यूरोप इस समय अपने इतिहास की सबसे भीषण गर्मी (Europe Heatwave) में से एक का सामना कर रहा है। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, चेक रिपब्लिक और पोलैंड समेत कई देशों में तापमान ने दशकों पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। कई जगहों पर पारा 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जंगलों में आग लग रही है, रेलवे ट्रैक पिघल रहे हैं, सड़कें टूट रही हैं और हजारों स्कूल बंद करने पड़े हैं।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि फ्रांस में इस हीटवेव के दौरान करीब 1,300 अतिरिक्त मौतें (Excess Deaths) दर्ज की गई हैं। अतिरिक्त मौतों का मतलब है कि पिछले कुछ वर्षों के औसत की तुलना में इस बार लगभग 1,300 अधिक लोगों की मौत हुई। हालांकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर कुल मौतों का अंतिम आंकड़ा जारी नहीं किया है, लेकिन अधिकारियों के अनुसार मरने वालों में करीब 85 प्रतिशत बुजुर्ग हैं और अधिकांश मौतें घरों में हुई हैं। राजधानी पेरिस और उसके आसपास के इलाकों में ऐसे मामलों की संख्या सबसे अधिक रही।

यूरोप की मौजूदा स्थिति की तुलना अब साल 2003 की ऐतिहासिक हीटवेव से की जा रही है। उस समय 16 दिनों तक चली भीषण गर्मी के कारण पूरे यूरोप में लगभग 80 हजार लोगों की मौत हुई थी। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार की गर्मी भी उसी स्तर की गंभीर होती जा रही है।

समाचार एजेंसी AFP के अनुमान के मुताबिक, केवल एक दिन में ही यूरोप के लगभग 19.1 करोड़ लोगों ने 35 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान का सामना किया। कई शहरों में रेड अलर्ट लागू करना पड़ा, जबकि कई देशों में लोगों से दोपहर के समय घरों से बाहर न निकलने की अपील की गई।
हीटवेव (Heatwave) क्या होती है?
हीटवेव यानी लू ऐसी मौसमीय स्थिति होती है, जब किसी क्षेत्र का तापमान वहां के सामान्य औसत से लगातार कई दिनों तक बहुत अधिक बना रहता है। यह केवल गर्मी का मौसम नहीं होता, बल्कि ऐसी असामान्य और लगातार रहने वाली अत्यधिक गर्मी होती है, जो इंसानों के स्वास्थ्य, खेती, जल संसाधनों, बिजली व्यवस्था और पूरे सामाजिक ढांचे पर गंभीर असर डाल सकती है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार हीटवेव घोषित करने के लिए केवल तापमान अधिक होना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका सामान्य औसत से काफी अधिक होना भी जरूरी है।
मैदानी क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 40°C या उससे अधिक, तटीय क्षेत्रों में 37°C या उससे अधिक तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 30°C या उससे अधिक होना चाहिए। इसके बाद यदि तापमान सामान्य से 4.5°C से 6.4°C अधिक हो जाए, तो उसे हीटवेव माना जाता है। यदि यह बढ़ोतरी 6.5°C या उससे अधिक हो जाए, तो उसे गंभीर हीटवेव (Severe Heatwave) कहा जाता है।

इसके अलावा यदि मैदानी क्षेत्रों में तापमान 45°C पार कर जाए तो सामान्य तापमान की तुलना किए बिना भी उसे हीटवेव माना जाता है। यदि तापमान 47°C या उससे अधिक पहुंच जाए तो उसे गंभीर हीटवेव की श्रेणी में रखा जाता है।
हीटवेव इतनी खतरनाक क्यों होती है?
हीटवेव केवल तापमान बढ़ने का नाम नहीं है। लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी रहने पर शरीर का प्राकृतिक तापमान नियंत्रित करने वाला सिस्टम प्रभावित होने लगता है।
एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का सामान्य तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है। जब बाहर का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए अधिक पसीना निकालना शुरू करता है। साथ ही रक्त संचार भी तेज हो जाता है ताकि अतिरिक्त गर्मी बाहर निकल सके।
लेकिन यदि बाहर का तापमान बहुत ज्यादा हो और कई दिनों तक बना रहे, तो शरीर के भीतर मौजूद पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम-पोटेशियम) तेजी से कम होने लगते हैं। इससे डिहाइड्रेशन, लो ब्लड प्रेशर, कमजोरी, चक्कर आना और कई मामलों में हीट स्ट्रोक जैसी जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती है।
डॉक्टरों के अनुसार अत्यधिक गर्मी के दौरान लिवर, किडनी और हृदय पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यदि समय पर इलाज न मिले तो कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं।
हीटवेव से कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं?
लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी में रहने से शरीर पर कई तरह के दुष्प्रभाव पड़ते हैं। सबसे सामान्य समस्या डिहाइड्रेशन होती है, क्योंकि लगातार पसीना निकलने से शरीर में पानी और जरूरी खनिजों की कमी हो जाती है।
इसके अलावा हीट एक्सहॉशन (Heat Exhaustion), हीट स्ट्रोक (Heat Stroke), बेहोशी, मांसपेशियों में ऐंठन, लो ब्लड प्रेशर, चक्कर आना, सांस लेने में दिक्कत, हृदयाघात (Cardiac Arrest), किडनी और लिवर से जुड़ी समस्याएं भी तेजी से बढ़ सकती हैं।
सबसे अधिक खतरा बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, पहले से बीमार लोगों और खुले में काम करने वाले मजदूरों को होता है।
WHO ने हीटवेव को इतना बड़ा खतरा क्यों माना है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार अत्यधिक गर्मी आज दुनिया के सबसे कम आंके जाने वाले स्वास्थ्य खतरों में से एक है।
WHO की रिपोर्ट के मुताबिक 2000 से 2019 के बीच हर साल औसतन लगभग 4.89 लाख लोगों की मौत गर्मी से जुड़ी वजहों से हुई। इनमें लगभग 45 प्रतिशत मौतें एशिया में और 36 प्रतिशत मौतें यूरोप में दर्ज की गईं।
WHO का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में जानें जाने के बावजूद दुनिया के अधिकांश देशों में हीटवेव को अब भी उसी गंभीरता से नहीं लिया जाता, जितना बाढ़, तूफान या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं को लिया जाता है।
अलग-अलग देशों में कैसा है हाल?
फ्रांस: अतिरिक्त 1,300 मौतें, स्कूल बंद और शराब पर रोक
फ्रांस इस बार सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल है। यहां लगभग 1,300 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। अधिकांश मौतें बुजुर्गों की हुई हैं और कई लोग अपने घरों में मृत पाए गए।
देश में तापमान कई जगह 44.3°C तक पहुंच गया, जबकि राष्ट्रीय औसत तापमान पहली बार 30°C से ऊपर दर्ज किया गया। रात का तापमान भी कई इलाकों में 22°C से नीचे नहीं गया।

भीषण गर्मी के कारण रेलवे सेवाएं प्रभावित हुईं, बिजली आपूर्ति बाधित हुई और हजारों घरों की बिजली चली गई। सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने पर अस्थायी रोक लगा दी, क्योंकि अत्यधिक गर्मी में शराब स्वास्थ्य जोखिम को और बढ़ा सकती है। इसके अलावा 1,350 से अधिक स्कूल बंद करने पड़े।

फ्रांस की मौसम एजेंसी मेटियो-फ्रांस ने कहा कि वर्तमान स्थिति वर्ष 2003 की ऐतिहासिक हीटवेव जैसी गंभीर होती जा रही है, जिसमें केवल फ्रांस में लगभग 15 हजार लोगों की मौत हुई थी।
ब्रिटेन: 50 साल पुराने रिकॉर्ड लगातार टूटे
ब्रिटेन के इतिहास में पहली बार लगातार तीन दिनों तक रेड एक्सट्रीम हीट वार्निंग जारी करनी पड़ी। जून महीने का लगभग 50 साल पुराना तापमान रिकॉर्ड लगातार तीन बार टूटा। दक्षिणी इंग्लैंड में तापमान 36.4°C तक पहुंच गया। बिजली की मांग पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक हो गई।
लगभग 1,000 स्कूल बंद करने पड़े। पुराने कंक्रीट के स्कूल भवन इतने गर्म हो गए कि वहां पढ़ाई कराना संभव नहीं रहा। रेलवे पटरियां फैलने लगीं, इसलिए ट्रेनों की गति कम करनी पड़ी। कई क्षेत्रों में पानी बचाने के लिए बगीचों और कारों पर पाइप से पानी डालने पर भी रोक लगा दी गई।
स्पेन: 45 डिग्री के पार पहुंचा तापमान
स्पेन इस समय यूरोप का सबसे गर्म देश बना हुआ है। एंडुजार शहर में तापमान 45.1°C तक पहुंच गया, जबकि बिलबाओ में जून महीने का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड टूट गया। केवल चार दिनों में 200 से अधिक लोगों की मौत गर्मी से जुड़ी वजहों से होने की जानकारी सामने आई। सूखे और भीषण गर्मी के कारण जंगलों में बड़े पैमाने पर आग लगी, जिससे कई कस्बों को खाली कराना पड़ा।
जर्मनी: इतिहास का सबसे गर्म दिन
जर्मनी के ड्रैविट्ज शहर में तापमान 41.5°C रिकॉर्ड किया गया, जो देश के इतिहास का सबसे अधिक तापमान माना जा रहा है। रात में भी कई शहरों में तापमान 29.4°C से नीचे नहीं गया। सड़कें पिघलने लगीं, कई हाईवे बंद करने पड़े और अनेक खेल प्रतियोगिताएं तथा संगीत समारोह रद्द कर दिए गए।
डेनमार्क: ठंडे देश में 37 डिग्री तापमान
डेनमार्क जैसे ठंडे देश में तापमान 37°C तक पहुंच गया, जो 1874 से रिकॉर्ड शुरू होने के बाद का सबसे अधिक तापमान है। सड़कें पिघलने लगीं और भारी वाहनों की आवाजाही सीमित करनी पड़ी। गर्मी से बचने के लिए लाखों लोग समुद्र तटों पर पहुंच गए।
इटली: 18 शहरों में रेड अलर्ट
इटली में रोम, मिलान, वेनिस, फ्लोरेंस और ट्यूरिन समेत 18 शहरों में रेड हीट अलर्ट जारी किया गया। देश की सबसे लंबी पो नदी का जलस्तर तेजी से घट रहा है। समुद्र का खारा पानी नदी में प्रवेश करने लगा है, जिससे खेती और पेयजल दोनों पर खतरा बढ़ गया है। सरकार ने दोपहर के समय बाहर न निकलने और काम के घंटे बदलने जैसी सलाह जारी की है।
चेक रिपब्लिक, स्विट्जरलैंड, पोलैंड और पुर्तगाल भी प्रभावित
चेक रिपब्लिक में तापमान 40.6°C तक पहुंच गया, जिसने देश का पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। पूरे देश में रेड अलर्ट लागू है।
स्विट्जरलैंड के बासेल शहर में जून महीने का सबसे अधिक तापमान 38.8°C दर्ज किया गया। अत्यधिक गर्मी के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगे हैं।
पोलैंड में मौसम विभाग ने तापमान 40°C पार जाने की चेतावनी जारी की है। यदि ऐसा हुआ तो लगभग 100 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड टूट जाएगा।
पुर्तगाल में लगातार 40°C से अधिक तापमान रहने के कारण जंगलों में आग का खतरा बहुत बढ़ गया है और दमकल विभाग हाई अलर्ट पर है।
इस बार यूरोप की हीटवेव सामान्य क्यों नहीं है?
आमतौर पर यूरोप में सबसे अधिक गर्मी जुलाई के मध्य या आखिर में पड़ती है। लेकिन इस बार जून के अंत में ही तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार 1950 के बाद यह दूसरी बार है जब इतनी बड़ी और व्यापक हीटवेव गर्मियों के चरम से कई सप्ताह पहले ही शुरू हो गई।
यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक इसे सामान्य मौसमी गर्मी नहीं बल्कि Extreme Europe Heatwave मान रहे हैं।
आखिर यूरोप में इतनी भीषण हीटवेव क्यों पड़ रही है?
वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार की भीषण गर्मी के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं – पहली ओमेगा ब्लॉक (Omega Block), दूसरी हीट डोम (Heat Dome) और तीसरी जलवायु परिवर्तन (Climate Change)। इन तीनों ने मिलकर पूरे यूरोप को कई दिनों तक एक विशाल गर्म हवा के घेरे में कैद कर दिया।
पहला चरण: सामान्य दिनों में मौसम कैसे बदलता है?
पृथ्वी से लगभग 9 से 12 किलोमीटर ऊपर बेहद तेज गति से बहने वाली हवाओं को जेट स्ट्रीम (Jet Stream) कहा जाता है। यही हवाएं बादलों को आगे बढ़ाती हैं, बारिश वाले सिस्टम को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं और गर्म तथा ठंडी हवा के बीच संतुलन बनाए रखती हैं। सामान्य परिस्थितियों में यदि किसी क्षेत्र में कुछ दिनों तक गर्मी रहती भी है, तो जेट स्ट्रीम मौसम को आगे बढ़ा देती है और तापमान फिर सामान्य होने लगता है।
दूसरा चरण: इस बार क्या अलग हुआ?
इस बार यूरोप के ऊपर जेट स्ट्रीम सामान्य रास्ते से नहीं बह सकी। वायुमंडल में ऐसा दबाव पैटर्न बना जिसमें बीच में High Pressure (उच्च वायुदाब) और दोनों ओर Low Pressure (निम्न वायुदाब) मौजूद था।
इस स्थिति को ऐसे समझ सकते हैं जैसे किसी सड़क पर दोनों तरफ भारी ट्रक खड़े कर दिए जाएं और बीच की गाड़ी आगे ही न बढ़ पाए।
ठीक यही जेट स्ट्रीम के साथ हुआ। वह आगे बढ़ने के बजाय एक जगह फंस गई और उसका आकार ग्रीक अक्षर Ω (ओमेगा) जैसा दिखाई देने लगा। इसी मौसमीय स्थिति को ओमेगा ब्लॉक (Omega Block) कहा जाता है। यही ओमेगा ब्लॉक इस पूरी भीषण हीटवेव की शुरुआत बना।
हीट डोम (Heat Dome) कैसे बना?
ओमेगा ब्लॉक बनने के बाद उत्तरी अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान से आने वाली अत्यधिक गर्म और शुष्क हवा लगातार यूरोप की ओर बढ़ने लगी। सामान्य परिस्थितियों में यह गर्म हवा कुछ समय बाद आगे निकल जाती, लेकिन इस बार ओमेगा ब्लॉक ने इसे यूरोप के ऊपर ही रोक दिया।
उच्च वायुदाब (High Pressure) वाले इस क्षेत्र ने एक ढक्कन की तरह काम किया। जैसे उबलते हुए बर्तन पर ढक्कन रख दिया जाए और उसकी गर्मी बाहर न निकल सके, ठीक उसी तरह गर्म हवा कई दिनों तक जमीन के ऊपर फंसी रही। इसी स्थिति को हीट डोम (Heat Dome) कहा जाता है।
जब हवा लगातार नीचे की ओर दबती है तो वह और अधिक गर्म होती जाती है। दूसरी ओर साफ आसमान होने की वजह से सूरज की किरणें बिना किसी रुकावट के लगातार जमीन को गर्म करती रहती हैं। गर्म जमीन फिर आसपास की हवा को और ज्यादा गर्म करती है। इस तरह एक ऐसा चक्र बन जाता है जिसमें हर दिन तापमान पहले से अधिक बढ़ने लगता है। वैज्ञानिक इसे Heat Feedback Loop कहते हैं।
जलवायु परिवर्तन ने इस हीटवेव को और खतरनाक बना दिया
वैज्ञानिकों का कहना है कि ओमेगा ब्लॉक और हीट डोम जैसी मौसमीय घटनाएं नई नहीं हैं। ये पहले भी बनती रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज पृथ्वी पहले से कहीं ज्यादा गर्म हो चुकी है।
कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के लगातार उपयोग से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा तेजी से बढ़ी है। इसी कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है।
ऐसी स्थिति में जब ओमेगा ब्लॉक और हीट डोम जैसी घटनाएं बनती हैं, तो उनके नीचे पहले से कहीं अधिक गर्म हवा जमा हो जाती है। यही वजह है कि आज की हीटवेव पहले की तुलना में अधिक लंबी, अधिक तीव्र और अधिक घातक साबित हो रही है।

आसान भाषा में पूरी प्रक्रिया समझिए
पूरी प्रक्रिया को आसान शब्दों में समझें तो सबसे पहले जेट स्ट्रीम अपनी सामान्य दिशा से हटकर ओमेगा ब्लॉक में फंस गई। इसके बाद सहारा रेगिस्तान से आने वाली गर्म हवा लगातार यूरोप पहुंचती रही लेकिन बाहर नहीं निकल सकी। कई दिनों तक यही स्थिति बनी रहने से हीट डोम तैयार हो गया जिसने गर्म हवा को जमीन के पास कैद कर दिया। साफ आसमान और लगातार धूप ने तापमान को और बढ़ा दिया। अंत में जलवायु परिवर्तन ने इस पूरी प्रक्रिया को पहले से कहीं अधिक गंभीर बना दिया।
आखिर यूरोप दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में तेजी से गर्म क्यों हो रहा है?
यूरोप इस समय रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव का सामना कर रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह केवल एक अस्थायी मौसमीय घटना नहीं है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप (Fastest Warming Continent) बन चुका है। जहां पूरी पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति (1850–1900) से पहले की तुलना में लगभग 1.4°C बढ़ चुका है, वहीं यूरोप का औसत तापमान लगभग 2.4°C बढ़ चुका है। यानी वैश्विक औसत की तुलना में यूरोप लगभग दोगुनी गति से गर्म हो रहा है।
1. ग्रीनहाउस गैसें सबसे बड़ा कारण हैं
वैज्ञानिकों का कहना है कि यूरोप में बढ़ती गर्मी की सबसे बड़ी वजह मानव गतिविधियों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse Gases) हैं। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) के लगातार उपयोग से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों की मात्रा बढ़ गई है। ये गैसें पृथ्वी से निकलने वाली गर्मी को अंतरिक्ष में जाने से रोकती हैं, जिससे पूरी पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। हालांकि यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में हो रही है, लेकिन कुछ भौगोलिक और मौसमीय कारणों से इसका असर यूरोप में कहीं अधिक दिखाई दे रहा है।
2. मौसमीय पैटर्न (Weather Pattern) बदल रहे हैं
यूरोप में पिछले 20–30 वर्षों के दौरान उच्च वायुदाब (High Pressure Systems) पहले की तुलना में अधिक बनने लगे हैं। ये सिस्टम लंबे समय तक एक ही स्थान पर बने रहते हैं, इसलिए इन्हें ब्लॉकिंग हाई (Blocking High) भी कहा जाता है।
जब ऐसा हाई प्रेशर सिस्टम बनता है, तो यह अन्य मौसम प्रणालियों – जैसे बारिश लाने वाले बादलों या ठंडी हवाओं – को उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने देता। परिणामस्वरूप आसमान साफ रहता है, तेज धूप लगातार जमीन को गर्म करती रहती है और तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। वैज्ञानिक अभी इस बात पर शोध कर रहे हैं कि इन हाई प्रेशर सिस्टम की बढ़ती संख्या सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम है या प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का हिस्सा, लेकिन यह तय है कि इनके कारण हीटवेव की संभावना बढ़ रही है।
3. आर्कटिक (Arctic) के तेजी से गर्म होने का असर
यूरोप के तेजी से गर्म होने का एक बड़ा कारण उसकी भौगोलिक स्थिति भी है। यूरोप सीधे आर्कटिक क्षेत्र (Arctic) से जुड़ा हुआ है, जबकि आर्कटिक पृथ्वी के सबसे तेजी से गर्म होने वाले क्षेत्रों में से एक है।
औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में आर्कटिक का तापमान लगभग 3.2°C बढ़ चुका है। जब आर्कटिक तेजी से गर्म होता है, तो उसका प्रभाव यूरोप के मौसम और तापमान पर भी पड़ता है। यही वजह है कि यूरोप में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत से कहीं अधिक दर्ज की जा रही है।
4. बर्फ पिघलने से बढ़ रही है गर्मी (Albedo Effect)
आर्कटिक और यूरोप के बर्फीले क्षेत्रों में पहले बर्फ और हिम (Snow & Ice) सूर्य की अधिकांश ऊर्जा को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित (Reflect) कर देते थे। इसे एल्बीडो प्रभाव (Albedo Effect) कहा जाता है।
लेकिन जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, उसकी जगह गहरे रंग की जमीन और समुद्र दिखाई देने लगे हैं। ये सतहें सूर्य की गर्मी को परावर्तित करने के बजाय उसे अधिक मात्रा में अवशोषित (Absorb) करती हैं। इससे तापमान और बढ़ जाता है, अधिक बर्फ पिघलती है और यह प्रक्रिया लगातार खुद को मजबूत करती रहती है।
5. यूरोप में बर्फबारी कम होती जा रही है
यूरोप के कई हिस्सों में पहले सर्दियों के दौरान कई दिनों तक जमीन बर्फ से ढकी रहती थी। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी की अवधि कम हो गई है।
जब बर्फ कम होती है, तो उसकी जगह गहरी मिट्टी और चट्टानें खुल जाती हैं, जो अधिक गर्मी सोखती हैं। इससे सर्दियों के बाद भी जमीन पहले से अधिक गर्म रहती है और गर्मियों में तापमान तेजी से बढ़ जाता है।
6. वायु प्रदूषण कम होने का भी एक अप्रत्याशित असर
पिछले कुछ दशकों में यूरोप ने वायु प्रदूषण कम करने के लिए कड़े कानून लागू किए हैं, जिससे एरोसोल (Aerosols) यानी हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों की मात्रा कम हुई है।
हालांकि यह मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छा कदम है, लेकिन इन कणों का एक प्रभाव यह भी था कि वे सूर्य की कुछ ऊर्जा को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते थे। अब जब इनकी मात्रा कम हो गई है, तो पहले की तुलना में अधिक सौर ऊर्जा पृथ्वी की सतह तक पहुंच रही है, जिससे तापमान में अतिरिक्त वृद्धि हो रही है।
7. पूरे यूरोप में गर्मी समान नहीं बढ़ रही
वैज्ञानिकों के अनुसार यूरोप के सभी हिस्से एक समान गति से गर्म नहीं हो रहे हैं।
पिछले 30 वर्षों में पूर्वी, दक्षिण-पूर्वी और मध्य यूरोप (विशेषकर आल्प्स पर्वत क्षेत्र) में तापमान हर दशक 0.5°C से 1°C तक बढ़ा है।
वहीं पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी यूरोप, साथ ही फिनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन जैसे उप-आर्कटिक क्षेत्रों में यह वृद्धि 0.2°C से 0.5°C प्रति दशक रही है।
सबसे तेज़ गर्म होने वाला क्षेत्र स्वालबार्ड (Svalbard) है, जो नॉर्वे का आर्कटिक द्वीपसमूह है। यहां तापमान हर दशक 1.5°C से 2°C तक बढ़ रहा है, जो इसे पृथ्वी के सबसे तेजी से गर्म होने वाले क्षेत्रों में शामिल करता है।
यूरोप में हीटवेव अब नई सामान्य स्थिति बनती जा रही है
वैज्ञानिकों के अनुसार यूरोप में हीटवेव अब अपवाद नहीं रह गई है। 1950 से 1999 के बीच पूरे यूरोप में केवल 5 बड़ी हीटवेव दर्ज की गई थीं। लेकिन वर्ष 2000 से 2021 के बीच इनकी संख्या बढ़कर 18 हो गई। इसके बाद 2022, 2023, 2025 और अब 2026 की भीषण गर्मी को जोड़ दिया जाए तो केवल पिछले लगभग 25 वर्षों में यूरोप 20 से अधिक गंभीर हीटवेव झेल चुका है।
यानी जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी अब यूरोप में नई सामान्य स्थिति (New Normal) बनती जा रही है।

भारत में 40°C सामान्य और यूरोप में आपदा क्यों बन जाता है?
अक्सर सवाल उठता है कि भारत में 43 से 45 डिग्री तापमान हर साल देखने को मिलता है, फिर यूरोप में 40 डिग्री पहुंचते ही आपातकाल जैसी स्थिति क्यों बन जाती है? इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं।
इन्फ्रास्ट्रक्चर का अंतर
यूरोप के अधिकांश घर सर्दियों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। मोटी दीवारें, कम वेंटिलेशन और ऐसी डिजाइन होती है जो गर्मी को अंदर रोककर रखे। गर्मियों में यही घर ओवन की तरह काम करने लगते हैं।
इसके विपरीत भारत में घरों का निर्माण इस तरह किया जाता है कि हवा का प्रवाह बना रहे। ऊंची छतें, खुली खिड़कियां, आंगन और पत्थर या टाइल वाले फर्श गर्मी को बाहर निकालने में मदद करते हैं।
शरीर की आदत भी अलग होती है
भारत के लोग बचपन से ही अधिक तापमान में रहते हैं। उनका शरीर अधिक पसीना निकालकर खुद को ठंडा रखने का अभ्यस्त होता है।
यूरोप के लोगों का शरीर कम तापमान का आदी होता है। अचानक 40 डिग्री के आसपास तापमान पहुंचने पर उनके शरीर का तापमान नियंत्रित करने वाला तंत्र तेजी से प्रभावित हो सकता है, जिससे हीट स्ट्रोक और अंगों के फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।
नमी (Humidity) भी बड़ी वजह है
गर्मी केवल तापमान से नहीं, बल्कि हवा में मौजूद नमी से भी तय होती है। भारत में मई-जून के दौरान कई क्षेत्रों में गर्मी अपेक्षाकृत शुष्क होती है, जिससे पसीना जल्दी सूख जाता है और शरीर ठंडा होता रहता है।
यूरोप में गर्मी के दौरान कई क्षेत्रों में हवा में नमी काफी अधिक होती है। पसीना आसानी से नहीं सूखता, इसलिए शरीर खुद को पर्याप्त ठंडा नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप 40 डिग्री का तापमान भी 45 डिग्री या उससे अधिक जैसा महसूस होने लगता है।
यूरोप में केवल 20% घरों में ही AC हैं
विशेषज्ञों के अनुसार यूरोप के अधिकांश देशों में एयर कंडीशनर की जरूरत ऐतिहासिक रूप से बहुत कम रही है। इसलिए वहां केवल लगभग 20 प्रतिशत घरों में ही एयर कंडीशनर मौजूद हैं।
इसके मुकाबले अमेरिका में लगभग 90 प्रतिशत घरों में AC उपलब्ध हैं। यही वजह है कि लंबे समय तक रहने वाली हीटवेव यूरोप में स्वास्थ्य पर कहीं अधिक गंभीर असर डालती है।

डॉक्टरों की चेतावनी
डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी के दौरान शरीर में पानी की कमी, हीट स्ट्रोक, चक्कर आना, बेहोशी, किडनी और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सबसे ज्यादा जोखिम बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों को होता है।
यूरोप की मौजूदा हीटवेव केवल एक मौसमी घटना नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर का स्पष्ट संकेत मानी जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसी चरम मौसमीय घटनाएं और अधिक सामान्य होती जाएंगी।

FAQs:
फ्रांस में इस हीटवेव के दौरान करीब 1,300 अतिरिक्त मौतें (Excess Deaths) दर्ज की गई हैं। वहीं 2003 की ऐतिहासिक यूरोपीय हीटवेव में पूरे यूरोप में लगभग 80 हजार लोगों की मौत हुई थी। WHO के अनुसार हर साल दुनिया में करीब 4.89 लाख मौतें गर्मी से जुड़ी वजहों से होती हैं।
हीटवेव ऐसी स्थिति है जब किसी क्षेत्र का तापमान सामान्य से कई दिनों तक लगातार बहुत अधिक बना रहता है। इससे लोगों के स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों और बिजली व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार की रिकॉर्डतोड़ गर्मी के पीछे ओमेगा ब्लॉक (Omega Block), हीट डोम (Heat Dome) और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) तीन प्रमुख कारण हैं। इनकी वजह से गर्म हवा कई दिनों तक यूरोप के ऊपर फंसी रही और तापमान लगातार बढ़ता गया।
यूरोप के अधिकांश घर ठंडे मौसम के लिए बनाए गए हैं, वहां केवल लगभग 20% घरों में AC हैं और लोगों का शरीर भी कम तापमान का आदी है। इसके विपरीत भारत में घरों की डिजाइन, गर्म मौसम के प्रति शरीर की अनुकूलता और अलग जलवायु के कारण अधिक तापमान झेलना अपेक्षाकृत आसान होता है।
बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, पहले से बीमार लोगों और खुले में काम करने वाले मजदूरों पर हीटवेव का सबसे अधिक असर पड़ता है। इनमें हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हृदय संबंधी समस्याएं और अंगों के फेल होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मानना है कि हीटवेव हर साल लाखों लोगों की जान लेती है, लेकिन इसे अक्सर बाढ़, तूफान या भूकंप जैसी आपदाओं जितनी गंभीरता से नहीं लिया जाता। इसलिए इसे एक ‘Silent Killer’ (मौन हत्यारा) भी कहा जाता है।
हाँ। वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इससे हीटवेव पहले की तुलना में अधिक बार, अधिक समय तक और अधिक तीव्र रूप में देखने को मिल रही हैं।
तेज धूप में बाहर निकलने से बचें, पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, हल्के रंग के ढीले कपड़े पहनें, दोपहर के समय भारी शारीरिक गतिविधि से बचें, घर को ठंडा रखने की कोशिश करें और बुजुर्गों, बच्चों तथा बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखें।

