क्या बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होगा भारत? ट्रम्प के बयान से मिले संकेत, जानिए क्या है मामला?

वॉशिंगटन डीसी में गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पहल पर बने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली आधिकारिक बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में भारत ने ऑब्जर्वर देश के रूप में हिस्सा लिया। भारत की ओर से वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास में तैनात चार्ज द’अफेयर्स नमग्या सी खम्पा ने भाग लिया।


हालांकि भारत ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह इस बोर्ड का स्थायी सदस्य बनेगा या नहीं। पिछले महीने दावोस में इसके लॉन्च कार्यक्रम में भारत शामिल नहीं हुआ था। इस बार भारत की मौजूदगी को कूटनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है, लेकिन फिलहाल उसने दूरी बनाकर स्थिति का आकलन करने का संकेत दिया है।


गाजा के लिए बड़ा राहत पैकेज
बैठक का मुख्य एजेंडा गाजा के पुनर्निर्माण और स्थिरता से जुड़ा था। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के मंच से कुल 1.5 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की गई। ट्रम्प ने बताया कि नौ सदस्य देश मिलकर करीब 63 हजार करोड़ रुपये (7 अरब डॉलर) देंगे, जबकि अमेरिका अकेले 90 हजार करोड़ रुपये (10 अरब डॉलर) का योगदान करेगा।


ट्रम्प ने कहा कि यह रकम युद्ध पर होने वाले खर्च के मुकाबले बहुत छोटी है। उनके मुताबिक, अगर देश मिलकर काम करें तो उस क्षेत्र में स्थायी शांति लाई जा सकती है, जो लंबे समय से हिंसा और संघर्ष झेल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि गाजा में लगाया गया हर डॉलर स्थिरता और बेहतर भविष्य की दिशा में निवेश होगा।


हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस फंड का इस्तेमाल किस तरह होगा, किस समय सीमा में काम शुरू होगा और कितने सैनिक तैनात किए जाएंगे।

सैनिक तैनाती पर सहमति

बैठक में पांच देशों ने युद्ध से प्रभावित फिलिस्तीनी इलाके में सैनिक भेजने पर सहमति जताई। चर्चा का केंद्र एक “इंटरनेशनल स्टैबलाइजेशन फोर्स” बनाने पर रहा, जिसका उद्देश्य सुरक्षा बनाए रखना और हमास को निरस्त्र कराना होगा।

 

इस फोर्स के प्रमुख मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स के अनुसार, योजना के तहत करीब 12,000 पुलिसकर्मियों और 20,000 सैनिकों की जरूरत होगी। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन-कौन से देश कितनी संख्या में सैनिक भेजेंगे।

 

हमास और इजराइल की अलग-अलग शर्तें

इस प्रस्ताव पर हमास और इजराइल की स्थिति अलग-अलग है। हमास का कहना है कि जब तक इजराइली सेना पूरी तरह गाजा से नहीं हटती, वह हथियार नहीं छोड़ेगा। हमास नेता ओसामा हमदान ने हाल ही में कहा कि संगठन ने निरस्त्रीकरण पर कोई औपचारिक फैसला नहीं लिया है।

 

दूसरी ओर, इजराइल का रुख साफ है कि जब तक हमास पूरी तरह हथियार नहीं डालता, तब तक उसकी सेना गाजा से नहीं हटेगी। इजराइल ने हमास को 60 दिनों की समय सीमा दी है। ऐसे में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

 

कौन-कौन हैं बोर्ड में शामिल?

बैठक में करीब 50 देशों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। इनमें 27 देश बोर्ड के सदस्य हैं। सदस्य देशों में अजरबैजान, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इजराइल, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान और वियतनाम जैसे देश शामिल हैं।

 

भारत और यूरोपीय संघ समेत कई देश ऑब्जर्वर के रूप में शामिल हुए। जर्मनी, इटली, नॉर्वे, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन जैसे देशों ने सदस्यता नहीं ली, लेकिन पर्यवेक्षक के तौर पर भाग लिया।

 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली और हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन खुद बैठक में पहुंचे। भारत सहित अधिकतर देशों ने वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा।

 

UN की भूमिका पर नई बहस

ट्रम्प ने कहा कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र (UN) की निगरानी करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि वह प्रभावी तरीके से काम कर रहा है। इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह पहल वैश्विक कूटनीति में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर कर सकती है।

 

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पांच स्थायी सदस्यों में से अमेरिका को छोड़कर किसी अन्य देश ने अभी तक इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है। बोर्ड के मसौदा चार्टर के अनुसार, जो देश तीन साल से अधिक समय तक सदस्य रहना चाहते हैं, उन्हें 1 अरब डॉलर का योगदान देना होगा।

 

ट्रम्प ने कहा कि यह बोर्ड केवल गाजा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के अन्य संघर्षों को सुलझाने में भी भूमिका निभाएगा।

 

ट्रम्प का ईरान को अल्टीमेटम

बैठक के दौरान ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाया। उन्होंने 10 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई पर विचार कर सकता है।

 

ट्रम्प ने कहा कि ईरान के साथ समझौता आसान नहीं है, लेकिन अगर बातचीत सफल नहीं हुई तो आगे कदम उठाना पड़ेगा।

 

भारत-पाकिस्तान पर फिर दावा

कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित संघर्ष को रोका था। उन्होंने कहा कि उस समय हालात बेहद खराब थे और दोनों देशों के बीच लड़ाई तेज हो रही थी।

 

ट्रम्प के मुताबिक, उन्होंने दोनों देशों के नेताओं को फोन कर 200% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी और कहा था कि अगर वे संघर्ष नहीं रोकेंगे तो कोई व्यापार समझौता नहीं होगा। उन्होंने दावा किया कि इस दौरान 11 महंगे फाइटर जेट गिराए गए थे, हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि वे किस देश के थे।

 

भारत लगातार यह कहता रहा है कि भारत-पाकिस्तान मामलों में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी। इसके बावजूद ट्रम्प अब तक 75 से अधिक बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने दोनों देशों के बीच तनाव कम कराया।

 

शरीफ की प्रतिक्रिया और वीडियो वायरल

ट्रम्प ने कार्यक्रम में कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उनकी पहल की सराहना की थी। इस दौरान ट्रम्प ने शरीफ को खड़े होने के लिए कहा और उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

 

शरीफ ने ट्रम्प को दक्षिण एशिया की शांति में भूमिका निभाने वाला बताया।

 

चीन दौरे का ऐलान

ट्रम्प ने यह भी बताया कि वे अप्रैल में चीन का दौरा करेंगे। उन्होंने कहा कि उनका राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अच्छा संबंध है और पिछली यात्रा के दौरान उनका शानदार स्वागत हुआ था। उन्होंने हल्के अंदाज में चीनी सैनिकों की अनुशासनबद्ध व्यवस्था पर भी टिप्पणी की।

 

बोर्ड ऑफ पीस: उद्देश्य और विवाद

‘बोर्ड ऑफ पीस’ का प्रस्ताव ट्रम्प ने सितंबर 2025 में गाजा युद्ध खत्म करने की योजना के तहत रखा था। अमेरिका ने करीब 60 देशों को इसमें शामिल होने का निमंत्रण दिया है।

 

इसका घोषित उद्देश्य वैश्विक स्तर पर संघर्षों को सुलझाने में सक्रिय भूमिका निभाना है। लेकिन कई देशों को चिंता है कि इससे संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कमजोर हो सकती है और वैश्विक कूटनीति में नई खींचतान पैदा हो सकती है।

 

भारत का रुख क्या संकेत देता है?

भारत ने इस बैठक में ऑब्जर्वर के रूप में हिस्सा लेकर संतुलित रुख अपनाया है। वह सीधे सदस्य बनने की जल्दबाजी में नहीं दिखा, लेकिन पूरी तरह दूरी भी नहीं बनाई। इससे संकेत मिलता है कि भारत इस पहल को ध्यान से परख रहा है।

 

गाजा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी वैश्विक मंच में शामिल होना कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में भारत का अगला कदम यह तय करेगा कि वह इस बोर्ड के साथ कितनी गहराई से जुड़ना चाहता है।

 

आगे की राह

गाजा के पुनर्निर्माण, सैनिक तैनाती, हमास के निरस्त्रीकरण और UN की भूमिका जैसे मुद्दे आने वाले समय में इस बोर्ड की परीक्षा लेंगे।

 

फिलहाल राहत पैकेज और सैन्य सहयोग की घोषणा हो चुकी है, लेकिन असली चुनौती जमीन पर परिणाम दिखाने की है।