर्तित (GM) उत्पादों का परोक्ष प्रवेश हो सकता है। उन्हें यह भी डर है कि भारत के पशु चारा बाजार पर अमेरिकी कंपनियों का दबदबा बढ़ सकता है।

 

500 अरब डॉलर की खरीद – कितना व्यावहारिक?

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने अमेरिका से 45.62 अरब डॉलर का आयात किया और 86.51 अरब डॉलर का निर्यात किया।

 

पहले अमेरिकी दस्तावेज में दावा किया गया था कि भारत पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर का आयात करेगा, यानी हर साल लगभग 100 अरब डॉलर।

 

अब “committed” की जगह “intends” कर दिया गया है, जिससे यह स्पष्ट है कि यह कोई कानूनी दायित्व नहीं है।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें विमान, तकनीकी उपकरण, कीमती धातुएं, तेल, परमाणु उत्पाद और कृषि वस्तुएं शामिल हो सकती हैं।

 

पहले भी ऐसे उदाहरण रहे हैं। भारत-ईएफटीए (EFTA) समझौते के तहत यूरोपीय देशों ने 15 साल में 100 अरब डॉलर निवेश का वादा किया था।

 

डिजिटल सेवाओं पर कर (Digital Services Tax) वाला प्रावधान हटाया गया

सबसे बड़ा बदलाव डिजिटल सेवाओं से जुड़े हिस्से को पूरी तरह हटाना है। पहले दस्तावेज में लिखा था कि भारत डिजिटल सेवाओं पर कर हटाएगा और डिजिटल व्यापार के नियमों पर बातचीत करेगा।

 

यह हिस्सा अब पूरी तरह हटा दिया गया है और संयुक्त बयान में भी पहले इसका जिक्र नहीं था।

 

‘इक्वलाइजेशन लेवी’ क्या है?

इक्वलाइजेशन लेवी एक ऐसा कर है, जो विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों और भारतीय कंपनियों के बीच कर संतुलन बनाने के लिए लगाया जाता है। इसे आम बोलचाल में “गूगल टैक्स” भी कहा जाता है।

 

भारत ने पिछले बजट में यह कर हटा दिया था। लेकिन चिंता यह थी कि क्या भारत भविष्य में इसे फिर से लागू कर सकेगा या नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अपनी डेटा संप्रभुता (data sovereignty) से समझौता नहीं करना चाहिए।

 

डेटा लोकलाइजेशन क्यों अहम है?

डेटा लोकलाइजेशन का मतलब है कि नागरिकों का निजी या महत्वपूर्ण डेटा उसी देश के सर्वर पर संग्रहित और संसाधित हो, जहां वह उत्पन्न हुआ है।

 

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास (UNCTAD) ने 2018 की रिपोर्ट में कहा था कि डेटा लोकलाइजेशन से घरेलू डिजिटल ढांचे में निवेश बढ़ता है, राष्ट्रीय कानून लागू करना आसान होता है और गोपनीयता व साइबर सुरक्षा मजबूत होती है।

 

भारत के पास बड़ी संख्या में इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि मजबूत नियम बनाए जाएं, तो भारत वैश्विक डिजिटल उत्पादों की तरह अपने खुद के डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित कर सकता है।

 

निष्कर्ष:

अमेरिका द्वारा शब्दों में किया गया बदलाव और कुछ प्रावधानों को हटाना इस बात का संकेत है कि दोनों देश समझौते को लचीला रखना चाहते हैं।

 

भारत के लिए कृषि, डिजिटल नीति और डेटा संप्रभुता जैसे मुद्दे संवेदनशील हैं। वहीं अमेरिका अपने निर्यात और तकनीकी हितों को सुरक्षित करना चाहता है।

 

फिलहाल यह स्पष्ट है कि समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, बल्कि इरादों पर आधारित है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन इरादों को जमीन पर कैसे लागू किया जाता है और इससे भारतीय किसानों, उद्योगों और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है।