बांग्लादेश में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। जमात-ए-इस्लामी ने घोषणा की है कि वह नई कैबिनेट के शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार करेगी।
पार्टी के नेता शफीकुल इस्लाम मसूद ने कहा कि उनका दल इस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेगा। उन्होंने बताया कि यह फैसला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के उस रुख के विरोध में लिया गया है, जिसमें BNP ने संविधान सुधार परिषद (Constitutional Reform Council) के सदस्य के रूप में शपथ लेने से इनकार कर दिया है।
मसूद के मुताबिक, जब तक BNP इस परिषद की शपथ नहीं लेती, तब तक जमात-ए-इस्लामी भी कैबिनेट की शपथ प्रक्रिया से दूर रहेगी। सवाल यह है कि जब सांसद चुने जा चुके हैं, तो फिर दूसरी शपथ की जरूरत क्यों पड़ी? और इस पर इतना विवाद क्यों हो रहा है?
चुनाव और जनमत-संग्रह साथ-साथ
12 फरवरी को बांग्लादेश में आम चुनाव कराए गए। इसी दिन “जुलाई चार्टर 2025” पर जनमत-संग्रह भी हुआ। चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने बड़ी जीत हासिल की। 300 सीटों वाली संसद में BNP और उसके सहयोगियों को 212 सीटें मिलीं। इसे दो-तिहाई बहुमत माना जा रहा है।
दूसरी ओर, जुलाई चार्टर पर हुए जनमत-संग्रह में 62 प्रतिशत लोगों ने ‘हाँ’ में वोट दिया। यह चार्टर देश की शासन व्यवस्था में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखता है।
विवाद की जड़: दो शपथ क्यों?
आम तौर पर सांसद संसद सदस्य के रूप में शपथ लेते हैं। लेकिन इस बार स्थिति अलग थी। जुलाई चार्टर के तहत प्रस्ताव है कि संसद को 180 दिनों के लिए “संविधान सभा” (Constituent Assembly) का रूप दिया जाए। इस अवधि में संसद को संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं में बदलाव करने का अधिकार मिलेगा।
इसी कारण सांसदों को दो शपथ लेनी थीं-
- संसद सदस्य के रूप में
- संविधान सुधार परिषद (Constitution Reform Council) के सदस्य के रूप में
मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिरुद्दीन ने संसद भवन में BNP के सांसदों को पहली शपथ दिलाई। लेकिन BNP के सांसदों ने दूसरी शपथ लेने से इनकार कर दिया।
BNP ने दूसरी शपथ क्यों नहीं ली?
BNP के स्थायी समिति सदस्य सलाहुद्दीन अहमद ने साफ कहा कि पार्टी के सांसदों को संविधान सुधार परिषद के सदस्य के रूप में नहीं चुना गया है। उनका कहना है कि इस परिषद का प्रावधान अभी संविधान में शामिल ही नहीं किया गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि पार्टी के सांसदों ने यह फैसला नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के निर्देश पर लिया। BNP का तर्क है कि जुलाई चार्टर का मसौदा तैयार करते समय उनसे पूरी तरह सलाह नहीं ली गई। पार्टी ने चार्टर पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन उसके कई प्रावधानों पर उसे आपत्ति है।
जमात और एनसीपी की सख्त प्रतिक्रिया
BNP के इस फैसले के बाद सहयोगी दलों-जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP)-ने कड़ा रुख अपनाया।
जमात-ए-इस्लामी के नेता शफीकुल इस्लाम मसूद ने कहा कि अगर BNP के सांसद संविधान सुधार परिषद की शपथ नहीं लेते, तो उनकी पार्टी भी कोई शपथ नहीं लेगी। जमात के उप-प्रमुख सैयद अब्दुल्ला मोहम्मद ताहेर ने कहा कि “संविधान में सुधार के बिना संसद का कोई मतलब नहीं है।”
एनसीपी के नेताओं ने भी यही रुख अपनाया। उनका कहना था कि अगर जुलाई चार्टर के तहत सुधार प्रक्रिया शुरू नहीं होती, तो यह पुराने शासन की तरह ही स्थिति होगी।
क्या है जुलाई चार्टर?
जुलाई चार्टर 2025 दरअसल 84 सुधार प्रस्तावों का दस्तावेज है। इसे जुलाई 2024 में हुए छात्र आंदोलन के बाद तैयार किया गया। इसी आंदोलन के चलते पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी थी।
चार्टर का मुख्य उद्देश्य है-कार्यपालिका यानी सरकार के हाथों में ज्यादा ताकत जमा न होने देना। दस्तावेज में कहा गया है कि भविष्य में “तानाशाही या एकतरफा शासन” की वापसी रोकने के लिए संस्थाओं में बदलाव जरूरी है।
इन 84 प्रस्तावों में से 47 के लिए संविधान में संशोधन करना होगा। बाकी 37 को कानून या सरकारी आदेश के जरिए लागू किया जा सकता है। योजना के अनुसार संविधान सुधार परिषद को 270 कार्यदिवस के भीतर इन बदलावों को लागू करना है।
मतभेद कैसे बढ़े?
जुलाई चार्टर को लेकर शुरुआत से ही मतभेद रहे हैं। जमात और एनसीपी पहले सुधार चाहते थे, फिर चुनाव। जबकि BNP पहले चुनाव कराने के पक्ष में थी। अंततः चुनाव और जनमत-संग्रह एक ही दिन कराए गए।
अब जब चुनाव हो चुके हैं और सरकार बनने जा रही है, तो दूसरी शपथ को लेकर विवाद ने स्थिति को जटिल बना दिया है।
पहले बहिष्कार की चेतावनी, फिर बदला फैसला
शुरुआत में जमात और एनसीपी ने शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार करने की चेतावनी दी। उन्होंने साफ कहा कि अगर BNP सांसद दूसरी शपथ नहीं लेते, तो वे भी शपथ नहीं लेंगे।
लेकिन बाद में 11 दलों की बैठक के बाद जमात ने अपना रुख बदला। रिपोर्टों के अनुसार, जमात के सांसदों ने दोपहर 12:23 बजे संसद सदस्य के रूप में और 12:27 बजे संविधान सभा के सदस्य के रूप में शपथ ली।
एनसीपी के छह सांसदों ने भी लगभग 1:30 बजे दोनों शपथ ले लीं। हालांकि अब तक किसी भी BNP सांसद ने संविधान सुधार परिषद के सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली है।
फिर बढ़ा तनाव
राजनीतिक विवाद के बीच जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव में गड़बड़ी और नोआखाली में एक महिला से कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना को लेकर सख्त बयान दिया। बताया गया कि उस महिला ने एनसीपी को वोट दिया था।
जमात के महासचिव मिया गोलाम परवर ने आरोप लगाया कि चुनाव में धांधली और बाद की हिंसा से लोगों की उम्मीदें टूट गई हैं। उन्होंने कहा कि “खराब चुनाव जीतकर और फिर हमले करना पुराने दौर की याद दिलाता है।”
यह टिप्पणी सीधे तौर पर पहले शेख हसीना सरकार के खिलाफ चले आंदोलन की याद दिलाती है, जिसमें “फासीवाद” जैसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ था। अब वही शब्द BNP के खिलाफ भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर BNP सांसद संविधान सुधार परिषद की शपथ नहीं लेते, तो जुलाई चार्टर के तहत प्रस्तावित बदलाव कैसे लागू होंगे?
BNP के पास संसद में मजबूत बहुमत है। अगर वह परिषद का हिस्सा नहीं बनती, तो सुधार प्रक्रिया रुक सकती है। दूसरी ओर, जमात और एनसीपी जैसे दलों के लिए यह मुद्दा राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ा है। वे सुधार को जनता के जनादेश का हिस्सा मानते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है। अगर सहमति नहीं बनी, तो सड़कों पर विरोध प्रदर्शन बढ़ सकते हैं।
