मिडिल-ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। Donald Trump के प्रशासन ने ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में 30 दिन की अस्थायी ढील देने का ऐलान किया है। यह छूट खास तौर पर उन तेल टैंकरों के लिए दी गई है, जो पहले से समुद्र में मौजूद हैं।

अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि इसका मकसद ग्लोबल मार्केट में तेल की सप्लाई बढ़ाना और तेजी से बढ़ती कीमतों को काबू में रखना है।

कब तक लागू रहेगी यह छूट?
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अनुसार यह छूट 20 मार्च से 19 अप्रैल 2026 तक लागू रहेगी। यानी करीब एक महीने के लिए बाजार में ईरानी तेल की सीमित एंट्री की अनुमति दी गई है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। 28 फरवरी से शुरू हुए इस संघर्ष के बाद कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं।
जहां पहले तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं अब यह 110 डॉलर के पार पहुंच चुकी है। कुछ समय के लिए तो यह 120 डॉलर तक भी चली गई थी।
इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह Strait of Hormuz का बंद होना है। यह समुद्री रास्ता फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के लगभग 20% तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है।
14 करोड़ बैरल तेल बाजार में आएगा
अमेरिका का अनुमान है कि इस फैसले से करीब 14 करोड़ बैरल तेल तेजी से बाजार में पहुंचेगा। इससे सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों पर बना दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह मात्रा पूरी दुनिया की केवल करीब डेढ़ दिन की जरूरत के बराबर है, इसलिए इसका असर ज्यादा लंबे समय तक नहीं रह सकता।
क्या यह ईरान के लिए राहत है?
इस फैसले को लेकर एक बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका ईरान के प्रति नरम हो रहा है। लेकिन ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने साफ किया है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
उनका कहना है कि यह एक रणनीतिक कदम है। अमेरिका इस तेल को अपने सहयोगी देशों तक पहुंचाना चाहता है, ताकि बाजार में संतुलन बना रहे। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि ईरान इस बिक्री से मिलने वाले पैसे का पूरा फायदा न उठा सके।
रूस के तेल पर भी ढील
इसी के साथ अमेरिका ने रूसी तेल पर भी एक सीमित छूट दी है। नए नियम के तहत उन टैंकरों से तेल बेचने की अनुमति दी गई है, जो 12 मार्च तक लोड हो चुके थे। यह छूट 11 अप्रैल 2026 तक लागू रहेगी।
हालांकि इस छूट में कुछ देशों को शामिल नहीं किया गया है, जैसे उत्तर कोरिया, क्यूबा और क्रीमिया।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना अहम?
Strait of Hormuz दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग माना जाता है। इसकी लंबाई करीब 167 किलोमीटर है और यह कई बड़े तेल उत्पादक देशों के लिए लाइफलाइन जैसा है।
सऊदी अरब, इराक, कुवैत जैसे देश अपने तेल निर्यात के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं। भारत भी अपनी जरूरत का करीब 50% कच्चा तेल और 54% एलएनजी इसी मार्ग से आयात करता है।
जंग के कारण यह रास्ता असुरक्षित हो गया है, जिससे तेल टैंकरों की आवाजाही लगभग रुक गई है।
ईरान पर प्रतिबंधों का इतिहास
ईरान पर अमेरिका ने पहली बार 1979 में प्रतिबंध लगाए थे, जब तेहरान में अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों को बंधक बना लिया गया था।
इसके बाद 2015 में JCPOA के तहत कुछ राहत दी गई थी। लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने इस समझौते से हटकर फिर से सख्त प्रतिबंध लगा दिए।
इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान की तेल आय को कम करना और उसके परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाना था।
क्या आगे और बड़े फैसले हो सकते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के पास अब सीमित विकल्प बचे हैं। अगर हालात नहीं सुधरते हैं, तो उसे या तो पूरी तरह प्रतिबंध हटाने पड़ सकते हैं या फिर और सख्त कदम उठाने होंगे।
साथ ही यह भी जरूरी है कि Strait of Hormuz को दोबारा सुरक्षित और चालू किया जाए, क्योंकि इसके बिना वैश्विक सप्लाई चेन सामान्य नहीं हो पाएगी।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत के लिए यह स्थिति बेहद अहम है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल आयात करता है।
अगर बाजार में अतिरिक्त तेल आता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है। इससे आम लोगों और उद्योगों को कुछ राहत मिल सकती है।
हालांकि अगर जंग लंबी चलती है और सप्लाई बाधित रहती है, तो कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं।
निष्कर्ष:
अमेरिका द्वारा ईरानी तेल पर दी गई यह अस्थायी छूट एक तरह से संकट को संभालने की कोशिश है। इससे बाजार को थोड़ी राहत मिल सकती है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है।
असल चुनौती तब खत्म होगी, जब मिडिल-ईस्ट में तनाव कम होगा और सप्लाई रूट पूरी तरह सुरक्षित हो जाएंगे।

