अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर पश्चिम एशिया की राजनीति को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रम्प ने कई मुस्लिम देशों से कहा है कि अब समय आ गया है कि वे इजराइल के साथ अपने रिश्ते सामान्य करें और अब्राहम समझौते में शामिल हों। इस मुद्दे पर उन्होंने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन के नेताओं के साथ वर्चुअल बातचीत भी की।
ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए कहा कि अमेरिका ने ईरान संकट को कम करने के लिए काफी कोशिशें की हैं। अब क्षेत्र में स्थिरता और आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा देश अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनें। उनका कहना था कि अगर मुस्लिम देश इजराइल के साथ रिश्ते सुधारते हैं तो इससे पूरे पश्चिम एशिया में नई आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था बन सकती है।
हालांकि ट्रम्प की इस अपील के बाद सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान और सऊदी अरब के रुख को लेकर हो रही है। दोनों देशों ने साफ संकेत दिए हैं कि फिलिस्तीन मुद्दे का हल निकले बिना वे इजराइल के साथ औपचारिक संबंध बनाने के पक्ष में नहीं हैं।

क्या है अब्राहम समझौता?
अब्राहम अकॉर्ड्स की शुरुआत ट्रम्प के पहले कार्यकाल में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य इजराइल और अरब देशों के बीच दशकों पुराने तनाव को खत्म करके सामान्य रिश्ते स्थापित करना था।
13 अगस्त 2020 को इसकी घोषणा हुई और 15 सितंबर 2020 को अमेरिका की मध्यस्थता में इजराइल, UAE और बहरीन ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस प्रक्रिया में शामिल हुए। हाल के वर्षों में कुछ अन्य देशों ने भी सीमित स्तर पर इसमें रुचि दिखाई।

इस समझौते के तहत देशों के बीच व्यापार, पर्यटन, रक्षा, तकनीक और निवेश सहयोग बढ़ाने की कोशिश की जाती है। ट्रम्प इसे अपनी सबसे बड़ी विदेश नीति उपलब्धियों में गिनते हैं।
उनका दावा है कि इससे पश्चिम एशिया में आर्थिक विकास, निवेश और सुरक्षा सहयोग को नई दिशा मिली है। ट्रम्प ने यहां तक कहा कि यह समझौता 5000 साल में पहली बार इस क्षेत्र को “वास्तविक स्थिरता और ताकत” दे सकता है।
ट्रम्प की मीटिंग में छाई चुप्पी
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प ने हाल ही में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, कतर के अमीर तमिम बिन हमद अल थानी, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी समेत कई नेताओं से बातचीत की।
बताया जा रहा है कि जब ट्रम्प ने इन देशों से इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की अपील की, तो कुछ देर के लिए बातचीत में सन्नाटा छा गया। खासकर पाकिस्तान, सऊदी अरब और कतर की तरफ से तुरंत कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक माहौल इतना शांत हो गया था कि ट्रम्प ने मजाक में पूछा, “क्या आप लोग अभी भी लाइन पर हैं?”
इसके बाद ट्रम्प ने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इन देशों को अब्राहम समझौते से जोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
पाकिस्तान ने साफ किया अपना रुख
Pakistan ने ट्रम्प की अपील के बाद लगभग साफ कर दिया है कि वह फिलहाल अब्राहम समझौते में शामिल होने के पक्ष में नहीं है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने कहा कि इस्लामाबाद किसी ऐसे समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा जो देश की “मौलिक विचारधारा” के खिलाफ हो।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से फिलिस्तीन का समर्थन करता आया है और इजराइल को मान्यता देने का सवाल फिलहाल स्वीकार्य नहीं है। आसिफ ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर इजराइल का नाम तक नहीं लिखा जाता, जो उसके आधिकारिक रुख को दिखाता है।
पाकिस्तान में फिलिस्तीन मुद्दा केवल विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि धार्मिक और भावनात्मक मामला भी माना जाता है। वहां आम जनता के बीच फिलिस्तीन के समर्थन को लेकर गहरी भावना मौजूद है। ऐसे में इजराइल को मान्यता देना किसी भी सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम बन सकता है।
जिन्ना की सोच का भी असर
पाकिस्तान की राजनीति में यह धारणा काफी मजबूत है कि इजराइल को मान्यता देना देश की स्थापना के मूल विचारों के खिलाफ होगा।
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इजराइल के गठन का विरोध किया था। पाकिस्तान में आज भी कई राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन उसी सोच को आगे बढ़ाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अक्सर फिलिस्तीन और कश्मीर मुद्दे को एक-दूसरे से जोड़कर देखता है। इसलिए अगर वह फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपना रुख बदलता है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को लेकर उसका नैतिक तर्क कमजोर पड़ सकता है।
इमरान खान भी कर चुके हैं विरोध
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी अपने कार्यकाल में अब्राहम समझौते में शामिल होने से इनकार किया था।
उन्होंने दावा किया था कि उनकी सरकार पर अमेरिका और कुछ “मित्र देशों” की तरफ से इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने का दबाव डाला गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया।
बाद में सत्ता से हटने के बाद इमरान खान ने आरोप लगाया कि नई सरकार को इजराइल के साथ संबंध बनाने के लिए तैयार किया जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया था।
सऊदी अरब ने भी बनाई दूरी
सऊदी अरब ने भी ट्रम्प की अपील पर सावधानी भरा रुख अपनाया है। सऊदी अरब पहले भी साफ कर चुका है कि वह तभी इजराइल के साथ औपचारिक संबंध बनाएगा जब फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की दिशा में स्पष्ट कदम उठेंगे।
दरअसल गाजा युद्ध के बाद अरब देशों में इजराइल के खिलाफ गुस्सा काफी बढ़ा है। आम जनता के बीच फिलिस्तीन को लेकर समर्थन पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। ऐसे माहौल में किसी भी अरब सरकार के लिए इजराइल से खुले रिश्ते बनाना आसान नहीं माना जा रहा।
विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ समय पहले तक सऊदी अरब और इजराइल के बीच रिश्ते सामान्य होने की संभावना काफी बढ़ गई थी, लेकिन गाजा संघर्ष ने पूरी स्थिति बदल दी।
ट्रम्प की बड़ी रणनीति क्या है?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ट्रम्प पश्चिम एशिया में एक नया अमेरिकी समर्थक गठबंधन बनाना चाहते हैं। इसमें इजराइल और प्रमुख अरब देशों को एक साथ लाने की कोशिश हो रही है।
इस रणनीति के पीछे सबसे बड़ा कारण ईरान को संतुलित करना माना जा रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को लगता है कि अगर अरब देश और इजराइल एक मंच पर आते हैं, तो क्षेत्र में ईरान का प्रभाव सीमित किया जा सकता है।
इसी वजह से ट्रम्प ने यहां तक कहा कि अगर ईरान अमेरिका के साथ समझौता करता है, तो भविष्य में उसे भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनाया जा सकता है।
हालांकि यह बयान काफी विवादित माना जा रहा है क्योंकि Iran दशकों से इजराइल को मान्यता देने से इनकार करता आया है और उसने हमेशा उन अरब देशों की आलोचना की है जिन्होंने इजराइल से रिश्ते बनाए।
गाजा युद्ध ने बदली पूरी राजनीति
पश्चिम एशिया की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए गाजा युद्ध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
गाजा संघर्ष के बाद अरब देशों में इजराइल के खिलाफ गुस्सा बढ़ा है। फिलिस्तीन मुद्दा फिर से क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। ऐसे माहौल में किसी भी मुस्लिम देश के लिए इजराइल के साथ खुली साझेदारी करना बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
इतिहास भी यही दिखाता है। जब मुहम्मद अनवर एस-सआदत ने 1979 में इजराइल को मान्यता दी थी, तब उन्हें अरब दुनिया में भारी विरोध झेलना पड़ा था। कई देशों ने मिस्र का बहिष्कार किया और बाद में 1981 में उनकी हत्या कर दी गई।
पाकिस्तान के सामने सबसे मुश्किल स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस समय बेहद कठिन स्थिति में है। एक तरफ उसे अमेरिका के साथ रिश्ते भी बनाए रखने हैं, वहीं दूसरी तरफ घरेलू राजनीति और धार्मिक भावनाओं को भी संभालना है।
अगर पाकिस्तान इजराइल को मान्यता देता है, तो वहां भारी राजनीतिक विवाद खड़ा हो सकता है। विपक्षी दल इसे बड़ा मुद्दा बना सकते हैं।
इसी वजह से पाकिस्तान फिलहाल बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रहा है। हालांकि हाल के महीनों में उसने कुछ अमेरिकी पहलों में सीमित सहयोग जरूर दिखाया है, लेकिन वह लगातार यह साफ कर रहा है कि उसका अब्राहम समझौते से कोई संबंध नहीं है।
अब आगे क्या?
ट्रम्प की कोशिशों से यह साफ है कि अमेरिका पश्चिम एशिया में नई रणनीतिक व्यवस्था बनाना चाहता है। लेकिन जमीन पर हालात काफी जटिल हैं।
फिलिस्तीन मुद्दा अब भी अरब राजनीति का सबसे संवेदनशील विषय बना हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान, सऊदी अरब और दूसरे मुस्लिम देशों के लिए इजराइल के साथ औपचारिक संबंध बनाना आसान फैसला नहीं होगा।
फिलहाल इतना जरूर साफ दिख रहा है कि ट्रम्प आने वाले समय में इस मुद्दे को और जोर से उठाने वाले हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पश्चिम एशिया की राजनीति केवल कूटनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं, ऐतिहासिक विवादों और क्षेत्रीय संघर्षों से भी तय होती है।
