गिर में 8 शेरों की मौत से बढ़ी चिंता! क्या फिर लौट रहा है खतरनाक बेबेसिया वायरस?

गुजरात के मशहूर गिर जंगल से एक बार फिर चिंताजनक खबर सामने आई है। पिछले दो दिनों के भीतर 8 शेरों की मौत ने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। इनमें 5 शावक भी शामिल हैं। शुरुआती जांच में दो शावकों की मौत का कारण संदिग्ध बेबेसिया संक्रमण माना जा रहा है, जबकि बाकी शेरों की मौत अलग-अलग कारणों से हुई बताई जा रही है।

राज्य सरकार ने हालांकि साफ किया है कि फिलहाल गिर में किसी बड़े संक्रमण या महामारी जैसी स्थिति नहीं है। वन विभाग लगातार निगरानी कर रहा है और कई शेरों को अलग रखकर उनकी जांच की जा रही है।

 

गिर जंगल में अचानक बढ़ीं मौतें

वन मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने जानकारी देते हुए कहा कि गिर जंगल के अलग-अलग इलाकों में बीते दो दिनों के दौरान 8 शेरों की मौत हुई। इनमें 5 शावक और 3 बड़े शेर शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि दो शावकों में बेबेसिया संक्रमण के लक्षण पाए गए हैं। बाकी तीन शावकों की मौत कमजोरी और अन्य प्राकृतिक कारणों से हुई है। वहीं दो वयस्क शेरों की मौत सामान्य कारणों से हुई, जबकि एक शेर की जान आपसी लड़ाई में चली गई।

सरकार का कहना है कि फिलहाल घबराने जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन एहतियात के तौर पर निगरानी तेज कर दी गई है।

 

17 शेरों को अलग रखकर निगरानी

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार गिर क्षेत्र में कई शेरों की मेडिकल जांच की जा रही है। करीब 17 शेरों को अलग रखकर उनकी निगरानी की जा रही है ताकि बीमारी फैलने की आशंका को रोका जा सके।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया और गांधीनगर में उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक में अधिकारियों ने बताया कि गिर गढ़ड़ा और बाबरिया इलाके के आसपास लगभग 10 किलोमीटर के दायरे में सभी शेरों पर खास नजर रखी जा रही है।

वन विभाग ने कहा कि अभी तक किसी बड़े स्तर पर बीमारी फैलने के संकेत नहीं मिले हैं। फिर भी सावधानी के तौर पर शेरों की लगातार जांच की जा रही है।

 

गर्मी के मौसम में बढ़ता है खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मियों की शुरुआत में किलनी और परजीवी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसी वजह से गिर क्षेत्र में 350 से ज्यादा शेरों पर विशेष स्वास्थ्य निगरानी रखी जा रही है।

वन विभाग शेरों के शरीर से किलनी हटाने, दवाइयां देने और मेडिकल टेस्ट कराने का काम कर रहा है। जूनागढ़ वेटरनरी कॉलेज के डॉक्टरों की टीम भी इस अभियान में शामिल हो चुकी है।

 

अलग-अलग इलाकों में हुईं मौतें

प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (वाइल्डलाइफ) जयपाल सिंह ने कहा कि ये घटनाएं गिर के अलग-अलग इलाकों में हुई हैं, इसलिए इसे किसी महामारी से जोड़ना सही नहीं होगा।

जानकारी के मुताबिक:

  • एक शावक की मौत लिलिया रेंज में हुई
  • एक शावक सावरकुंडला क्षेत्र में मिला
  • एक अन्य मौत सरसिया रेंज में हुई

अधिकारियों का कहना है कि दो शावकों की मौत कमजोरी की वजह से हुई, जबकि दो मामलों में संक्रमण की जांच जारी है।

 

शावकों की मृत्यु दर पहले से ज्यादा होती है

वन अधिकारियों ने बताया कि जंगल में जन्म लेने वाले शावकों में से लगभग आधे शावक बड़े होने से पहले ही मर जाते हैं। यह वन्य जीवन का सामान्य हिस्सा माना जाता है।

हालांकि गिर में लगातार निगरानी, ट्रैकिंग सिस्टम और बेहतर इलाज सुविधाओं की वजह से शेरों की मृत्यु दर पहले की तुलना में काफी कम हुई है। फिर भी लगातार मौतों ने वन विभाग को सतर्क कर दिया है।

deaths of eight lions in Gir have raised concerns

क्या है बेबेसिया वायरस?

बेबेसिया एक गंभीर परजीवी बीमारी है जो जानवरों और इंसानों दोनों को प्रभावित कर सकती है। यह बीमारी “बेबेसिया” नाम के सूक्ष्म परजीवी की वजह से होती है।

यह परजीवी शरीर में जाकर लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करता है और उन्हें नष्ट करने लगता है। इससे शरीर में खून की भारी कमी हो जाती है, जिसे एनीमिया कहा जाता है।

शेरों में यह बीमारी आमतौर पर किलनी यानी टिक के जरिए फैलती है। संक्रमित किलनी जब किसी जानवर को काटती है तो परजीवी उसके शरीर में पहुंच जाता है।

 

संक्रमण के लक्षण क्या हैं?

बेबेसिया संक्रमण होने पर जानवरों में कई तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं:

  • कमजोरी
  • तेज बुखार
  • सांस लेने में दिक्कत
  • खून की कमी
  • सुस्ती
  • नाक से पानी आना
  • लगातार खांसी

अगर समय पर इलाज न मिले तो यह संक्रमण जानलेवा भी साबित हो सकता है।

 

2018 में भी हुई थी शेरों की मौत

गिर जंगल में इससे पहले साल 2018 में भी शेरों की मौत ने चिंता बढ़ा दी थी। उस समय एक महीने के भीतर 11 शेरों की मौत हुई थी।

तब जांच में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस और प्रोटोजोआ संक्रमण का असर सामने आया था। उस घटना के बाद सरकार ने गिर में स्वास्थ्य निगरानी और मेडिकल सुविधाओं को मजबूत किया था।

अब एक बार फिर संक्रमण की आशंका सामने आने से पुराने खतरे की याद ताजा हो गई है।

 

गिर जंगल क्यों है खास?

गिर जंगल दुनिया में एशियाई शेरों का आखिरी प्राकृतिक घर माना जाता है। कभी एशियाई शेर भारत के कई हिस्सों में पाए जाते थे, लेकिन समय के साथ उनकी संख्या तेजी से घट गई।

आज गुजरात का गिर क्षेत्र ही वह जगह है जहां ये शेर प्राकृतिक रूप से रहते हैं। यही वजह है कि यहां शेरों की सुरक्षा को बेहद अहम माना जाता है।

 

891 तक पहुंची शेरों की संख्या

साल 2025 की गणना के मुताबिक गुजरात में एशियाई शेरों की संख्या बढ़कर 891 हो चुकी है।

साल 2020 में यह संख्या 674 थी। यानी पांच साल में शेरों की आबादी में बड़ा इजाफा हुआ है।

10 अप्रैल से 13 मई 2025 के बीच आधुनिक तकनीक की मदद से शेरों की गिनती की गई थी। इसके बाद नए आंकड़े जारी किए गए।

 

गुजरात के कई जिलों में फैला शेरों का बसेरा

अब शेर केवल गिर जंगल तक सीमित नहीं रहे। उनकी मौजूदगी गुजरात के कई जिलों में दर्ज की गई है। इन जिलों में शामिल हैं: जूनागढ़, गिर, सोमनाथ, अमरेली, भावनगर, पोरबंदर, द्वारका, राजकोट राज्य के 11 जिलों और 58 तहसीलों में शेरों की मौजूदगी दर्ज की गई है। यह शेरों की बढ़ती आबादी का संकेत माना जा रहा है।

 

वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि शेरों की संख्या बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ बीमारी का खतरा भी बढ़ जाता है।

अगर समय रहते संक्रमण को नहीं रोका गया तो यह कई शेरों तक फैल सकता है। इसलिए वन विभाग अब ज्यादा सतर्कता बरत रहा है।

वन विभाग की टीमें लगातार जंगल में गश्त कर रही हैं। संदिग्ध शेरों के सैंपल लिए जा रहे हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें इलाज के लिए अलग रखा जा रहा है।

 

सरकार ने लोगों से अफवाहों से बचने की अपील की

सरकार ने साफ किया है कि गिर में फिलहाल किसी बड़े स्तर की महामारी जैसी स्थिति नहीं है। अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है।

वन विभाग का कहना है कि हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं और विशेषज्ञ लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

 

गिर के शेरों की सुरक्षा क्यों जरूरी है?

एशियाई शेर भारत की वन्यजीव विरासत का अहम हिस्सा हैं। दुनिया भर में इनकी संख्या बेहद कम है। ऐसे में गिर जंगल में रहने वाले हर शेर की सुरक्षा महत्वपूर्ण मानी जाती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर समय पर बीमारी पर नियंत्रण पा लिया गया तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता है। फिलहाल वन विभाग की कोशिश यही है कि संक्रमण को फैलने से पहले ही रोक दिया जाए।