तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय के शपथ ग्रहण समारोह के बाद एक बार फिर ‘वंदे मातरम्’ चर्चा के केंद्र में आ गया है। समारोह में सबसे पहले ‘वंदे मातरम्’, फिर ‘जन गण मन’ और उसके बाद तमिलनाडु का राज्य गीत ‘तमिल थाई वाजथु’ बजाया गया। इसी क्रम को लेकर डीएमके और उसके सहयोगी दलों ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि राज्य के सम्मान में तमिल राज्य गीत सबसे पहले होना चाहिए था।
इस विवाद के बीच ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक पुरानी बहस भी फिर सामने आ गई है। आखिर यह गीत कब लिखा गया था? इसे राष्ट्रगीत का दर्जा कैसे मिला? इसके कुछ हिस्से क्यों हटाए गए? और क्या इस गीत को लेकर पहले भी राजनीतिक और धार्मिक विवाद होते रहे हैं?
इन सवालों के जवाब भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान और राजनीति के लंबे इतिहास से जुड़े हुए हैं।
‘वंदे मातरम्’ की शुरुआत कैसे हुई?
‘वंदे मातरम्’ की रचना प्रसिद्ध लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। माना जाता है कि उन्होंने यह गीत 7 नवंबर 1875 को लिखा था। बाद में इसे 1882 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया।
यह गीत संस्कृत और बंगाली शब्दों का मिश्रण है। ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ होता है- “हे मातृभूमि, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं।”
उस समय भारत अंग्रेजों के शासन में था और देशभर में राष्ट्रवाद की भावना धीरे-धीरे मजबूत हो रही थी। ऐसे दौर में यह गीत लोगों के भीतर देशभक्ति का प्रतीक बन गया।
आजादी की लड़ाई में कैसे बना आंदोलन का नारा?
1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तब पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। उसी दौर में ‘वंदे मातरम्’ आंदोलन का प्रमुख नारा बन गया। छात्र, युवा और स्वतंत्रता सेनानी इस गीत को गाते हुए जुलूस निकालते थे।
ब्रिटिश सरकार इस गीत से इतनी परेशान हो गई थी कि कई जगह इसे सार्वजनिक रूप से गाने पर रोक लगाने की कोशिश की गई। लेकिन इसका असर उल्टा हुआ और यह गीत लोगों के बीच और लोकप्रिय हो गया।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार सार्वजनिक मंच से यह गीत गाया गया था। इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। उस समय हजारों लोग सभा में मौजूद थे और यह प्रस्तुति काफी भावुक मानी जाती है।
‘वंदे मातरम्’ और धार्मिक विवाद की शुरुआत
समय के साथ यह गीत राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बन गया, लेकिन 1930 के दशक में इसके कुछ हिस्सों को लेकर विवाद शुरू हुआ। खासतौर पर मुस्लिम संगठनों ने कहा कि गीत में भारत माता को देवी के रूप में दिखाया गया है, जिससे उन्हें आपत्ति है।
असल में ‘आनंदमठ’ उपन्यास में यह गीत एक धार्मिक और सांस्कृतिक माहौल के बीच आता है। गीत के बाद के हिस्सों में मां दुर्गा जैसी छवियों का उल्लेख मिलता है। कुछ लोगों का मानना था कि यह धार्मिक प्रतीकों से जुड़ा होने के कारण सभी समुदायों के लिए सहज नहीं है।
यहीं से बहस शुरू हुई कि क्या पूरे गीत को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जा सकता है।
आखिर चार छंद क्यों हटाए गए?
मूल ‘वंदे मातरम्’ में कुल छह छंद थे। लेकिन आज आमतौर पर सिर्फ शुरुआती दो छंद ही गाए जाते हैं।
1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। उस समय देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था और कांग्रेस नहीं चाहती थी कि राष्ट्रीय आंदोलन किसी धार्मिक विवाद में फंस जाए।
उस बैठक में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और कई अन्य बड़े नेता मौजूद थे।
फैसला लिया गया कि केवल शुरुआती दो छंदों को ही सार्वजनिक और आधिकारिक उपयोग के लिए रखा जाएगा। वजह यह थी कि शुरुआती हिस्से में मातृभूमि की सुंदरता और प्रकृति का वर्णन है, जबकि बाद के छंदों में देवी स्वरूप की बात आती है।
इस फैसले के बाद राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो छंदों का इस्तेमाल शुरू हुआ।

नेहरू और टैगोर की क्या राय थी?
उस समय जवाहरलाल नेहरू ने भी माना था कि गीत की भाषा कई लोगों के लिए कठिन है और इसके कुछ हिस्सों से विवाद पैदा हो सकता है।
बताया जाता है कि उन्होंने इस मुद्दे पर रवींद्रनाथ टैगोर से भी राय ली थी। टैगोर का मानना था कि गीत के शुरुआती हिस्से बेहद सुंदर और राष्ट्रीय भावना से भरे हुए हैं, लेकिन पूरे गीत को हर जगह गाना जरूरी नहीं है।
इसी सोच के बाद बाद के चार छंद धीरे-धीरे सार्वजनिक कार्यक्रमों से हट गए।
राष्ट्रगीत बना, लेकिन राष्ट्रगान क्यों नहीं?
आजादी के बाद संविधान सभा के सामने बड़ा सवाल था कि देश का राष्ट्रगान कौन होगा। उस समय दो प्रमुख विकल्प थे- ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’।
‘वंदे मातरम्’ का स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान था। लेकिन कुछ सदस्यों को लगा कि इसकी भाषा और धुन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बजाने के लिए उतनी आसान नहीं है।
दूसरी ओर ‘जन गण मन’ की धुन अधिक सरल और औपचारिक मानी गई। आखिरकार 24 जनवरी 1950 को फैसला लिया गया कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का सम्मान दिया जाएगा।
संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ का स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक योगदान रहा है और उसे समान सम्मान मिलेगा।
हाल के वर्षों में क्यों बढ़ा विवाद?
पिछले कुछ वर्षों में ‘वंदे मातरम्’ फिर राजनीति का बड़ा मुद्दा बना है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में इसे राष्ट्रवाद और बंगाली अस्मिता से जोड़कर पेश किया गया।
केंद्र सरकार ने इसके 150 साल पूरे होने पर कई कार्यक्रम आयोजित किए। संसद के दोनों सदनों में भी इसके सभी छंदों का पाठ किया गया। इसके अलावा गणतंत्र दिवस परेड में ‘वंदे मातरम्’ थीम पर झांकी भी निकाली गई।
हाल ही में केंद्र ने इसके लिए नई गाइडलाइन भी जारी की हैं। सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ बजाने को लेकर प्रोटोकॉल तय किया गया है। कई आयोजनों में इसके दौरान खड़े होकर सम्मान देने की बात भी कही गई है।
तमिलनाडु विवाद क्यों खास बन गया?
तमिलनाडु में विवाद इसलिए ज्यादा बढ़ा क्योंकि वहां ‘तमिल थाई वाजथु’ को राज्य की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है। परंपरा के अनुसार सरकारी कार्यक्रमों में इसे पहले गाया जाता रहा है।
लेकिन मुख्यमंत्री विजय के शपथ ग्रहण समारोह में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ पहले बजाए गए। इसके बाद डीएमके और उसके सहयोगी दलों ने आरोप लगाया कि राज्य की परंपरा को नजरअंदाज किया गया।
हालांकि विजय की पार्टी TVK ने सफाई दी कि कार्यक्रम का क्रम राज्यपाल कार्यालय ने तय किया था।
क्या ‘वंदे मातरम्’ का अपमान करने पर सजा हो सकती है?
हाल ही में केंद्र सरकार ने संकेत दिए हैं कि ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कानूनी प्रावधान और सख्त किए जा सकते हैं। प्रस्ताव है कि जिस तरह राष्ट्रगान के अपमान पर कार्रवाई होती है, उसी तरह ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भी नियम लागू किए जाएं।
इसके अलावा स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी आयोजनों में इसके गायन को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है।
क्या आज भी पूरा गीत गाया जाता है?
आम तौर पर आज केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाते हैं। यही आधिकारिक और सबसे ज्यादा प्रचलित हिस्सा माना जाता है। पूरा छह छंद वाला गीत बहुत कम अवसरों पर सुनने को मिलता है।
हालांकि साहित्य और इतिहास के जानकार मानते हैं कि पूरा गीत अपने समय की राजनीतिक और सांस्कृतिक सोच को दिखाता है। वहीं सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाला हिस्सा राष्ट्रीय एकता और मातृभूमि के सम्मान पर केंद्रित है।
इतिहास से राजनीति तक बना हुआ है असर
‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी पहचान में से एक रहा है। इसने लाखों लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा दी। लेकिन समय के साथ यह गीत राजनीति, धर्म और पहचान की बहसों के बीच भी आ गया।
आज भी जब यह गीत बजता है तो कई लोगों के लिए यह देशभक्ति का प्रतीक होता है, जबकि कुछ लोग इसके ऐतिहासिक विवादों की चर्चा करते हैं। यही वजह है कि 150 साल बाद भी ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत के इतिहास और राजनीति का अहम हिस्सा बना हुआ है।

