दुनियाभर के ऊर्जा बाजारों के लिए मई का महीना बड़े उतार-चढ़ाव भरा रहा। मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अब एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने तेल बाजार को राहत दी है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) को 60 दिनों तक बढ़ाने पर शुरुआती सहमति बनने की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच बातचीत सफल रहती है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो आने वाले समय में कच्चा तेल और सस्ता हो सकता है। इसका असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर भी दिखाई दे सकता है।
तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट
शुक्रवार 29 मई 2026 को ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड करीब 87 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा।
मई महीने के दौरान ब्रेंट क्रूड में लगभग 19% की गिरावट दर्ज की गई है। यह साल 2020 के बाद किसी एक महीने में आई सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। वहीं डब्ल्यूटीआई क्रूड में भी लगातार कमजोरी बनी हुई है।
भारत के मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर भी कच्चे तेल की कीमतों में लगातार दबाव देखा गया। पिछले आठ कारोबारी सत्रों में से सात बार कीमतों में गिरावट दर्ज हुई और कुल मिलाकर लगभग 17% की कमी आई।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला कच्चा तेल इसी समुद्री मार्ग के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है।
कुछ समय पहले इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण आशंका जताई जा रही थी कि जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता था और तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती थीं।
लेकिन अब संकेत मिल रहे हैं कि इस समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही सामान्य बनी रह सकती है। यही कारण है कि बाजार में राहत का माहौल बना और तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा।
हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने अभी तक किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं की है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा है कि किसी औपचारिक समझौते तक पहुंचने में अभी समय लग सकता है।
तनाव कम हुआ, लेकिन चुनौतियां अभी भी बाकी
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल संघर्षविराम बढ़ा देने से सारी समस्याएं खत्म नहीं हो जातीं।
मध्य पूर्व के कई इलाकों में तेल उत्पादन और परिवहन से जुड़ी व्यवस्थाएं अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई हैं। कई तेल क्षेत्रों को दोबारा चालू करना होगा, क्षतिग्रस्त ऊर्जा ढांचे की मरम्मत करनी होगी और समुद्री रास्तों को पूरी तरह सुरक्षित बनाना होगा।
इसके अलावा जहाजों के लिए लगाए गए वैकल्पिक मार्गों को भी वापस सामान्य स्थिति में लाने में समय लग सकता है। इसलिए बाजार फिलहाल सावधानी के साथ आगे बढ़ रहा है।

विशेषज्ञों का अनुमान: कितना और सस्ता हो सकता है तेल?
एसएमसी ग्लोबल सिक्योरिटीज की कमोडिटी रिसर्च प्रमुख वंदना भारती के अनुसार, हालिया गिरावट मुख्य रूप से भू-राजनीतिक जोखिम कम होने की वजह से आई है।
उनका मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच औपचारिक समझौता हो जाता है तो ब्रेंट क्रूड 85 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जा सकता है। इसके बाद इसे 80 से 82 डॉलर के दायरे में मजबूत समर्थन मिल सकता है।
भारतीय बाजार की बात करें तो एमसीएक्स पर कच्चा तेल 8,200 रुपये के स्तर से नीचे फिसलकर 7,500 रुपये के आसपास तक पहुंच सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि बातचीत असफल रहती है और तनाव दोबारा बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में तेज उछाल भी देखने को मिल सकता है। ऐसी स्थिति में ब्रेंट क्रूड फिर से 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है।
कमजोर मांग भी कीमतों पर डाल रही असर
चॉइस ब्रोकिंग की कमोडिटी विश्लेषक कावेरी मोरे का कहना है कि केवल भू-राजनीतिक कारण ही नहीं, बल्कि वैश्विक मांग में कमजोरी भी तेल की कीमतों को नीचे ला रही है।
एशियाई देशों में तेल की खपत उम्मीद से कम रही है। साथ ही रिफाइनिंग कंपनियों का लाभ भी घटा है, जिससे बाजार में दबाव बना हुआ है।
उनके अनुसार निकट भविष्य में एमसीएक्स कच्चे तेल के लिए 8,100 रुपये का स्तर महत्वपूर्ण रहेगा। यदि यह स्तर टूटता है तो कीमतें 7,750 रुपये तक जा सकती हैं।
दूसरी ओर 8,900 से 9,500 रुपये के बीच मजबूत प्रतिरोध देखने को मिल सकता है, जहां बिकवाली बढ़ने की संभावना है।
क्या तेल बाजार जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहा है?
चॉइस इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के ऊर्जा विश्लेषक धवल पोपट का मानना है कि मौजूदा समय में तेल बाजार मूलभूत मांग और आपूर्ति से ज्यादा राजनीतिक खबरों पर प्रतिक्रिया दे रहा है।
उनके अनुसार हाल की गिरावट का बड़ा कारण अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर बनी उम्मीदें हैं। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि वैश्विक तेल बाजार अभी भी पूरी तरह संतुलित नहीं हुआ है।
पिछले दो महीनों के दौरान दुनिया में तेल की मांग और आपूर्ति के बीच प्रतिदिन लगभग 70 लाख से 1.1 करोड़ बैरल तक का अंतर देखा गया है। अमेरिका के बढ़े हुए उत्पादन और रणनीतिक भंडार से जारी तेल ने कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं है।
आगे क्या रहेगा सबसे बड़ा संकेत?
विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले कुछ सप्ताह तेल बाजार के लिए बेहद अहम होंगे। यदि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो कीमतों में और गिरावट संभव है।
लेकिन यदि समझौते में देरी होती है, समुद्री मार्गों में कोई नई बाधा आती है या मध्य पूर्व में तनाव फिर बढ़ता है, तो बाजार की दिशा तेजी से बदल सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह गिरावट?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का सीधा फायदा देश को मिलता है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से आयात बिल कम हो सकता है, महंगाई पर दबाव घट सकता है और भविष्य में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर भी राहत की उम्मीद बढ़ सकती है।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान वार्ता और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यही तय करेगा कि तेल बाजार में गिरावट जारी रहेगी या फिर कीमतें दोबारा ऊपर की ओर बढ़ेंगी।
Disclaimer: संबंधित बाजार विश्लेषकों एवं ब्रोकिंग कंपनियों के हैं। इन्हें निवेश सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार का निवेश, ट्रेडिंग या वित्तीय निर्णय लेने से पहले अपनी वित्तीय स्थिति और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखते हुए किसी प्रमाणित वित्तीय सलाहकार या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें। निवेश से जुड़े लाभ और हानि की पूरी जिम्मेदारी निवेशक की स्वयं की होगी।

