Shiv Sena UBT Crisis Explained: क्या उद्धव ठाकरे की पार्टी में फिर हुई बड़ी बगावत? जानिए पूरा राजनीतिक गणित

 

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। Shiv Sena (UBT) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों के बगावत करने और एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाने की खबरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। दिल्ली में बुलाई गई संसदीय दल की बैठक में केवल 3 सांसदों की मौजूदगी ने इन अटकलों को और मजबूत कर दिया है।

यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जून 2022 में विधायकों की बगावत के बाद यह शिवसेना में चार साल के भीतर दूसरी बड़ी टूट मानी जा रही है।

 

Shiv Sena UBT Crisis: क्या है पूरा मामला?

दिल्ली में शिवसेना (UBT) ने अपने सभी लोकसभा सांसदों की संसदीय दल की बैठक बुलाई थी। पार्टी ने बैठक में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए तीन लाइन का व्हिप भी जारी किया था।

हालांकि, 9 में से केवल 3 सांसद- लोकसभा में पार्टी के नेता अरविंद सावंत, मुख्य सचेतक अनिल देसाई और नासिक से सांसद राजाभाऊ वाजे– बैठक में पहुंचे।

बैठक से अनुपस्थित रहने वाले सांसदों में शामिल हैं:

  • मुंबई नॉर्थ ईस्ट के सांसद संजय दीना पाटिल
  • धाराशिव के सांसद ओमप्रकाश भूपालसिंह निम्बालकर
  • परभणी के सांसद संजय हरिभाऊ जाधव
  • यवतमाल-वाशिम के सांसद संजय देशमुख
  • शिर्डी के सांसद भाऊसाहेब वाकचौरे
  • हिंगोली के सांसद नागेश पाटिल आष्टीकर

इन सांसदों की अनुपस्थिति को पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से लिया है।

बैठक में क्या हुआ?

बैठक के बाद अरविंद सावंत ने कहा कि अनुपस्थित सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा और आगे कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

राज्यसभा सांसद संजय राउत ने और अधिक आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा-  “जो बैठक में आएगा वो हमारा है, जो नहीं आएगा वो बेईमान और गद्दार है।”

राउत ने यह भी आरोप लगाया कि सांसदों को “किडनैप” किया गया है और लोकतंत्र के साथ खेल किया जा रहा है।

 

बागी सांसद क्या चाहते हैं?

सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों ने एक प्रस्ताव पारित किया है जिसमें कहा गया है कि पार्टी बालासाहेब ठाकरे की मूल विचारधारा से दूर हो गई है।

बागी सांसदों की एक बड़ी चिंता यह भी बताई जा रही है कि भविष्य में शिवसेना (UBT) कांग्रेस के साथ और अधिक नजदीकी बढ़ा सकती है। इसी आधार पर वे खुद को “असल शिवसेना की विचारधारा” का प्रतिनिधि बता रहे हैं।

 

लोकसभा स्पीकर को भेजा गया पत्र

सूत्रों के मुताबिक, बुधवार सुबह करीब 9:30 बजे छह सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भेजकर शिंदे गुट में विलय का दावा किया। हालांकि, अभी तक न तो लोकसभा सचिवालय और न ही बागी सांसदों की तरफ से इस पत्र की आधिकारिक पुष्टि की गई है।

उधर, उद्धव ठाकरे गुट पहले ही स्पीकर से मिलकर अनुरोध कर चुका है कि किसी भी नए गुट को मान्यता देने से पहले उनका पक्ष सुना जाए।

 

गृह मंत्रालय ने बढ़ाई सुरक्षा

राजनीतिक घटनाक्रम के बीच केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने कथित छह बागी सांसदों की सुरक्षा बढ़ाने का फैसला किया है। सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों को Y+ सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश महाराष्ट्र पुलिस को दिए गए हैं।

इस फैसले को भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे बगावत की खबरों को और बल मिला है।

 

पिछले तीन दिनों की पूरी टाइमलाइन

 

15 जून: ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा

राजनीतिक गलियारों में खबरें आने लगीं कि उद्धव ठाकरे गुट के छह सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। इस संभावित अभियान को राजनीतिक हलकों में “ऑपरेशन टाइगर” नाम दिया गया। संजय राउत ने उसी दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन खबरों को खारिज किया था।

 

16 जून: 50 करोड़ रुपए के ऑफर का आरोप

संजय राउत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दावा किया कि सांसदों को तोड़ने के लिए 50 करोड़ रुपए तक की पेशकश की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि 15 करोड़ रुपए की अग्रिम राशि भी दी जा रही है।

उसी दिन अरविंद सावंत ने स्पीकर ओम बिरला को ईमेल भेजकर अनुरोध किया कि बिना पार्टी का पक्ष सुने किसी बागी गुट को मान्यता न दी जाए।

 

17 जून: बगावत की खबर तेज

शिंदे गुट के नेता किरण पावस्कर और एक मंत्री ने दावा किया कि छह सांसदों ने अलग गुट बनाने वाले पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। उसी दिन संजय राउत, अरविंद सावंत और अनिल देसाई ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की।

 

18 जून: संसदीय दल की बैठक

दिल्ली में आयोजित बैठक में केवल तीन सांसद पहुंचे, जबकि छह सांसद अनुपस्थित रहे। यहीं से पार्टी में विभाजन की अटकलें लगभग स्पष्ट होती नजर आईं।

 

दल-बदल कानून में 6 सांसदों का क्या महत्व है?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। लोकसभा में शिवसेना (UBT) के कुल 9 सांसद हैं। भारत के दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य एक साथ अलग होने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से सुरक्षा मिल सकती है।

9 सांसदों का दो-तिहाई आंकड़ा 6 होता है। यानी यदि 6 सांसद एक साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो वे खुद को वैध गुट बताने का दावा कर सकते हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अलग गुट बनाना पर्याप्त नहीं होगा। आगे चलकर किसी अन्य दल में औपचारिक विलय की प्रक्रिया भी पूरी करनी पड़ सकती है।

 

उद्धव ठाकरे गुट की कानूनी दलील क्या है?

शिवसेना (UBT) का तर्क है कि दसवीं अनुसूची के पैरा-4 के तहत संरक्षण तभी मिलेगा जब:

  • मूल राजनीतिक दल में विलय हो,
  • और विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य उसका समर्थन करें।

यानी पार्टी का दावा है कि केवल संसदीय दल का बहुमत पर्याप्त नहीं है। अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को करना होगा।

 

क्या NDA लोकसभा में संख्या बल बढ़ाने की कोशिश कर रहा है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। सूत्रों के अनुसार, मानसून सत्र से पहले केंद्र सरकार लोकसभा में अपना संख्या बल बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके पीछे तीन बड़े विधायी लक्ष्य बताए जा रहे हैं:

 

1. परिसीमन (Delimitation): नई जनगणना के बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर विचार चल रहा है। चर्चा है कि राज्यों की सीटों में एकमुश्त 50% तक वृद्धि का फॉर्मूला तैयार किया जा रहा है।

 

2. महिला आरक्षण लागू करना: महिला आरक्षण कानून पारित हो चुका है, लेकिन उसके क्रियान्वयन के लिए परिसीमन और अन्य प्रक्रियाएं जरूरी हैं।

 

3. वन नेशन, वन इलेक्शन: केंद्र सरकार लंबे समय से एक साथ चुनाव कराने की अवधारणा पर काम कर रही है। इन संवैधानिक परिवर्तनों के लिए संसद में व्यापक समर्थन की आवश्यकता होगी।

 

दो-तिहाई बहुमत का गणित क्या है?

वर्तमान में लोकसभा में लगभग 540 सदस्य हैं। यदि किसी संवैधानिक संशोधन पर मतदान होता है, तो दो-तिहाई बहुमत के लिए लगभग 352 वोटों की आवश्यकता पड़ सकती है। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार:

  • यदि शिवसेना (UBT) के 6 सांसद NDA का समर्थन करते हैं,
  • TMC के संभावित 22 सांसद साथ आते हैं,
  • DMK के 22 सांसद समर्थन देते हैं,
  • और JMM के 3 सांसद भी जुड़ते हैं,

तो सत्ता पक्ष दो-तिहाई बहुमत के काफी करीब पहुंच सकता है। हालांकि फिलहाल यह केवल राजनीतिक अटकलों और सूत्रों पर आधारित चर्चा है, किसी भी दल ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

 

2022 की बगावत से कितना मिलता-जुलता है यह संकट?

जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 39 विधायकों ने बगावत कर शिवसेना को विभाजित कर दिया था। उस बगावत के बाद:

  • शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने,
  • चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को “शिवसेना” नाम और “धनुष-बाण” चुनाव चिह्न दिया,
  • उद्धव ठाकरे को नई पहचान के रूप में “शिवसेना (UBT)” के साथ राजनीति करनी पड़ी।

अब लोकसभा सांसदों में संभावित टूट को उसी संकट का अगला चरण माना जा रहा है।

 

निष्कर्ष

शिव सेना (Shiv Sena UBT) के भीतर उभरा यह नया संकट महाराष्ट्र की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकता है। यदि छह सांसद वास्तव में अलग गुट बनाते हैं या शिंदे शिवसेना में शामिल होते हैं, तो यह उद्धव ठाकरे के लिए 2022 के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक झटका होगा।

अब सभी की नजरें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले, बागी सांसदों के अगले कदम और उद्धव ठाकरे की राजनीतिक रणनीति पर टिकी हैं।

 

FAQs

Q. Why did Shiv Sena (UBT) issue a whip?

Ans. पार्टी ने दिल्ली में आयोजित संसदीय दल की बैठक में सभी सांसदों की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी किया था।

 

Q. What is a parliamentary party meeting?

Ans. संसदीय दल की बैठक किसी राजनीतिक दल के सांसदों की आधिकारिक बैठक होती है, जिसमें रणनीति, संगठनात्मक मुद्दों और संसद से जुड़े मामलों पर चर्चा की जाती है।

 

Q. Who must attend the Shiv Sena (UBT) meeting?

Ans. पार्टी के सभी 9 लोकसभा सांसदों को बैठक में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया था।

 

Q. What is the purpose of issuing a whip?

Ans. व्हिप का उद्देश्य सांसदों को किसी विशेष बैठक, चर्चा या मतदान में पार्टी लाइन का पालन करने और अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश देना होता है।

 

Q. What is the significance of this political development?

Ans. यदि छह सांसद अलग गुट बनाते हैं, तो यह दल-बदल कानून के तहत वैधता का दावा कर सकते हैं। इससे शिवसेना (UBT) की संसदीय ताकत घट सकती है और राष्ट्रीय राजनीति में NDA का संख्या बल बढ़ सकता है।