अमेरिका से बड़ी मंजूरी मिलने के बाद भारतीय कंपनी Reliance Industries Ltd अब वेनेजुएला से सीधे कच्चा तेल खरीद सकेगी। सूत्रों के अनुसार अमेरिकी प्रशासन ने कंपनी को एक “जनरल लाइसेंस” दिया है। इस लाइसेंस के तहत रिलायंस पहले से निकाले जा चुके वेनेजुएला के तेल को खरीद, निर्यात और रिफाइन कर सकती है, और इस प्रक्रिया में उस पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
इसी महीने अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति Nicolas Maduro को हिरासत में लेने के बाद वहां के ऊर्जा क्षेत्र पर लगे कुछ प्रतिबंधों में ढील देने का संकेत दिया था। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा था कि वॉशिंगटन और कराकास के बीच करीब 2 अरब डॉलर के तेल समझौते और लगभग 100 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण योजना को आगे बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया गया है। इस योजना का मकसद वेनेजुएला के तेल उद्योग को दोबारा खड़ा करना है।
जनरल लाइसेंस का मतलब है कि पहले से निकाला गया वेनेजुएला का कच्चा तेल अब अधिकृत कंपनियां खरीद और बेच सकती हैं। रिलायंस को यह अनुमति मिलने से वेनेजुएला के तेल निर्यात को गति मिल सकती है और कंपनी के लिए कच्चा तेल सस्ता पड़ सकता है।
रिलायंस के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
रिलायंस गुजरात के जामनगर में दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स चलाती है। यह रिफाइनरी भारी किस्म के कच्चे तेल को प्रोसेस करने में सक्षम है। वेनेजुएला का तेल भी भारी श्रेणी में आता है और आम तौर पर बाजार में छूट (डिस्काउंट) पर मिलता है। ऐसे में सीधी खरीद से कंपनी की लागत घट सकती है और मुनाफा बढ़ सकता है।
सूत्रों के मुताबिक रिलायंस ने जनवरी की शुरुआत में इस लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। हालांकि कंपनी ने इस पर आधिकारिक बयान नहीं दिया है। अमेरिकी वित्त विभाग के तहत काम करने वाला Office of Foreign Assets Control भी इस बारे में तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे सका।
क्या रूस की जगह लेगा वेनेजुएला?
रिलायंस ने हाल ही में 20 लाख बैरल वेनेजुएला का तेल खरीदा था। यह खरीद ट्रेडर कंपनी Vitol के जरिए हुई थी। विटोल और Trafigura को भी अमेरिका ने वेनेजुएला का तेल बेचने के लिए विशेष अनुमति दी थी।
अब अगर रिलायंस सीधे वेनेजुएला से तेल खरीदती है तो उसे रूस से आने वाले कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। भारी तेल कम दाम पर मिलने से यह सौदा आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।
अमेरिका-भारत व्यापार समझौते का असर
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने हाल ही में भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क को हटाने की घोषणा की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा और संभव है कि वेनेजुएला से भी आयात बढ़ाए।
सूत्रों का कहना है कि भारतीय रिफाइनर, जिनमें रिलायंस भी शामिल है, अप्रैल डिलीवरी के लिए रूसी तेल की नई खरीद से बच रहे हैं। माना जा रहा है कि यह कदम भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
पहले क्यों रुकी थी खरीद?
साल 2019 में अमेरिका ने वेनेजुएला पर सख्त प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद भारत समेत कई देशों ने वहां से तेल खरीदना बंद कर दिया था। रिलायंस भी पहले वेनेजुएला के तेल की नियमित खरीदार थी, लेकिन 2025 की शुरुआत में उसे यह खरीद रोकनी पड़ी।
वेनेजुएला तेल उत्पादक देशों के समूह OPEC का सदस्य है। उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार माना जाता है, जो लगभग 303 अरब बैरल है। हालांकि उत्पादन की कमी और आर्थिक संकट के कारण वह वैश्विक आपूर्ति में करीब 1 प्रतिशत ही योगदान दे पा रहा है।
जामनगर रिफाइनरी की क्षमता
रिलायंस दो रिफाइनरियां चलाती है जिनकी कुल क्षमता लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन है। जामनगर कॉम्प्लेक्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह अलग-अलग तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सके। भारी तेल को सस्ते में खरीदकर उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलना कंपनी की ताकत मानी जाती है।
अगर वेनेजुएला से नियमित आपूर्ति शुरू होती है तो कंपनी को कच्चे तेल की लागत नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। इससे पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों के निर्यात में भी फायदा हो सकता है।
आगे क्या?
अभी यह साफ नहीं है कि यह लाइसेंस कितनी अवधि के लिए है और इसके तहत कुल कितनी मात्रा में तेल खरीदा जा सकेगा। साथ ही, वैश्विक तेल कीमतों, अमेरिका-वेनेजुएला संबंधों और भारत की कूटनीतिक नीति पर भी आगे की स्थिति निर्भर करेगी।
फिलहाल इतना तय है कि इस फैसले से रिलायंस को नई ऊर्जा आपूर्ति का रास्ता मिल गया है। यह कदम न केवल कंपनी के लिए बल्कि भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए भी अहम साबित हो सकता है। अगर वेनेजुएला से आयात स्थिर रहता है, तो यह भारत के तेल स्रोतों को विविध बनाने (अलग-अलग देशों से खरीद) की रणनीति को मजबूत करेगा।
