पीएम मोदी का असम दौरा: हाईवे पर फाइटर जेट लैंडिंग से लेकर 3030 करोड़ के ब्रह्मपुत्र पुल तक, विकास और चुनावी संकेत साथ-साथ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शनिवार को असम के दौरे पर पहुंचे। यह उनका पिछले तीन महीनों में तीसरा असम दौरा है। इस बार का कार्यक्रम सिर्फ परियोजनाओं के उद्घाटन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सुरक्षा, बुनियादी ढांचा, डिजिटल सुविधा और आने वाले विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि भी साफ दिखाई दी।

PM Modi Assam visit

चाबुआ से मोरन तक: खास लैंडिंग का प्रदर्शन

प्रधानमंत्री सबसे पहले चाबुआ एयरफील्ड पहुंचे। वहां से वे वायुसेना के C-130 विमान से डिब्रूगढ़ पहुंचे। उनका विमान मोरन बाइपास पर बनी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) पर उतरा। यह एयरस्ट्रिप NH-127 के 4.4 किलोमीटर लंबे हिस्से पर तैयार की गई है।

मोरन की यह सुविधा खास इसलिए है क्योंकि यह चीन सीमा से लगभग 300 किलोमीटर दूर है और सैन्य दृष्टि से बहुत अहम मानी जा रही है। जरूरत पड़ने पर यहां लड़ाकू और ट्रांसपोर्ट विमान हाईवे पर ही उतर और उड़ान भर सकते हैं।

 

प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यहां 16 लड़ाकू विमानों ने हवाई प्रदर्शन किया। इनमें राफेल और सुखोई जैसे विमान शामिल थे। करीब 30 मिनट तक चले इस प्रदर्शन में विमानों ने हाईवे से ही टेकऑफ और लैंडिंग कर अपनी क्षमता दिखाई। इससे साफ संदेश गया कि देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है।

 

पूर्वोत्तर की पहली डुअल-यूज एयरस्ट्रिप

मोरन में बनी ELF पूर्वोत्तर भारत की पहली ऐसी सुविधा है जिसे सेना और नागरिक विमान, दोनों इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे डुअल-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में विकसित किया गया है।

इसका मतलब है कि सामान्य दिनों में यहां सड़क पर यातायात चलता रहेगा, लेकिन आपात स्थिति या युद्ध जैसे हालात में इसे तुरंत एयरस्ट्रिप में बदला जा सकता है। यह 40 टन तक के फाइटर विमान और 74 टन अधिकतम टेकऑफ वजन वाले ट्रांसपोर्ट विमान संभाल सकती है।

 

भारत में पहली ऐसी सुविधा 2021 में राजस्थान के बाड़मेर जिले में शुरू हुई थी। अब देश के अलग-अलग हिस्सों में करीब 17 ऐसी परियोजनाएं चल रही हैं। इनमें राजस्थान, आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात और असम के कई इलाके शामिल हैं।

 

ब्रह्मपुत्र पर नया सेतु: समय बचेगा, कनेक्टिविटी बढ़ेगी

प्रधानमंत्री ने ब्रह्मपुत्र नदी पर बने कुमार भास्कर वर्मा सेतु का उद्घाटन भी किया। करीब 3,030 करोड़ रुपये की लागत से बना यह छह लेन का पुल गुवाहाटी को नॉर्थ गुवाहाटी से जोड़ता है। इसकी लंबाई 1.24 किलोमीटर है और इसे पूर्वोत्तर भारत का पहला छह लेन एक्स्ट्राडोज्ड प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट पुल बताया जा रहा है।

इस पुल के चालू होने से दोनों इलाकों के बीच यात्रा समय घटकर लगभग सात मिनट रह जाएगा। पहले लोगों को लंबा चक्कर लगाना पड़ता था। अब व्यापार, शिक्षा और रोजमर्रा के काम आसान होंगे।

 

यह इलाका भूकंप के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। इसलिए पुल में बेस आइसोलेशन तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे भूकंप के झटकों का असर कम हो सके। साथ ही हाई-परफॉर्मेंस स्टे केबल्स और ब्रिज हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया गया है, जो पुल की स्थिति पर नजर रखेगा और किसी भी खराबी की तुरंत जानकारी देगा।

 

डिजिटल ढांचे को मजबूती

प्रधानमंत्री ने कामरूप जिले के अमिंगांव में पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए एक नेशनल डेटा सेंटर का उद्घाटन भी किया। इस आधुनिक केंद्र की स्वीकृत क्षमता 8.5 मेगावॉट है और प्रति रैक औसतन 10 किलोवॉट क्षमता होगी।

 

यह डेटा सेंटर सरकारी विभागों के डिजिटल कामकाज को संभालेगा और जरूरत पड़ने पर अन्य राष्ट्रीय डेटा केंद्रों के लिए बैकअप सुविधा भी देगा। इससे पूर्वोत्तर राज्यों में डिजिटल सेवाएं तेज और भरोसेमंद होने की उम्मीद है।

 

शिक्षा और परिवहन को बढ़ावा

प्रधानमंत्री ने IIM गुवाहाटी के अस्थायी परिसर का भी उद्घाटन किया। इससे क्षेत्र में प्रबंधन शिक्षा को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। इससे पूर्वोत्तर के छात्रों को बड़े शहरों में जाने की जरूरत कम हो सकती है।

 

इसके अलावा पीएम-ईबस सेवा योजना के तहत कुल 225 इलेक्ट्रिक बसों को हरी झंडी दिखाई गई। इनमें गुवाहाटी को 100, नागपुर को 50, भावनगर को 50 और चंडीगढ़ को 25 बसें मिलीं। सरकार का कहना है कि इससे करीब 50 लाख लोगों को साफ, सस्ती और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन सुविधा मिलेगी। इससे प्रदूषण भी कम होगा और शहरों में यातायात व्यवस्था सुधरेगी।

 

चुनावी पृष्ठभूमि में दौरा

असम में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह दौरा राजनीतिक नजर से भी अहम माना जा रहा है। राज्य में 2016 से लगातार दो बार एनडीए की सरकार बनी है। उससे पहले 2001 से 2016 तक कांग्रेस सत्ता में थी।

 

चार दिन पहले ही चुनाव आयोग ने 10 फरवरी को असम की अंतिम मतदाता सूची जारी की। SIR प्रक्रिया के बाद लगभग 2.49 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची में शामिल किए गए। करीब 2.43 लाख नाम हटाए गए। यह आंकड़े चुनावी माहौल को और गर्म कर रहे हैं।

 

NRC और CAA फिर चर्चा में

असम की राजनीति लंबे समय से नागरिकता और पहचान के मुद्दों के आसपास घूमती रही है। इस बार भी NRC और CAA चर्चा के केंद्र में हैं।

 

1985 के असम समझौते के मुताबिक 24 मार्च 1971 के बाद राज्य में आए लोगों को अवैध प्रवासी माना जाना था। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में NRC अपडेट हुआ। 2019 में जारी अंतिम सूची से लगभग 19 लाख लोगों के नाम बाहर रह गए। इनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग थे।

 

इससे राज्य में असंतोष बढ़ा। कई परिवारों में एक सदस्य का नाम सूची में था, जबकि दूसरे का नहीं। पुराने दस्तावेज जुटाना ग्रामीण और गरीब लोगों के लिए मुश्किल रहा।

 

इसके बाद 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू हुआ। यह कानून 31 दिसंबर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता देने का रास्ता देता है। असम में इसे लेकर विवाद हुआ, क्योंकि यहां 1971 की कट-ऑफ तारीख को लागू करने की मांग पहले से रही है।

 

NRC सूची को अभी तक औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है। सुधार और कानूनी प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जिससे यह मुद्दा चुनावी बहस में बना हुआ है।

 

इतिहास की पृष्ठभूमि

असम का राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास भी इस संदर्भ में अहम है। 1874 में इसे बंगाल से अलग कर एक अलग प्रांत बनाया गया। 1905 में बंग-भंग के दौरान इसे पूर्वी बंगाल के साथ जोड़ा गया, लेकिन 1912 में फिर अलग कर दिया गया।

 

1937 में यहां पहली निर्वाचित प्रांतीय सरकार बनी। 1947 में आजादी के समय सिलहट जनमत-संग्रह के बाद असम की सीमाएं बदलीं। 1963 में नगालैंड और 1972 में मेघालय अलग राज्य बने।

 

1979 से 1985 तक विदेशी मतदाताओं के मुद्दे पर बड़ा आंदोलन चला, जिसके बाद असम समझौता हुआ। 1990 के दशक में उग्रवाद की समस्या रही। 2001 से 2016 तक तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार रही। 2016 के बाद एनडीए सत्ता में है और 2021 में दोबारा जीती।

 

विकास और सुरक्षा का संतुलन

प्रधानमंत्री के इस दौरे में विकास परियोजनाओं के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर भी जोर दिखा। हाईवे पर एयरस्ट्रिप, आधुनिक पुल, डेटा सेंटर, प्रबंधन संस्थान और इलेक्ट्रिक बसें – ये सभी कदम यह संकेत देते हैं कि सरकार पूर्वोत्तर को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश में है।

 

साथ ही, चुनावी माहौल में इन परियोजनाओं का राजनीतिक संदेश भी साफ है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विकास, नागरिकता और पहचान के मुद्दे मिलकर असम की राजनीति को किस दिशा में ले जाते हैं।