50 साल बाद जापान का बड़ा U-Turn! अब बेचेगा घातक हथियार -7 अरब डॉलर की डील से क्यों बढ़ी हलचल?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से शांति और संयम की नीति अपनाने वाला Japan अब एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ गया है। प्रधानमंत्री Sanae Takaichi की सरकार ने दशकों पुरानी उस पाबंदी को हटाने का फैसला किया है, जिसके तहत देश घातक हथियारों का निर्यात नहीं कर सकता था। इस फैसले के बाद अब जापान फाइटर जेट, मिसाइल और युद्धपोत जैसे हथियार अन्य देशों को बेच सकेगा।
यह बदलाव केवल एक नीति में ढील नहीं है, बल्कि जापान की सुरक्षा सोच और वैश्विक भूमिका में बड़े परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है।

Japan makes a major U-turn after 50 years

क्या बदला नई नीति में
सरकार के फैसले के अनुसार, अब जापान अपने रक्षा उपकरणों का निर्यात उन देशों को कर सकेगा, जो संयुक्त राष्ट्र के नियमों के अनुसार उनका इस्तेमाल करने का वादा करेंगे।

प्रधानमंत्री Sanae Takaichi ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए कहा कि अब सभी प्रकार के रक्षा उपकरणों का ट्रांसफर संभव होगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हथियार केवल जिम्मेदार देशों को ही दिए जाएंगे।

 

पहले क्या थी स्थिति

1976 में जापान ने एक सख्त नीति लागू की थी, जिसके तहत घातक हथियारों के निर्यात पर लगभग पूरी तरह रोक थी। उस समय देश केवल गैर-घातक सैन्य उपकरण जैसे निगरानी प्रणाली और माइन हटाने वाले उपकरण ही दूसरे देशों को दे सकता था।

यह नीति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने जापान के संविधान के अनुरूप थी, जिसमें युद्ध से दूर रहने और केवल आत्मरक्षा तक सीमित रहने की बात कही गई थी।

संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत जापान ने युद्ध न करने और सेना को सीमित रखने का वादा किया था। इसी कारण उसने अपनी सेना का नाम भी “सेल्फ डिफेंस फोर्स” रखा।

 

धीरे-धीरे बदलाव की शुरुआत

हालांकि 2014 में इस नीति में कुछ ढील दी गई थी, लेकिन तब भी कड़े नियम लागू थे। अब जो नया फैसला लिया गया है, वह पहले के मुकाबले काफी बड़ा और व्यापक बदलाव है।

इससे यह साफ हो गया है कि जापान अब अपनी भूमिका को सिर्फ एक शांतिवादी देश तक सीमित नहीं रखना चाहता।

 

किन देशों को मिलेगा फायदा

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस फैसले के बाद कम से कम 17 देश जापान से हथियार खरीद सकते हैं। इसमें Australia, New Zealand, Philippines और Indonesia जैसे देश शामिल हैं।

अगर भविष्य में और देश जापान के साथ समझौते करते हैं, तो यह सूची और भी लंबी हो सकती है।

हालांकि जापान ने यह भी साफ किया है कि वह उन देशों को हथियार नहीं बेचेगा, जहां पहले से युद्ध चल रहा है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी विशेष परिस्थितियों में कुछ अपवाद हो सकते हैं।

 

ऑस्ट्रेलिया के साथ बड़ा समझौता

इस नई नीति के तहत जापान ने Australia के साथ एक बड़ा रक्षा समझौता भी किया है। करीब 7 अरब डॉलर के इस सौदे के तहत जापानी कंपनी Mitsubishi Heavy Industries ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए 11 युद्धपोतों में से पहले 3 जहाज बनाएगी।

इस समझौते पर दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों – Richard Marles और Shinjiro Koizumi – ने मेलबर्न में हस्ताक्षर किए।

 

बदलते हालात का असर

जापान के इस फैसले के पीछे बदलता वैश्विक माहौल एक बड़ी वजह है। खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में China की बढ़ती ताकत, North Korea के मिसाइल परीक्षण और Russia-Ukraine War जैसे घटनाक्रम ने जापान को अपनी नीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है।

अब जापान चाहता है कि वह क्षेत्रीय सुरक्षा में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाए और अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करे।

 

रक्षा उद्योग को मिलेगा बड़ा मौका

इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा जापान के रक्षा उद्योग को होने वाला है। लंबे समय तक निर्यात पर रोक रहने के कारण जापानी कंपनियां केवल घरेलू बाजार तक सीमित थीं। इससे उनकी वृद्धि भी सीमित रही।

अब जब वैश्विक बाजार खुल गया है, तो इन कंपनियों को नए ग्राहक मिलेंगे और उनका उत्पादन बढ़ेगा।

इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। साथ ही, छोटे सप्लायर और अन्य कंपनियां भी इस इकोसिस्टम का हिस्सा बनेंगी।

 

विवाद भी बढ़े

इस फैसले के साथ कुछ विवाद भी सामने आए हैं। खबरों के मुताबिक, प्रधानमंत्री Sanae Takaichi ने टोक्यो स्थित Yasukuni Shrine को एक धार्मिक भेंट भी भेजी।

यह मंदिर जापान के युद्ध में मारे गए लोगों की याद में बनाया गया है, लेकिन इसमें कई ऐसे युद्ध अपराधियों के नाम भी शामिल हैं जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दोषी ठहराया गया था।

इसी वजह से China और South Korea जैसे देशों में इस तरह की गतिविधियों को लेकर संवेदनशीलता बनी रहती है।

 

चीन की प्रतिक्रिया

जापान के इस फैसले पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। चीन के विदेश मंत्रालय ने इसे “लापरवाह सैन्यीकरण” करार दिया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर नजर बनाए रखेगा।

चीन का मानना है कि इस तरह के कदम क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और तनाव बढ़ा सकते हैं।

 

आगे क्या संकेत

जापान का यह कदम दिखाता है कि वह अब केवल एक शांतिवादी देश के रूप में नहीं रहना चाहता, बल्कि सुरक्षा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है।

यह बदलाव आने वाले समय में एशिया और दुनिया की राजनीति पर असर डाल सकता है।

जहां एक तरफ सहयोगी देशों को इससे फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ कुछ देशों में चिंता भी बढ़ सकती है।

 

निष्कर्ष:

कुल मिलाकर, जापान का यह फैसला उसकी विदेश और रक्षा नीति में एक बड़ा मोड़ है। इससे न केवल उसकी सैन्य ताकत बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका भी बदल सकती है।

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