स्कूलों में अब ‘वंदे मातरम्’ भी अनिवार्य: क्या हैं नए नियम, कहां लागू होंगे और क्यों बना रहता है विवाद?

देश में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर केंद्र सरकार ने 28 जनवरी 2026 को नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के अनुसार अब स्कूलों में ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम्’ भी गाया जाएगा। इसके सभी छह पद (स्तंभ) गाए जाएंगे, जिन्हें पूरा करने में लगभग 190 सेकंड का समय लगेगा। गृह मंत्रालय द्वारा जारी इन नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किन अवसरों पर यह गीत अनिवार्य होगा, कहां छूट दी गई है, और नियम न मानने पर क्या स्थिति रहेगी। साथ ही, यह गीत लंबे समय से विवादों के केंद्र में क्यों रहा है, इसे भी समझना जरूरी है।

Vande Mataram

कहां-कहां लागू होंगे नए नियम?

गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ को अब कई सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में निश्चित रूप से गाया या बजाया जाएगा।

  1. परेड के दौरान – जब राष्ट्रीय ध्वज को समारोह में लाया जाएगा, उस समय ‘वंदे मातरम्’ गाया या बजाया जाना आवश्यक होगा।
  2. ध्वजारोहण के समय – तिरंगा फहराते समय राष्ट्रीय गीत के सभी छह पद गाए जाएंगे। गीत के शब्दों या क्रम में कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा।
  3. राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान पर – किसी भी सरकारी कार्यक्रम में जब राष्ट्रपति पहुंचेंगे या कार्यक्रम स्थल से विदा होंगे, तब राष्ट्रीय गीत बजाया जाएगा।
  4. सरकारी प्रसारण माध्यमों पर – दूरदर्शन और आकाशवाणी पर राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद में ‘वंदे मातरम्’ प्रसारित किया जाएगा।
  5. राज्य स्तर पर – किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में राज्यपाल या उपराज्यपाल के आगमन और प्रस्थान के समय भी यह गीत बजाया जाएगा।
  6. सम्मान समारोहों में – भारत रत्न, पद्म पुरस्कार जैसे राष्ट्रीय सम्मान समारोहों में भी ‘वंदे मातरम्’ बजाया जाएगा।
  7. विशेष सरकारी आदेश पर – यदि केंद्र सरकार किसी विशेष आयोजन के लिए निर्देश जारी करती है, तो वहां भी यह नियम लागू होगा।
  8. बैंड द्वारा प्रस्तुति – यदि गीत बैंड द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, तो इसकी शुरुआत ड्रम रोल से होगी। इसके लिए ढोल, मृदंगम, बिगुल या तुरही जैसे वाद्य यंत्र संकेत के रूप में बजाए जाएंगे।
  9. मार्चिंग ड्रिल के दौरान – यदि इसे मार्चिंग के साथ बजाया जाए तो गीत शुरू होने से पहले सात कदमों की मार्च की जाएगी।
  10. स्कूलों में – अब विद्यालयों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ गाकर की जाएगी।
  11. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में – जहां तिरंगा फहराया जाएगा, वहां भी इसे सामूहिक रूप से गाया जाएगा।
  12. सार्वजनिक कार्यक्रमों में – जहां जनप्रतिनिधि या विशिष्ट अतिथि उपस्थित हों, वहां भी पूरे सम्मान और गरिमा के साथ इसे गाया जा सकता है।
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कहां नहीं होगा अनिवार्य?

सरकार ने कुछ स्थानों पर इसे अनिवार्य न रखने का भी निर्णय लिया है।

  • सिनेमा हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले ‘वंदे मातरम्’ बजाना या उसके लिए खड़ा होना जरूरी नहीं होगा।
  • यदि यह गीत किसी समाचार फिल्म (न्यूज़रील) या डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा है, तो दर्शकों को खड़ा होने की बाध्यता नहीं होगी।

 

राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत में अंतर

आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाला पहला गीत ‘वंदे मातरम्’ था। लेकिन 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम सत्र में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रीय गान होगा, जबकि स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को समान सम्मान दिया जाएगा।

 

उस समय संविधान सभा के सदस्यों ने दोनों गीत गाए थे।

अब तक राष्ट्रीय गान को सरकारी कार्यक्रमों, परेड और ध्वजारोहण जैसे अवसरों पर अनिवार्य रूप से गाया जाता रहा है। राष्ट्रीय गीत के लिए पहले ऐसी स्पष्ट बाध्यता नहीं थी।

 

राष्ट्रीय गान के अपमान पर राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत तीन साल तक की सजा या जुर्माना हो सकता है। लेकिन राष्ट्रीय गीत के लिए अभी ऐसा कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है।

 

2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के बराबर कानूनी दर्जा देने की मांग की गई थी।

 

2017 में अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान में “राष्ट्रीय गीत” को अनिवार्य रूप से गाने का कोई प्रावधान नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 51A में केवल राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान के सम्मान का उल्लेख है।

 

नियम न मानने पर क्या होगा?

फिलहाल सरकार ने केवल दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अभी तक ऐसा कोई कानून लागू नहीं हुआ है जिसके तहत ‘वंदे मातरम्’ न गाने या न बजाने पर दंड दिया जा सके। भविष्य में यदि सरकार इस पर कानून बनाती है, तो दंड या जुर्माने का प्रावधान स्पष्ट होगा।

 

‘वंदे मातरम्’ विवादों में क्यों रहा?

‘वंदे मातरम्’ की रचना बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को ‘बंगदर्शन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। 1882 में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया।

 

उपन्यास में संन्यासी “वंदे मातरम्” का नारा लगाते हैं और देश को मां के रूप में देखते हैं। बाद में यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख नारा बन गया।

 

लेकिन कुछ मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया।

 

1908 में सर सैयद अली इमाम ने इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गैर-इस्लामी बताया। उनका कहना था कि यह नारा सांप्रदायिक भावना को बढ़ावा देता है।

 

1920 के दशक में कुछ इस्लामी पत्रिकाओं ने इसे मूर्तिपूजा से जोड़कर आपत्ति जताई। 1923 में कांग्रेस के अधिवेशन में मोहम्मद अली जौहर ने इसके विरोध में गाना शुरू होते ही मंच छोड़ दिया।

 

1938 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि मुस्लिम बच्चों को इसे गाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

 

मुख्य आपत्तियां दो थीं:

  1. गीत में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जो इस्लाम में स्वीकार्य नहीं है।
  2. ‘आनंदमठ’ में मुसलमानों को शत्रु के रूप में दिखाया गया है।

 

कुछ इतिहासकारों ने कहा कि बंकिम चंद्र का राष्ट्रवाद हिंदू दृष्टिकोण से प्रभावित था।

 

1998 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों में ‘वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य किया, लेकिन विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हस्तक्षेप से आदेश वापस ले लिया गया।

 

2006 में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा कि सच्चा मुसलमान यह गीत नहीं गा सकता। देवबंद से इसके खिलाफ फतवा भी जारी हुआ।

 

क्या कभी प्रतिबंध भी लगा?

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में ‘वंदे मातरम्’ नारा बन गया था। इससे घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इसे गाने और बोलने पर रोक लगा दी थी। कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और लाठियां चलाई गईं।

 

1937 में विवाद बढ़ने पर कांग्रेस ने एक समिति बनाई, जिसमें रवींद्रनाथ ठाकुर, सुभाष चंद्र बोस, अबुल कलाम आजाद और जवाहरलाल नेहरू शामिल थे। निर्णय हुआ कि राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो पद गाए जाएंगे।

 

इतिहासकारों के अनुसार, शुरुआती दो पद अपेक्षाकृत कम विवादित माने गए।

 

राजनीतिक संदर्भ

7 नवंबर 2025 को ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मारक डाक टिकट और स्मारक सिक्का जारी किया।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इस मुद्दे को प्रमुखता दी जा रही है, क्योंकि इसके रचयिता बंकिम चंद्र बंगाली थे। साथ ही, इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का राजनीतिक लाभ भी संभव माना जा रहा है।

 

निष्कर्ष:

‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान है। नए दिशा-निर्देशों के बाद अब कई सरकारी और शैक्षणिक कार्यक्रमों में इसे अधिक औपचारिक रूप से शामिल किया जाएगा।

 

हालांकि अभी तक इसे न गाने पर कोई कानूनी दंड नहीं है, लेकिन इसके सम्मान को लेकर सरकार ने स्पष्ट दिशा तय कर दी है। इसके साथ ही, यह भी सच है कि ऐतिहासिक और धार्मिक कारणों से यह गीत लंबे समय से चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है।