क्या एक सदी बाद खुल पाएगा कोणार्क मंदिर का गर्भगृह? शुरू हुआ ASI का सबसे बड़ा अभियान, जानिए क्या है मामला?

ओडिशा के पुरी के पास स्थित 13वीं शताब्दी का ऐतिहासिक कोणार्क सूर्य मंदिर एक बार फिर चर्चा में है। सदियों पुरानी इस धरोहर के गर्भगृह को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है।

 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने मंदिर के अंदर भरी गई रेत को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ, तो एक साल के भीतर श्रद्धालु पहली बार मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर सकेंगे। यह कदम न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिहाज से भी बेहद खास माना जा रहा है।


क्यों भरी गई थी गर्भगृह में रेत?

आज से लगभग 120 साल पहले, 1903-04 में अंग्रेज अधिकारियों ने मंदिर के गर्भगृह यानी जगमोहन हॉल में हजारों टन रेत भरवा दी थी। उस समय मंदिर के ढांचे में दरारें आने लगी थीं और गिरने का खतरा बढ़ गया था। मंदिर के पीछे करीब 15 फीट ऊंची दीवार बनाई गई और गर्भगृह को पूरी तरह बंद कर दिया गया। उस दौर में यह कदम मंदिर को बचाने के लिए जरूरी समझा गया।


तब से लेकर अब तक एक सदी से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन किसी भी श्रद्धालु को गर्भगृह के भीतर जाने की अनुमति नहीं मिली। अब ASI और आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों की टीम इसे वैज्ञानिक तरीके से खोलने की तैयारी में जुटी है।

Konark Temple sanctum sanctorum reopen after a century

कैसे चल रहा है यह बड़ा अभियान?
ASI पुरी सर्किल के सुपरिंटेंडेंट डीबी गढ़नायक के अनुसार, गर्भगृह से पूरी रेत निकालने में करीब तीन महीने का समय लगेगा। इसके बाद संरचना की मजबूती और मरम्मत का काम होगा। यदि सभी जांच और सुधार ठीक रहे, तो करीब एक साल बाद श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह के द्वार खोले जा सकते हैं।


यह काम आसान नहीं है। मंदिर की ऊंचाई करीब 127 फीट है और 80 फीट की ऊंचाई पर विशेष ‘जीरो वाइब्रेशन’ तकनीक से डायमंड ड्रिल की जा रही है। ड्रिल के जरिए 8.5 मीटर लंबा और 160 मिमी चौड़ा पत्थर तथा अंदर की रेत का नमूना निकाला गया है। यह सैंपल जांच के लिए आईआईटी मद्रास भेजा गया है। रिपोर्ट आने के बाद आगे की प्रक्रिया तय होगी।


अंदर की स्थिति जानना क्यों जरूरी?
गर्भगृह की असली हालत क्या है, यह आज तक किसी को ठीक से पता नहीं था। दीवारें कितनी मजबूत हैं, अंदर कहीं झुकाव या दरार तो नहीं है—इन सभी बातों की जांच जरूरी थी। इसलिए पहले थ्रीडी लेजर स्कैनिंग की गई और पूरे ढांचे का डिजिटल अध्ययन किया गया।


जांच में सामने आया कि कुछ हिस्सों में दरारें, ढलान और असंतुलन मौजूद है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रेत को एक साथ निकाल दिया जाता, तो पत्थरों के खिसकने और दरारें बढ़ने का खतरा हो सकता था। इसी वजह से आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञ अरुण मेनन ने काम को कई चरणों में बांटने की योजना बनाई है।


हर चरण में थोड़ी-थोड़ी रेत हटाई जाएगी और साथ ही पत्थरों को सहारा दिया जाएगा। इस दौरान 40 हाई-प्रिसिजन सेंसर लगातार ढांचे में हो रहे बदलाव पर नजर रख रहे हैं। इन सेंसर से मिलने वाले डेटा का विश्लेषण विशेषज्ञ कर रहे हैं, ताकि जरा सी भी गड़बड़ी होने पर तुरंत कदम उठाया जा सके।


रेत क्यों धंस चुकी है?
मंदिर में काम कर रहे गाइड सुकंत कुमार पाड़ी के अनुसार, गर्भगृह में भरी गई रेत अब नीचे बैठ चुकी है। उन्होंने बताया कि पहले पाइप के जरिए आवाज लगाने पर आवाज दूसरी ओर से सुनाई देती थी, जिससे अंदाजा लगा कि ऊपरी हिस्सा कुछ हद तक खाली हो चुका है। यह भी एक वजह है कि अब रेत निकालने की जरूरत महसूस की गई।


विशेषज्ञों के मुताबिक, अंदर भरी रेत 4 से 5 फीट तक धंस चुकी है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाया गया, तो यह असंतुलन मंदिर के लिए और बड़ा खतरा बन सकता था।


कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास
कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण 13वीं सदी में गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने कराया था। माना जाता है कि इसे बनाने में करीब 12 साल का समय लगा। यह मंदिर सूर्य देव को समर्पित है और इसे एक विशाल रथ के आकार में बनाया गया है।


मंदिर के दोनों ओर 12-12 पहियों की दो कतारें हैं। कई लोग मानते हैं कि ये 24 पहिए दिन के 24 घंटों का प्रतीक हैं, जबकि कुछ विद्वान इन्हें साल के 12 महीनों से जोड़ते हैं। मंदिर के सामने बने सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों का प्रतीक माने जाते हैं।


मंदिर के बाहरी हिस्से में खोंडालाइट पत्थर और अंदर की ओर लैटराइट पत्थर का उपयोग किया गया है। एक पत्थर भारी है और दूसरा हल्का। माना जाता है कि निर्माण के कुछ वर्षों बाद गर्भगृह का एक हिस्सा गिर गया था। बाद में जब जगमोहन हॉल भी कमजोर होने लगा, तब अंग्रेज अधिकारी जेए बॉर्डियन ने उसमें रेत भरवाने का फैसला लिया।


समुद्री यात्रा करने वाले लोग कभी इसे ‘ब्लैक पगोडा’ के नाम से भी पुकारते थे। उनका मानना था कि यह संरचना जहाजों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।


विश्व धरोहर का दर्जा
इस ऐतिहासिक मंदिर को वर्ष 1984 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। यह दर्जा मिलने के बाद इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान और भी बढ़ी। हर साल यहां 35 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचते हैं। ASI के संरक्षित स्मारकों में ताजमहल के बाद यह सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थलों में शामिल है।


यह मंदिर केवल स्थापत्य कला का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह उस समय की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सोच को भी दर्शाता है। इसकी दीवारों पर की गई नक्काशी और मूर्तियां उस दौर की कला और जीवन शैली की झलक देती हैं।


संरक्षण क्यों है जरूरी?
सांस्कृतिक धरोहरें किसी भी देश की पहचान होती हैं। ये न केवल इतिहास को सहेजती हैं, बल्कि पर्यटन और स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा देती हैं। कोणार्क जैसे स्थलों से हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी है।


संस्कृति का महत्व सिर्फ आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है। यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है, ज्ञान को आगे बढ़ाती है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत समझने का अवसर देती है। ऐसे में कोणार्क मंदिर का संरक्षण एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।


आगे क्या होगा?
आईआईटी मद्रास से सैंपल की रिपोर्ट आने के बाद रेत को वैज्ञानिक तरीके से हटाने की पूरी योजना लागू की जाएगी। रेत हटने के बाद गर्भगृह के ढांचे को पहले जैसा मजबूत बनाने का प्रयास होगा। विशेषज्ञों का लक्ष्य है कि मंदिर को अगले हजार साल तक सुरक्षित रखा जा सके।


हालांकि यह प्रक्रिया बेहद सावधानी से की जा रही है, क्योंकि जरा सी गलती भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। कुछ पत्थरों में सूक्ष्म दरारें भी मिली हैं, इसलिए पहले ढांचे को मजबूत किया जा रहा है और फिर रेत हटाई जा रही है।


अगर यह अभियान सफल रहा, तो यह ASI के इतिहास का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संरक्षण कार्य साबित होगा। साथ ही, श्रद्धालुओं के लिए यह एक ऐतिहासिक पल होगा, जब वे पहली बार एक सदी बाद कोणार्क सूर्य मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर सकेंगे।