हाल ही में सामने आई एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने भारत की ऊर्जा नीति और कॉरपोरेट भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका से मिली उस 30 दिन की विशेष छूट को हासिल करने में रिलायंस इंडस्ट्रीज की सक्रिय भूमिका रही, जिसके कारण भारत फिर से रूस से कच्चा तेल खरीद सका। इस खुलासे के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत की विदेश नीति में कॉरपोरेट कंपनियों का प्रभाव बढ़ रहा है।
कैसे मिली अमेरिका से अस्थायी छूट
अमेरिका के वित्त मंत्रालय के अधीन काम करने वाला ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने 5 मार्च को यह अस्थायी छूट जारी की थी। इस फैसले के तहत भारतीय रिफाइनरियों को उन रूसी तेल खेपों को खरीदने की अनुमति दी गई जो 5 मार्च से पहले जहाजों पर लोड हो चुकी थीं। यह अनुमति केवल 4 अप्रैल तक के लिए दी गई थी।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे अस्थायी व्यवस्था बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति में अचानक आई कमी को कम करना है। दरअसल, उस समय हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही थी, जिससे कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ रहा था।

रिलायंस की भूमिका पर रिपोर्ट का दावा
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस छूट को हासिल करने में रिलायंस इंडस्ट्रीज के नेतृत्व द्वारा किए गए व्यावसायिक प्रयास काफी अहम साबित हुए। रिपोर्ट में कहा गया कि कंपनी ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा और इसी सक्रियता का असर अंतिम फैसले पर पड़ा।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि रिलायंस ने इसी दौरान वेनेजुएला से जुड़े तेल सौदों में भी प्रगति की। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि रूस पर लगे प्रतिबंधों के कारण कई देशों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ रहे हैं।
सरकार का दावा और उठते सवाल
भारत की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस छूट को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा कूटनीति की सफलता बताया था। सरकार के समर्थकों का कहना था कि भारत ने अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक दबाव के बीच भी तेल आपूर्ति सुनिश्चित की।
लेकिन रिपोर्ट में यह संकेत मिलने के बाद कि इस फैसले में कॉरपोरेट स्तर की बातचीत ज्यादा प्रभावी रही, विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। आलोचकों का कहना है कि अगर किसी निजी कंपनी के प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय नीतियों में बदलाव होता है, तो इससे विदेश नीति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
भारतीय रिफाइनरियों ने तेजी से खरीदा तेल
जैसे ही अमेरिका की ओर से यह अस्थायी छूट मिली, भारतीय तेल कंपनियों ने तुरंत कदम उठाया। रिपोर्ट के अनुसार इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और रिलायंस इंडस्ट्रीज ने स्पॉट मार्केट से लगभग 1-1 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदा।
इसके अलावा अन्य भारतीय रिफाइनरियों ने भी कुछ मात्रा में तेल खरीदा, जिससे कुल खरीद करीब 3 करोड़ बैरल तक पहुंच गई। यह खरीद इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि उस समय वैश्विक बाजार में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी।
रूसी तेल की कीमतों में बदलाव
पिछले कुछ वर्षों में रूस अपने तेल को कई देशों को भारी छूट देकर बेच रहा था। लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी अलग रही। रिपोर्टों के अनुसार भारत को मिले रूसी तेल के ग्रेड—जैसे उराल्स, ESPO और वरांडेय—इस बार अंतरराष्ट्रीय मानक डेटेड ब्रेंट से 2 से 8 डॉलर प्रति बैरल महंगे दाम पर मिले।
यह बदलाव इस बात का संकेत माना जा रहा है कि बाजार में मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने के कारण रूस को अब पहले जैसी छूट देने की जरूरत नहीं पड़ रही।
रिलायंस और अमेरिका के बढ़ते कारोबारी संबंध
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक तेल सौदे तक सीमित नहीं है। हाल के महीनों में रिलायंस और अमेरिका के बीच कारोबारी संबंध तेजी से बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
फरवरी में रिलायंस को अमेरिका से एक जनरल लाइसेंस मिला था, जिसके तहत वह सीधे वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीद सकती है। इस कदम का उद्देश्य रूसी तेल पर निर्भरता कम करना और वैकल्पिक स्रोतों से सस्ता तेल हासिल करना था।
टेक्सास में नई रिफाइनरी परियोजना
इसी दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह भी घोषणा की कि रिलायंस टेक्सास के ब्राउन्सविल पोर्ट पर बनने वाली एक नई रिफाइनरी परियोजना में निवेश करेगी। ट्रम्प ने इसे लगभग 300 अरब डॉलर का ऐतिहासिक सौदा बताया था।
हालांकि उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना की वास्तविक लागत लगभग 4 से 5 अरब डॉलर के आसपास हो सकती है। अभी तक इस परियोजना को लेकर अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं और रिलायंस ने भी इस पर सार्वजनिक रूप से ज्यादा टिप्पणी नहीं की है।
बदलते संबंधों की चर्चा
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि रिलायंस और अमेरिकी प्रशासन के संबंध समय के साथ बदलते रहे हैं। एक समय ऐसा था जब ट्रम्प प्रशासन और रिलायंस के बीच मतभेद देखे गए थे, लेकिन अब दोनों के बीच सहयोग बढ़ता दिखाई दे रहा है।
बताया जा रहा है कि रिलायंस “अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग” नामक परियोजना में हिस्सेदारी लेने या लंबे समय तक तेल खरीद समझौता करने पर बातचीत कर रही है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार कंपनी 20 साल तक तेल खरीदने का समझौता भी कर सकती है।
निष्कर्ष:
रूस से तेल खरीदने के लिए मिली अमेरिकी छूट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को अस्थायी राहत जरूर दी है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में रिलायंस की भूमिका सामने आने के बाद नई बहस शुरू हो गई है।
एक तरफ इसे भारत की व्यावसायिक ताकत और वैश्विक नेटवर्क का उदाहरण माना जा रहा है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बड़े कॉरपोरेट समूह अंतरराष्ट्रीय फैसलों को प्रभावित करने की स्थिति में आ गए हैं।

