India Edible Oil Imports: खाद्य तेल आयात पर बढ़ता खर्च बना चिंता, इस साल ₹1.75 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है बिल – जानिए क्या है मामला?

India Edible Oil Imports

India Edible Oil Imports: उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) का अनुमान है कि अक्टूबर 2026 में समाप्त होने वाले मौजूदा तेल विपणन वर्ष (Marketing Year) में भारत का खाद्य तेल आयात बिल लगभग 9 प्रतिशत बढ़कर ₹1.75 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष यह बिल लगभग ₹1.61 लाख करोड़ था।

SEA के अध्यक्ष संजीव अस्थाना ने सदस्यों को लिखे पत्र में कहा कि भारत अपने खाद्य तेल क्षेत्र में एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है और बढ़ता आयात बिल देश के लिए चेतावनी का संकेत है। उनके अनुसार यह केवल आयात का आंकड़ा नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा का बाहर जाना है, जिसे देश के कृषि ढांचे और तिलहन उत्पादन को मजबूत करने में लगाया जा सकता था।

बढ़ती आयात निर्भरता ने बढ़ाई चिंता

भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है और अपनी कुल जरूरत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। पिछले दो दशकों में देश में खाद्य तेल की खपत तेजी से बढ़ी, लेकिन घरेलू तिलहन उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ सका। यही वजह है कि हर साल आयात पर निर्भरता लगातार बनी हुई है।

SEA के अनुसार मौजूदा तेल विपणन वर्ष के पहले आठ महीनों (नवंबर 2025 से जून 2026) के दौरान भारत ने 103.88 लाख टन खाद्य तेल आयात किया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 97.29 लाख टन था। यानी आयात मात्रा में लगभग 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

इसी अवधि में आयात बिल भी ₹99,000 करोड़ से बढ़कर ₹1.19 लाख करोड़ पहुंच गया। इससे साफ है कि केवल आयात मात्रा ही नहीं बढ़ी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों और रुपये की कमजोरी ने भी कुल खर्च बढ़ाया है।

 

रुपये की कमजोरी ने बढ़ाया आयात खर्च

SEA का कहना है कि भारतीय रुपये में आई कमजोरी भी आयात बिल बढ़ने का बड़ा कारण है। भारत खाद्य तेल का अधिकांश हिस्सा विदेशी मुद्रा में खरीदता है। जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

यानी यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर भी रहें, तब भी कमजोर रुपया आयात लागत बढ़ा देता है। यही कारण है कि इस साल आयात बिल में तेज वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।

 

मानसून और बुवाई ने बढ़ाई घरेलू उत्पादन की चिंता

रिपोर्ट के मुताबिक इस बार मौसम भी चिंता का विषय बना हुआ है। सामान्य से कम मानसून की आशंका और कई तिलहन उत्पादक राज्यों में बुवाई में हुई देरी घरेलू उत्पादन पर असर डाल सकती है।

17 जुलाई तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार खरीफ तिलहनों की बुवाई 147 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जबकि पिछले वर्ष इसी समय तक यह 155.7 लाख हेक्टेयर थी। यानी बुवाई का रकबा अभी भी पिछले साल की तुलना में काफी कम है।

हालांकि SEA ने यह भी स्पष्ट किया कि बुवाई में शुरुआती देरी का मतलब हमेशा कम उत्पादन नहीं होता। यदि आने वाले सप्ताहों में अच्छी बारिश होती है तो किसान तेजी से बुवाई पूरी कर सकते हैं और उत्पादन में सुधार संभव है।

फिर भी अगस्त और सितंबर के दौरान फूल आने (Flowering Stage) के समय कमजोर वर्षा रहने की आशंका चिंता बढ़ा रही है। यदि इस महत्वपूर्ण अवधि में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो तिलहन की पैदावार घट सकती है। इसका असर केवल खरीफ फसल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जलाशयों में पानी कम होने से रबी सीजन भी प्रभावित हो सकता है।

 

वैश्विक घटनाओं ने भी बढ़ाया दबाव

घरेलू परिस्थितियों के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियां भी भारत के लिए चुनौती बन रही हैं। SEA के अनुसार इंडोनेशिया अपने बायोडीजल कार्यक्रम का लगातार विस्तार कर रहा है। इससे बड़ी मात्रा में पाम ऑयल खाद्य उपयोग के बजाय ईंधन उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है।

जब वैश्विक बाजार में खाद्य उपयोग के लिए पाम ऑयल की उपलब्धता घटती है तो उसकी कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है। भारत पाम ऑयल का सबसे बड़ा आयातक है, इसलिए इसका सीधा असर भारतीय आयात बिल पर पड़ता है।

इसके अलावा भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री माल ढुलाई (Freight) का बढ़ा खर्च और बीमा प्रीमियम में वृद्धि ने भी खाद्य तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को अस्थिर बनाए रखा है। SEA का मानना है कि इन परिस्थितियों में भारत को अधिक मात्रा में आयात करना पड़ेगा और प्रत्येक टन के लिए पहले की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।

 

जुलाई से अक्टूबर के बीच और बढ़ सकता है आयात

उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि जुलाई से अक्टूबर के बीच भारत का खाद्य तेल आयात और बढ़ेगा। इसकी सबसे बड़ी वजह घरेलू सोयाबीन और सरसों की पेराई (Crushing) में आई कमी है।

SEA के कार्यकारी निदेशक बी. वी. मेहता ने बताया कि पिछले साल की फसल का अधिकांश स्टॉक लगभग खत्म हो चुका है। घरेलू तेल उत्पादन घटने से त्योहारी सीजन से पहले मांग पूरी करने के लिए आयात बढ़ाना जरूरी होगा।

उद्योग अधिकारियों के अनुसार जुलाई से अक्टूबर के बीच भारत हर महीने औसतन 15 लाख टन खाद्य तेल आयात कर सकता है। पूरे 2025-26 तेल विपणन वर्ष में कुल आयात 1.63 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि पिछले वर्ष यह लगभग 1.60 करोड़ टन था।

 

त्योहारी मांग भी बढ़ा रही है खरीद

भारत में अगस्त से नवंबर के बीच रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्रि, दशहरा, धनतेरस और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाइयों, स्नैक्स, नमकीन, रेस्तरां और घरेलू उपयोग के कारण खाद्य तेल की मांग सामान्य महीनों की तुलना में काफी बढ़ जाती है।

इसी मांग को देखते हुए रिफाइनर कंपनियां पहले से ही पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल की बड़ी मात्रा में खरीद कर रही हैं ताकि त्योहारी सीजन के दौरान आपूर्ति में किसी तरह की कमी न आए।

 

तेलहन क्रांति की जरूरत पर SEA का जोर

SEA अध्यक्ष संजीव अस्थाना का कहना है कि भारत के लिए अब “Oilseed Revolution” यानी नई तिलहन क्रांति की जरूरत पहले से कहीं अधिक हो गई है।

उनका मानना है कि यदि देश में सरसों, सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी, तिल और अन्य तिलहनों का उत्पादन तेजी से नहीं बढ़ाया गया तो आने वाले वर्षों में आयात पर निर्भरता और बढ़ेगी। इसका असर विदेशी मुद्रा भंडार, किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा तीनों पर पड़ेगा।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल बढ़ती खपत नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन और उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि सुनिश्चित करना है। यदि उत्पादन नहीं बढ़ा तो वैश्विक बाजार में थोड़ी-सी उथल-पुथल भी देश के आयात बिल और खाद्य तेल की कीमतों पर बड़ा असर डाल सकती है।

 

पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल की खरीद में तेजी

उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार जुलाई से अक्टूबर के बीच भारत में सबसे अधिक मांग पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल की रहने वाली है। रिफाइनर कंपनियां त्योहारी सीजन से पहले अपने स्टॉक बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर खरीदारी कर रही हैं।

सनविन ग्रुप (Sunvin Group) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संदीप बजोरिया के अनुसार अगस्त से नवंबर के बीच त्योहारों के कारण खाद्य तेल की खपत हर साल बढ़ जाती है। इसी वजह से कंपनियां पहले से ही पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल का आयात बढ़ा रही हैं ताकि बाजार में आपूर्ति बनी रहे।

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती खरीद से वैश्विक बाजार में पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल की कीमतों को भी समर्थन मिलेगा, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा वनस्पति तेल आयातक है।

 

किन देशों से आता है भारत का खाद्य तेल

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है। वहीं सोयाबीन ऑयल मुख्य रूप से अर्जेंटीना और ब्राजील से आता है, जबकि सनफ्लावर ऑयल की आपूर्ति मुख्य रूप से रूस और यूक्रेन से होती है।

हाल के महीनों में भारतीय कंपनियों ने खरीद के स्रोतों में भी विविधता लानी शुरू की है। उद्योग से जुड़े कारोबारियों के अनुसार अब दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कुछ देशों से भी पाम ऑयल खरीदा जा रहा है। वहीं सोयाबीन ऑयल की कुछ खेपें चीन और तुर्किये से भी मंगाई गई हैं। इसका उद्देश्य किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और बेहतर कीमतों पर खरीद सुनिश्चित करना है।

 

जुलाई में पाम ऑयल आयात में बड़ी छलांग का अनुमान

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक जुलाई महीने में भारत का पाम ऑयल आयात लगभग 54 प्रतिशत बढ़कर 7.5 लाख टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले पांच महीनों का सबसे ऊंचा स्तर होगा।

GGN Research के मैनेजिंग पार्टनर राजेश पटेल के अनुसार रिफाइनर कंपनियां लगातार खरीद बढ़ा रही हैं क्योंकि घरेलू स्टॉक घट रहे हैं और आने वाले महीनों में मांग बढ़ने वाली है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो भारत का कुल खाद्य तेल आयात भी जुलाई से अक्टूबर के बीच तेज गति से बढ़ेगा।

 

खाद्य तेल की कीमतों पर क्या पड़ सकता है असर

यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और रुपया कमजोर रहता है, तो भारत में खाद्य तेल की थोक कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

हालांकि खुदरा कीमतें केवल आयात लागत से तय नहीं होतीं। सरकार की आयात शुल्क नीति, घरेलू उत्पादन, कंपनियों का स्टॉक और बाजार में उपलब्धता जैसे कई अन्य कारक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।

फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयात लगातार महंगा होता है तो इसका असर धीरे-धीरे रसोई के बजट और खाद्य महंगाई (Food Inflation) पर भी दिखाई दे सकता है।

 

सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए क्या कर रही है

भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है। इनमें राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम (National Mission on Edible Oils–Oil Palm) और राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन (National Mission on Edible Oils–Oilseeds) प्रमुख हैं।

इन योजनाओं के तहत तिलहन फसलों का रकबा बढ़ाने, उच्च गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराने, आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने, उत्पादकता बढ़ाने और किसानों को बेहतर समर्थन देने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में खाद्य तेल आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। बेहतर बीज, सिंचाई, अनुसंधान, प्रसंस्करण क्षमता और किसानों को लाभकारी मूल्य जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत करना होगा, तभी आयात में वास्तविक कमी आ सकेगी।

 

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती

भारत की खाद्य तेल खपत लगातार बढ़ रही है, जबकि घरेलू उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पाया है। जनसंख्या वृद्धि, आय बढ़ने और खाद्य आदतों में बदलाव के कारण मांग लगातार ऊपर जा रही है।

यदि उत्पादन और उत्पादकता में तेज सुधार नहीं हुआ तो भारत को आने वाले वर्षों में और अधिक विदेशी खाद्य तेल खरीदना पड़ेगा। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ेगा और वैश्विक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर सीधे भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा।

SEA का मानना है कि मौजूदा स्थिति केवल एक साल की समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत के कृषि क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक चेतावनी है। यदि समय रहते तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए व्यापक कदम नहीं उठाए गए तो खाद्य तेल आयात बिल हर साल नए रिकॉर्ड बना सकता है।

 

FAQ

1. भारत का खाद्य तेल आयात बिल 9% बढ़ने की संभावना क्यों है?

SEA के अनुसार आयात मात्रा बढ़ने, रुपये के कमजोर होने, वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव, इंडोनेशिया के बायोडीजल कार्यक्रम और घरेलू उत्पादन की अनिश्चितता के कारण आयात बिल लगभग 9% बढ़कर ₹1.75 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।

 

2. SEA ने यह अनुमान किन आधारों पर लगाया है?

संगठन ने बढ़ते आयात, पहले आठ महीनों के आयात बिल, खरीफ बुवाई में कमी, वैश्विक आपूर्ति की स्थिति, कमजोर रुपये और त्योहारी मांग जैसे कारकों के आधार पर यह अनुमान जारी किया है।

 

3. भारत सबसे अधिक खाद्य तेल किस देश से आयात करता है?

भारत सबसे अधिक पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है। सोयाबीन ऑयल मुख्य रूप से अर्जेंटीना और ब्राजील से तथा सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आता है।

 

4. क्या खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी?

यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊंची रहती हैं और रुपया कमजोर बना रहता है तो खाद्य तेल की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि खुदरा कीमतें सरकार की नीति, घरेलू उत्पादन और बाजार की उपलब्धता पर भी निर्भर करती हैं।

 

5. पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल के आयात में क्या बदलाव आया है?

त्योहारी मांग और घरेलू स्टॉक घटने के कारण जुलाई से अक्टूबर के बीच पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल के आयात में तेजी आने का अनुमान है। जुलाई में पाम ऑयल आयात लगभग 7.5 लाख टन तक पहुंच सकता है।

 

6. घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार क्या कर रही है?

सरकार राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम और राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन जैसी योजनाओं के माध्यम से तिलहन उत्पादन, उत्पादकता, बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और किसानों को सहायता देकर खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रही है।