India EU Trade Pact: भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते से दोनों बाजारों में सामान पर आयात शुल्क घटेगा, लेकिन भारतीय कृषि और खाद्य निर्यातकों के सामने नियमों की बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। आर्थिक शोध संस्था ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने चेतावनी दी है कि भारत ने समय रहते अपनी खाद्य सुरक्षा और आयात जांच व्यवस्था मजबूत नहीं की तो यूरोपीय खाद्य उत्पादों के लिए भारतीय बाजार ज्यादा खुल जाएगा, जबकि भारतीय कृषि उत्पाद यूरोप की सीमाओं पर लगातार जांच, वापसी और प्रतिबंधों का सामना करते रहेंगे। भारत और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ ने 27 जनवरी 2026 को मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत पूरी कर ली थी। समझौते के कानूनी परीक्षण और मंजूरी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे लागू किया जाएगा।

कम शुल्क से व्यापार बढ़ेगा, खाद्य नियम बन सकते हैं नई दीवार
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार को आसान बनाना है। समझौते के तहत यूरोपीय संघ 90 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लाइनों पर आयात शुल्क समाप्त करेगा, जबकि भारत 86 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क हटाएगा। आंशिक कटौती को मिलाकर व्यापार उदारीकरण का दायरा भारत की ओर से 96.6 प्रतिशत और यूरोपीय संघ की ओर से 99.3 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है।
इसके बावजूद केवल आयात शुल्क घटने से भारतीय किसानों और खाद्य निर्यातकों को यूरोपीय बाजार में स्वतः प्रवेश नहीं मिल जाएगा। कृषि और खाद्य व्यापार में स्वच्छता, कीटनाशक अवशेष, पशु एवं पौध स्वास्थ्य, पैकेजिंग, लेबलिंग और उत्पाद की पूरी सप्लाई चेन से जुड़े मानक भी पूरे करने पड़ते हैं। GTRI का कहना है कि ये तकनीकी नियम कई बार वैध उपभोक्ता सुरक्षा उपाय होते हैं, लेकिन अनुचित या गैर-वैज्ञानिक तरीके से लागू किए जाने पर वे छिपे हुए व्यापार अवरोध का रूप ले सकते हैं।
GTRI की चेतावनी- दोनों मोर्चों पर कमजोर नहीं रह सकता भारत
GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव और सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एग्रीकल्चर की शांतवना दीक्षित द्वारा तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि समझौता लागू होने के करीब है, इसलिए भारत घरेलू खाद्य सुरक्षा और विदेशी बाजारों की नियामकीय बाधाओं, दोनों मामलों में कमजोर नहीं रह सकता।

रिपोर्ट के अनुसार भारत को एक आधुनिक, विज्ञान आधारित और पारस्परिक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी। इसका उद्देश्य केवल विदेशी उत्पादों की जांच करना नहीं, बल्कि भारतीय उपभोक्ताओं की सुरक्षा, किसानों को बेहतर उत्पादन पद्धतियों से जोड़ना और देश की दीर्घकालीन कृषि निर्यात प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना होना चाहिए।
GTRI की मुख्य चिंता यह है कि भारत यूरोपीय खाद्य उत्पादों पर आयात शुल्क तो कम कर दे, लेकिन भारतीय फल, सब्जियां, मसाले, चावल, चाय और दूसरे कृषि उत्पाद यूरोपीय संघ की सीमा पर सख्त मानकों के कारण बार-बार रुकते रहें। ऐसी स्थिति में मुक्त व्यापार समझौते का कृषि क्षेत्र में लाभ असंतुलित हो सकता है।
खेत से बंदरगाह तक हर उत्पाद की पहचान जोड़ने का सुझाव
रिपोर्ट में भारत से खेत से बंदरगाह तक ट्रेसबिलिटी सिस्टम विकसित करने को कहा गया है। ट्रेसबिलिटी का अर्थ है कि निर्यात होने वाले किसी भी खाद्य उत्पाद के बारे में यह पता लगाया जा सके कि वह किस खेत में पैदा हुआ, उस पर कौन-सा कीटनाशक इस्तेमाल हुआ, उसकी प्रोसेसिंग कहां हुई, किस प्रयोगशाला में जांच हुई और वह किस व्यापारी के जरिए बंदरगाह तक पहुंचा।
यदि किसी खेप में मानक से अधिक कीटनाशक अवशेष या दूसरा खाद्य सुरक्षा उल्लंघन मिलता है तो पूरी निर्यात व्यवस्था को रोकने के बजाय संबंधित खेत, व्यापारी या प्रोसेसिंग यूनिट की पहचान की जा सकती है। इससे गलती के स्रोत पर कार्रवाई आसान होगी और नियमों का पालन करने वाले किसानों एवं निर्यातकों को बेवजह नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा।
इसके साथ ही किसानों को कीटनाशकों की मात्रा, छिड़काव की सही अवधि और फसल काटने से पहले जरूरी प्रतीक्षा समय के बारे में स्पष्ट मार्गदर्शन देने की जरूरत बताई गई है। यूरोपीय संघ कई पदार्थों के लिए अधिकतम अवशेष सीमा बेहद कम रखता है और कुछ मामलों में सामान्य सीमा 0.01 पीपीएम तक हो सकती है। इसलिए उत्पादन स्तर पर सावधानी न बरती जाए तो निर्यात खेप बंदरगाह पहुंचने से पहले ही जोखिम में पड़ सकती है।
जांच प्रयोगशालाओं और भारतीय मान्यता प्रणाली पर जोर
GTRI ने देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त खाद्य जांच प्रयोगशालाओं की संख्या और क्षमता बढ़ाने का सुझाव दिया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत को विदेशी मान्यता प्रणालियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपनी प्रयोगशाला मान्यता व्यवस्था को भी मजबूत करना चाहिए, ताकि भारतीय जांच रिपोर्टों को प्रमुख निर्यात बाजारों में भरोसेमंद माना जाए।
नियमित अवशेष निगरानी भी जरूरी बताई गई है। इसका अर्थ है कि केवल निर्यात के समय नमूने जांचने के बजाय खेत, मंडी, प्रोसेसिंग केंद्र और बंदरगाह स्तर पर लगातार परीक्षण किए जाएं। इससे यह पता चल सकेगा कि किन फसलों, जिलों या आपूर्ति शृंखलाओं में नियमों के उल्लंघन का खतरा ज्यादा है।
रिपोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI), सीमा शुल्क विभाग तथा पौध एवं पशु क्वारंटीन एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और सख्त प्रवर्तन की सिफारिश की है। अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़े साझा होने से संदिग्ध खेप की पहचान और कार्रवाई तेजी से की जा सकती है।
विदेशी खाद्य उत्पादों की भी उसी सख्ती से हो जांच
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण सुझाव पारस्परिकता से जुड़ा है। GTRI के अनुसार जिस कठोरता से भारतीय खाद्य निर्यातों की जांच यूरोप और दूसरे देशों में होती है, उसी तरह भारत में आने वाले विदेशी खाद्य उत्पादों की भी जोखिम आधारित जांच होनी चाहिए।
हर आयातित खेप की समान स्तर पर जांच करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए उत्पाद, निर्यातक देश, कंपनी के पिछले रिकॉर्ड और संभावित खाद्य खतरे के आधार पर जोखिम तय किया जा सकता है। ज्यादा जोखिम वाली खेपों से अधिक नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच की जानी चाहिए। भारतीय मानकों में विफल होने वाली खेपों को बाजार में प्रवेश देने के बजाय वापस भेजा या नियमों के अनुसार नष्ट किया जाना चाहिए।
GTRI का तर्क है कि खाद्य सुरक्षा की सख्त जांच व्यापार विरोधी कदम नहीं है, बशर्ते उसके नियम विज्ञान, समानता और पारदर्शिता पर आधारित हों। इससे भारतीय उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन मिलेगा और विदेशी निर्यातकों को भी वही जवाबदेही निभानी होगी, जिसकी अपेक्षा भारतीय कंपनियों से विदेश में की जाती है।
चीन का उदाहरण देकर भारत को सख्ती बढ़ाने की सलाह
रिपोर्ट में चीन का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि 2013 से 2019 के बीच चीनी अधिकारियों ने खाद्य सुरक्षा उल्लंघनों के कारण हर वर्ष औसतन करीब 740 यूरोपीय खाद्य खेपों को अस्वीकार किया या वापस भेजा।
GTRI के अनुसार चीन ने दिखाया कि मजबूत आयात जांच और बड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार को एक साथ चलाया जा सकता है। अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत भी गैर-भेदभावपूर्ण और विज्ञान आधारित जांच व्यवस्था अपनाकर घरेलू उपभोक्ताओं की सुरक्षा कर सकता है। यह आंकड़ा GTRI रिपोर्ट का दावा है और इसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
भारतीय उत्पादों के खिलाफ EU की 365 सूचनाओं का दावा
GTRI ने कहा है कि यूरोपीय संघ ने भारतीय खाद्य उत्पादों से संबंधित 365 खाद्य सुरक्षा सूचनाएं जारी की हैं। इन मामलों के कारण सीमा पर खेपों को अस्वीकार करने, बाजार से उत्पाद वापस मंगाने, खेप नष्ट करने और भविष्य की खेपों पर अधिक सख्त जांच जैसी कार्रवाइयां हुईं।
यह जरूरी नहीं है कि हर अधिसूचना का अर्थ जानबूझकर किया गया नियम उल्लंघन हो। कई मामले कीटनाशक अवशेष, सूक्ष्मजीव संक्रमण, गलत लेबलिंग, प्रतिबंधित पदार्थ, दस्तावेज की कमी या किसी खास मानक में बदलाव के कारण भी पैदा हो सकते हैं। फिर भी बड़ी संख्या में सूचनाएं बताती हैं कि भारतीय निर्यातकों को उत्पादन से लेकर पैकेजिंग और दस्तावेज तक पूरी व्यवस्था सुधारनी होगी।
कीटनाशकों के आंकड़ों पर उठा समान जांच का सवाल
अजय श्रीवास्तव ने रिपोर्ट में दावा किया कि यूरोपीय संघ में कीटनाशकों का औसत इस्तेमाल 2.67 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि भारत में यह लगभग 0.24 किलोग्राम है। इसके बावजूद यूरोप से भारत आने वाले खाद्य उत्पादों की जांच अपेक्षाकृत सीमित रहती है।
इस तुलना के जरिए रिपोर्ट यह नहीं कहती कि यूरोपीय भोजन अपने-आप असुरक्षित है। प्रति हेक्टेयर कुल कीटनाशक उपयोग से किसी अंतिम उत्पाद की सुरक्षा अकेले तय नहीं होती। इसमें उपयोग किए गए रसायन का प्रकार, फसल, मात्रा, छिड़काव का समय और उत्पाद में बचा वास्तविक अवशेष भी महत्वपूर्ण होता है। GTRI ने इन आंकड़ों का उपयोग यह तर्क रखने के लिए किया है कि भारतीय मानकों को सभी घरेलू और आयातित उत्पादों पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।
नियम बदलने से पहले निर्यातकों को मिले चेतावनी
GTRI ने एक समर्पित Food-Safety Monitoring and Response Cell बनाने का प्रस्ताव दिया है। यह इकाई यूरोपीय संघ सहित प्रमुख निर्यात बाजारों में खाद्य सुरक्षा नियमों, कीटनाशक अवशेष सीमा और लेबलिंग मानकों में होने वाले बदलावों पर नजर रखेगी।
किसी विदेशी बाजार में नया नियम लागू होने से पहले भारतीय किसानों, निर्यातकों, प्रयोगशालाओं और प्रोसेसिंग कंपनियों को चेतावनी दी जा सकेगी। वर्तमान व्यवस्था में कई छोटे निर्यातकों को नियम बदलने की जानकारी तब मिलती है, जब उनकी खेप सीमा पर रुक जाती है।
प्रस्तावित इकाई उल्लंघन के कारणों का विश्लेषण, प्रशिक्षण, प्रयोगशाला मार्गदर्शन और विदेशी नियामकों के साथ संवाद में भी मदद कर सकती है। इससे हर कंपनी को अलग-अलग नियम समझने की बजाय एक केंद्रीय सहायता व्यवस्था मिल सकेगी।
भारत-EU व्यापार में बड़ा आर्थिक दांव
यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा वस्तु व्यापार साझेदार है। वर्ष 2024 में दोनों पक्षों के बीच वस्तुओं का व्यापार लगभग 120 अरब यूरो रहा, जो भारत के कुल वस्तु व्यापार का 11.5 प्रतिशत था। सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार 2023 में 59.7 अरब यूरो तक पहुंच गया था।
FTA लागू होने के बाद भारतीय कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान, समुद्री उत्पाद, रसायन, फार्मा और दूसरे क्षेत्रों को यूरोपीय बाजार में कम शुल्क का लाभ मिल सकता है। यूरोपीय कंपनियों के लिए भारत में मशीनरी, वाहन, रसायन, खाद्य एवं पेय पदार्थ और दूसरे उत्पादों का बाजार अधिक सुलभ होगा।

लेकिन कृषि व्यापार सामान्य औद्योगिक सामान से अधिक संवेदनशील है। किसान और छोटे निर्यातक प्रयोगशाला जांच, प्रमाणन, ट्रेसबिलिटी और बदलते विदेशी नियमों की लागत आसानी से नहीं उठा पाते। इसलिए समझौते का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब शुल्क कटौती के साथ अनुपालन की घरेलू व्यवस्था भी मजबूत हो।
खाद्य मानक सुरक्षा भी, व्यापार नीति भी
खाद्य सुरक्षा मानक मूल रूप से उपभोक्ताओं को असुरक्षित या दूषित भोजन से बचाने के लिए बनाए जाते हैं। हर देश को अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक नियम लागू करने का अधिकार है। समस्या तब पैदा होती है जब नियम पारदर्शी न हों, जोखिम से ज्यादा सख्त हों या अलग-अलग देशों के उत्पादों पर असमान तरीके से लागू किए जाएं।
विश्व व्यापार व्यवस्था में ऐसे नियमों को सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी उपाय कहा जाता है। ये भोजन, पशुओं और पौधों को रोग, कीट और हानिकारक पदार्थों से बचाने से जुड़े होते हैं। यदि कोई देश विज्ञान आधारित कारण के बिना अत्यधिक प्रतिबंध लगाता है तो निर्यातक देश इसे व्यापार बाधा के रूप में चुनौती दे सकता है।
GTRI का सुझाव है कि भारत को केवल विदेशी नियमों का विरोध नहीं करना चाहिए। पहले अपनी घरेलू व्यवस्था मजबूत करनी होगी, उल्लंघनों के विश्वसनीय आंकड़े जुटाने होंगे और उसके बाद द्विपक्षीय बातचीत या विश्व व्यापार संगठन जैसे मंचों पर गैर-वैज्ञानिक प्रतिबंधों के खिलाफ तथ्य आधारित मामला रखना होगा।
किसानों के लिए बदल सकती है पूरी उत्पादन व्यवस्था
यूरोपीय बाजार में निर्यात बढ़ाने के लिए भारतीय किसानों को फसल उत्पादन के शुरुआती चरण से ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप काम करना होगा। केवल बंदरगाह पर अंतिम नमूने की जांच पर्याप्त नहीं होगी।
किसानों को अनुमोदित कीटनाशकों, सही मात्रा, छिड़काव रिकॉर्ड, खेत की पहचान और फसल कटाई से पहले प्रतीक्षा अवधि का पालन करना पड़ेगा। निर्यातकों को किसानों से नियमित अनुबंध, डिजिटल रिकॉर्ड और अलग-अलग बाजारों के हिसाब से उत्पादन समूह बनाने पड़ सकते हैं।
इस प्रक्रिया से शुरुआती लागत बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में उत्पाद की गुणवत्ता, किसानों की आय और भारतीय ब्रांड की विश्वसनीयता बेहतर हो सकती है। घरेलू बाजार में भी बेहतर गुणवत्ता वाला भोजन उपलब्ध होगा।
समझौते का लाभ संतुलित रखने की चुनौती
India EU Trade Pact भारत के लिए दुनिया के सबसे बड़े और अधिक आय वाले बाजारों में पहुंच बढ़ाने का अवसर है। कम शुल्क से निर्यात प्रतिस्पर्धा बेहतर हो सकती है और यूरोपीय निवेश एवं तकनीक भारत आ सकती है। वहीं भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विदेशी उत्पाद और प्रतिस्पर्धी कीमतों का लाभ मिल सकता है।
दूसरी ओर कमजोर खाद्य जांच, निर्यात मानकों की जानकारी का अभाव और प्रयोगशालाओं की सीमित क्षमता भारत के लिए नुकसान का कारण बन सकती है। यदि यूरोपीय उत्पाद कम शुल्क पर भारत आएं, लेकिन भारतीय कृषि खेप गैर-अनुपालन के कारण वापस लौटती रहें तो व्यापार संतुलन कृषि क्षेत्र के खिलाफ जा सकता है।
इसलिए GTRI ने टैरिफ कटौती के साथ खाद्य सुरक्षा क्षमता, समान आयात जांच, किसानों के प्रशिक्षण और विदेशी नियमों की निगरानी को समझौते की सफलता से जोड़ा है।
निष्कर्ष
India EU Trade Pact भारत और यूरोपीय संघ के आर्थिक संबंधों में बड़ा बदलाव ला सकता है, लेकिन कृषि क्षेत्र के लिए इसकी सफलता केवल कम आयात शुल्क पर निर्भर नहीं करेगी। भारतीय उत्पादों को यूरोपीय मानकों के अनुरूप बनाने, खेत से बंदरगाह तक ट्रेसबिलिटी स्थापित करने और जांच प्रयोगशालाओं को मजबूत करने की जरूरत होगी।
इसके साथ ही भारत को आयातित भोजन की भी विज्ञान आधारित और जोखिम के अनुरूप सख्त जांच करनी होगी। GTRI की चेतावनी का मूल संदेश यही है कि मुक्त व्यापार का अर्थ कमजोर खाद्य सुरक्षा नहीं होना चाहिए। उपभोक्ताओं की सुरक्षा, किसानों की प्रतिस्पर्धा और व्यापार में पारस्परिकता को एक साथ आगे बढ़ाकर ही समझौते का संतुलित लाभ हासिल किया जा सकता है।
FAQ
1. GTRI ने भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते पर क्या सुझाव दिए हैं?
GTRI ने खेत से बंदरगाह तक ट्रेसबिलिटी, बेहतर कीटनाशक मार्गदर्शन, अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रयोगशालाएं, नियमित अवशेष जांच, मजबूत सरकारी प्रवर्तन और आयातित खाद्य पदार्थों की जोखिम आधारित जांच का सुझाव दिया है। उसने बदलते विदेशी नियमों की निगरानी के लिए एक विशेष Food-Safety Monitoring and Response Cell बनाने की भी मांग की है।
2. खाद्य सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत क्यों बताई गई है?
FTA के बाद यूरोपीय खाद्य उत्पादों के लिए भारतीय बाजार अधिक खुल सकता है। यदि भारत की जांच व्यवस्था कमजोर रही और भारतीय निर्यातक यूरोपीय नियमों का पालन नहीं कर पाए तो आयात बढ़ेगा, लेकिन भारतीय कृषि निर्यात सीमा पर अस्वीकार होते रह सकते हैं।
3. भारत-EU व्यापार समझौता क्या है?
यह भारत और यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता है। इसका उद्देश्य आयात शुल्क और दूसरी व्यापारिक बाधाएं कम करके वस्तुओं, सेवाओं और निवेश के आदान-प्रदान को बढ़ाना है। दोनों पक्षों ने 27 जनवरी 2026 को इसकी बातचीत पूरी की थी।
4. इस समझौते से भारत को क्या लाभ होगा?
भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजार में कम आयात शुल्क और बेहतर पहुंच मिल सकती है। इससे कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग, फार्मा, समुद्री उत्पाद और कृषि आधारित क्षेत्रों में निर्यात तथा रोजगार बढ़ने की संभावना है। लाभ की मात्रा अंतिम कानूनी प्रावधानों और कंपनियों द्वारा मानकों का पालन करने पर निर्भर करेगी।
5. खाद्य सुरक्षा मानकों का व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
मानक पूरे नहीं होने पर किसी खाद्य खेप को सीमा पर रोका, वापस भेजा, नष्ट या बाजार से वापस मंगाया जा सकता है। इससे निर्यातक को आर्थिक नुकसान होता है और भविष्य की खेपों की जांच अधिक सख्त हो सकती है। विज्ञान आधारित मानक उपभोक्ताओं की रक्षा करते हैं, लेकिन अनुचित नियम व्यापार बाधा बन सकते हैं।
6. GTRI क्या है?
GTRI यानी Global Trade Research Initiative नई दिल्ली स्थित आर्थिक और व्यापार नीति से जुड़ी शोध संस्था है। यह भारत के विदेशी व्यापार, मुक्त व्यापार समझौतों, आयात-निर्यात नीति और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम पर अध्ययन तथा नीतिगत सुझाव जारी करती है।

