तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से एक तय ढर्रे पर चलती रही है – दो बड़े दल, एक जैसा चुनावी पैटर्न और लगभग तय नतीजे। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव ने इस पूरी कहानी को उलट दिया है। इस बदलाव के केंद्र में हैं थलापति विजय, जिन्होंने राजनीति में कदम रखते ही ऐसा माहौल बनाया कि दशकों पुराना समीकरण हिल गया।
फरवरी 2026 में वेल्लोर की एक रैली में विजय ने कहा था – “ये चुनाव विजय Vs स्टालिन की लड़ाई है।” उस वक्त इसे एक आक्रामक चुनावी लाइन माना गया, लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह लाइन हकीकत में बदल गई। उनकी रैलियों में उमड़ती भीड़, सड़कों पर जाम और लोगों की भावनात्मक प्रतिक्रिया ने साफ संकेत दे दिया था कि कुछ बड़ा होने वाला है।

नतीजे जो कहानी बदल गए
4 मई को आए चुनाव परिणामों ने सबको चौंका दिया। विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वहीं DMK 59 और AIADMK 47 सीटों पर सिमट गई।

बहुमत का आंकड़ा 118 है, यानी विजय सिर्फ 10 सीट दूर हैं। यह दूरी छोटी है, लेकिन राजनीतिक रूप से बहुत मायने रखती है। पहली बार ऐसा हुआ है जब कोई नया दल सीधे सत्ता के दरवाजे पर खड़ा है।
60 साल पुरानी राजनीति में दरार
1967 के बाद से तमिलनाडु में सत्ता लगभग एक ही दायरे में घूमती रही – DMK और AIADMK। दोनों पार्टियों ने बारी-बारी से सरकार बनाई और एक मजबूत राजनीतिक ढांचा तैयार किया।
लेकिन इस बार लोगों ने उस ढांचे से बाहर निकलकर वोट दिया। यह सिर्फ एंटी-इंकंबेंसी नहीं थी, बल्कि एक “नई पसंद” की तलाश थी। पहले भी नए विकल्प सामने आए – रजनीकांत ने कोशिश की, कमल हासन ने पार्टी बनाई – लेकिन वे उस स्तर तक असर नहीं छोड़ पाए।
विजय ने वही खाली जगह भरी, लेकिन अलग तरीके से।
- चेहरा ही चुनाव बन गया
इस चुनाव में सबसे अलग बात यह रही कि मुद्दों से ज्यादा एक व्यक्ति चर्चा में रहा। विजय का नाम ही उनकी पार्टी की पहचान बन गया।
चेन्नई के एक युवा वोटर, जो पहले एम.के. स्टालिन के समर्थक थे, उन्होंने आखिरी समय में अपना फैसला बदला। वजह कोई बड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि “बदलाव की उम्मीद” थी।
ऐसे हजारों-लाखों वोटर थे, जिन्होंने अंतिम दिनों में अपना मन बदला।
विजय की रैलियों का माहौल किसी राजनीतिक सभा जैसा कम और किसी बड़े फिल्म इवेंट जैसा ज्यादा दिखता था। लोग घंटों इंतजार करते, सिर्फ एक बार उन्हें देखने के लिए। कई लोग भावुक हो जाते, कुछ रो पड़ते – यह राजनीति में कम ही देखने को मिलता है।
यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि भीड़ का बड़ा हिस्सा उनके घोषणापत्र या नीतियों से पूरी तरह वाकिफ नहीं था। लेकिन फिर भी वे उन्हें नेता के तौर पर स्वीकार करने को तैयार थे।
इसका मतलब साफ है – इस चुनाव में “विश्वास” ने “विचारधारा” को पीछे छोड़ दिया।
- सही समय पर लिया गया बड़ा फैसला
विजय का राजनीति में आना अचानक जरूर लगा, लेकिन यह फैसला बहुत सोच-समझकर लिया गया था।
उनका फिल्मी करियर उस समय अपने शिखर पर था। उनकी फिल्में लगातार बड़ी कमाई कर रही थीं और उनकी लोकप्रियता चरम पर थी।
ऐसे समय में राजनीति में आना जोखिम भरा भी था और प्रभावी भी।
यहां उनका तरीका अलग था। जहां पहले के कई स्टार्स ने करियर ढलने के बाद राजनीति का रास्ता चुना, विजय ने अपने “पीक” को ही राजनीतिक ताकत में बदला।
तमिलनाडु में पहले भी एम.जी. रामचंद्रन जैसे नेता फिल्मों से राजनीति में आए और सफल हुए। विजय ने उसी मॉडल को नए दौर में ढाल दिया।
- जमीनी नेटवर्क जो पहले से तैयार था
विजय की सफलता का सबसे मजबूत आधार उनका संगठन है, जो उन्होंने धीरे-धीरे तैयार किया।
उनका फैन क्लब सिर्फ फैन क्लब नहीं रहा। यह एक तरह का सामाजिक नेटवर्क बन गया, जो पूरे राज्य में फैला हुआ था।
इस नेटवर्क के लोग सालों से सामाजिक काम करते रहे – खून दान शिविर, मेडिकल मदद, जरूरतमंदों की सहायता।
इससे लोगों के बीच एक भरोसा बना कि यह सिर्फ फिल्मी लोकप्रियता नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ा हुआ सिस्टम है।
जब उन्होंने पार्टी बनाई, तो उन्हें नए कार्यकर्ता खोजने की जरूरत नहीं पड़ी। उनके पास पहले से तैयार टीम थी – राज्य स्तर से लेकर बूथ स्तर तक।
2021 के स्थानीय चुनावों में इस नेटवर्क की ताकत दिख भी चुकी थी, जब इससे जुड़े उम्मीदवारों ने अच्छा प्रदर्शन किया।
यानी यह जीत अचानक नहीं आई, बल्कि लंबे समय की तैयारी का परिणाम है।
- रणनीति में लचीलापन
चुनाव प्रचार के दौरान विजय का फोकस साफ था – सीधा हमला DMK पर।
हालांकि AIADMK और BJP को लेकर उनका रवैया उतना आक्रामक नहीं दिखा। इससे यह संकेत मिला कि वे भविष्य के लिए विकल्प खुले रखना चाहते हैं।
राजनीति में यह लचीलापन कई बार निर्णायक साबित होता है, खासकर तब जब कोई नई पार्टी सत्ता के करीब पहुंच रही हो।
बदलाव की शुरुआत या सिर्फ एक लहर?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है – क्या यह बदलाव स्थायी है?
क्या विजय की लोकप्रियता आने वाले वर्षों में भी इसी तरह बनी रहेगी, या यह सिर्फ एक चुनावी लहर थी?
तमिलनाडु की राजनीति में यह एक नया अध्याय जरूर है, लेकिन इसकी दिशा अभी तय नहीं है।
एक तरफ दशकों पुराना अनुभव और मजबूत संगठन वाले दल हैं, तो दूसरी तरफ एक नई ऊर्जा, नया चेहरा और जनता की उम्मीदें।
अब देखना यह होगा कि यह “विजय फैक्टर” सिर्फ सत्ता तक पहुंचता है, या वहां टिककर एक नया राजनीतिक दौर भी शुरू करता है?
5. अल्पसंख्यक वोटों में सेंध – खेल यहीं पलटा
तमिलनाडु में मुस्लिम और ईसाई समुदाय मिलाकर लगभग 12% वोटर हैं। लंबे समय से यह वोट बैंक DMK के साथ माना जाता रहा है।
लेकिन इस बार तस्वीर बदलती दिखी।
चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने पहली बार अपने पूरे नाम – “जोसेफ विजय” – का जिक्र किया और यह भी स्पष्ट किया कि वे ईसाई हैं। यह एक सीधा संदेश था, जो अल्पसंख्यक समुदाय तक गया।
इसका असर खासकर शहरी इलाकों में दिखा, जहां ये समुदाय ज्यादा संख्या में रहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय ने DMK के पारंपरिक वोट बैंक में अच्छी-खासी सेंध लगाई। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने DMK के करीब 13-14% और AIADMK के लगभग 10% वोट अपनी तरफ खींचे।
यानी जो वोट पहले दो पार्टियों में बंटे थे, उनका एक बड़ा हिस्सा अब सीधे TVK के खाते में चला गया।
दक्षिण तमिलनाडु, जहां मुस्लिम और ईसाई आबादी ज्यादा है, वहां मुकाबला सीधे TVK और DMK के बीच सिमट गया। यही वह इलाका था, जहां चुनाव का रुख बदलता नजर आया।
6. युवाओं और महिलाओं का झुकाव – निर्णायक फैक्टर
अगर इस चुनाव का सबसे मजबूत आधार खोजा जाए, तो वह युवा और महिला वोटर्स हैं।
तमिलनाडु में एक पूरी पीढ़ी ऐसी है, जो विजय की फिल्में देखकर बड़ी हुई है। उनके लिए विजय सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक “रोल मॉडल” हैं।
18 से 25 साल के नए वोटर्स और दूसरी बार वोट देने वाले युवाओं में उनका खासा असर दिखा।
महिलाओं के बीच भी उनकी लोकप्रियता अलग स्तर की रही। इसका कारण सिर्फ उनकी छवि नहीं, बल्कि उनके वादे भी रहे –
- ग्रेजुएशन पास स्टूडेंट्स को 4 हजार रुपए बेरोजगारी भत्ता
- 5 लाख युवाओं को इंटर्नशिप, 5 साल में 5 लाख सरकारी नौकरी, 25 लाख रुपए लोन
इन वादों ने सीधे उस वर्ग को टारगेट किया, जो अक्सर चुनावों में निर्णायक होता है लेकिन हर बार केंद्र में नहीं रहता।
विजय ने जाति आधारित राजनीति से दूरी बनाकर इन दो बड़े वर्गों – युवा और महिला – पर फोकस किया।
यही वजह रही कि करीब 20-25% वोट पर उनका सीधा असर माना जा रहा है।
7. वादों की रणनीति – सीधा असर, आसान भाषा
विजय का घोषणापत्र जटिल नहीं था। उसमें ऐसे वादे थे, जो सीधे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े थे।
जैसे –
- महिलाओं को 2500 रुपए शादी के वक्त 8 ग्राम सोना
- महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए, बुजुर्ग और दिव्यांगों को 3 हजार रुपए महीने पेंशन
- शादी के वक्त लड़कियों को सरकार की तरफ से 8 ग्राम सोना और रेशमी साड़ी
- भूमिहीनों को मुफ्त में जमीन का पट्टा, गरीबों को सरकारी जमीन पर पट्टा
इन वादों में एक समान बात थी – सरलता। न कोई भारी-भरकम शब्द, न जटिल योजनाएं। यही वजह रही कि आम वोटर तक संदेश आसानी से पहुंचा।
इसके साथ ही उन्होंने NEET परीक्षा के विरोध और शराब के खिलाफ सख्त रुख जैसे मुद्दों को भी उठाया, जो युवाओं और महिलाओं दोनों के लिए अहम थे।
8. क्षेत्रवार प्रदर्शन – कहां किसकी पकड़
अगर पूरे राज्य को हिस्सों में बांटकर देखा जाए, तो चुनाव का पैटर्न और साफ हो जाता है –
उत्तर तमिलनाडु: चेन्नई, चेंगलपट्टू, कांचीपुरम जैसे इलाकों में TVK ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। यह इलाका पूरी तरह विजय के रंग में रंगा नजर आया।
पश्चिमी क्षेत्र: कोयंबटूर, इरोड और सलेम में AIADMK ने अपनी पकड़ बनाए रखी। यहां उनका पारंपरिक आधार अभी भी मजबूत है।
केंद्रीय और तटीय इलाका: त्रिची और तंजावुर जैसे क्षेत्रों में DMK का असर बना रहा। खासकर किसानों के बीच उनकी पकड़ कमजोर नहीं पड़ी।
दक्षिण तमिलनाडु: यहां मुकाबला सबसे दिलचस्प रहा। अल्पसंख्यक वोटर्स के कारण TVK और DMK के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली।
इस क्षेत्रीय बंटवारे से साफ है कि विजय की जीत पूरे राज्य में एक जैसी नहीं थी, लेकिन जहां भी उन्हें समर्थन मिला, वह निर्णायक साबित हुआ।
अब आगे क्या – सत्ता या संतुलन?
अब सबसे अहम सवाल है – सरकार कैसे बनेगी? विजय के पास 108 सीटें हैं, और उन्हें 10 सीटों की जरूरत है।
ऐसे में दो रास्ते सामने हैं –
- AIADMK अगर समर्थन दे, तो सरकार आसानी से बन सकती है
- या फिर कांग्रेस, वाम दल और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां मिलकर समर्थन दें
दोनों ही स्थिति में विजय की भूमिका केंद्र में रहेगी।
