Sonam Wangchuk Call Off Fast : NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियों और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर अनशन कर रहे शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिन बाद भूख हड़ताल खत्म कर दी। वांगचुक ने 28 जून 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया था और 23 जुलाई की देर रात गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में इसे समाप्त किया। तारीखों की समावेशी गिनती के अनुसार उन्होंने अनशन के 27वें दिन जूस पिया। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में समाप्त हुए इस अनशन के बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक अपना आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।

नड्डा ने जूस पिलाया, वांगचुक ने शांति बनाए रखने की अपील की
सोनम वांगचुक उस समय गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती थे। गुरुवार देर रात जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह अस्पताल पहुंचे, जहां बातचीत पूरी होने के बाद वांगचुक ने जूस पीकर अपना अनशन समाप्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि विस्तृत बातचीत और देश में संभावित हिंसा को लेकर बनी चिंता के बाद उन्होंने यह फैसला लिया है। साथ ही अपने समर्थकों से सतर्क रहने और किसी भी तरह की हिंसा से दूर रहने की अपील की।

अनशन समाप्त होने के बाद वांगचुक ने कहा कि आगे की लड़ाई जारी रखने के लिए जीवित और स्वस्थ रहना जरूरी है। उनके सामने एक रास्ता अनशन जारी रखकर अपनी जान खतरे में डालने का था, जबकि दूसरा रास्ता बातचीत का अवसर देते हुए आंदोलन को दूसरे लोकतांत्रिक तरीकों से आगे बढ़ाने का था। सांसदों, समर्थकों और देशभर के लोगों की अपील के बाद उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

दो दिन की बातचीत के बाद बनी सहमति
वांगचुक के अनुसार सरकार के साथ लगातार दो दिनों तक बातचीत चली। उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दंडात्मक या प्रतिशोधात्मक कार्रवाई न हो। केंद्र की ओर से शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाने का भरोसा दिए जाने को अनशन समाप्त कराने वाली प्रमुख सहमतियों में शामिल बताया गया।
वांगचुक ने यह भी बताया कि पेपर लीक, सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता और परीक्षा संस्थाओं की जवाबदेही का मुद्दा संसद में उठाने को लेकर बातचीत हुई। आंदोलन से जुड़े पक्ष परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के कारण जान गंवाने वाले या आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों के लिए सहायता और मुआवजे की मांग भी उठा रहे हैं।
हालांकि सरकार की तरफ से जारी सार्वजनिक रिपोर्टों में सभी कथित आश्वासनों की विस्तृत शर्तें समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। सबसे स्पष्ट और स्वतंत्र रूप से पुष्ट आश्वासन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी छात्रों पर कानूनी प्रतिशोध नहीं लेने से संबंधित है। इसलिए संसद में चर्चा और मुआवजे को अंतिम सरकारी नीति मानने के बजाय बातचीत में बनी सहमति या आंदोलन पक्ष के दावे के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर नहीं बनी बात
सोनम वांगचुक और CJP आंदोलन की प्रमुख मांगों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा शामिल था। सरकार ने इस मांग पर कोई सहमति नहीं दी। वांगचुक ने बाद में स्पष्ट किया कि छात्रों की सुरक्षा और संवाद की शुरुआत उनके लिए तत्काल प्राथमिकता थी, इसलिए उन्होंने मंत्री का इस्तीफा अनशन समाप्त करने की अनिवार्य शर्त नहीं बनाया।
उनका तर्क था कि बाकी मांगों के लिए आंदोलन को दूसरे लोकतांत्रिक तरीकों से आगे बढ़ाया जा सकता है। इस्तीफे पर सहमति न बनने के बावजूद शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को संरक्षण और सरकार से बातचीत शुरू होना उनके फैसले के लिए पर्याप्त आधार बना।
वांगचुक का अनशन खत्म, CJP का प्रदर्शन जारी
सोनम वांगचुक के पीछे हटने के बाद भी छात्र आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है। कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने कहा है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार तक विरोध जारी रहेगा। केंद्र और CJP नेताओं के बीच औपचारिक बातचीत भी शुरू हुई, लेकिन आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि बातचीत का अर्थ प्रदर्शन समाप्त करना नहीं है।
CJP की शुरुआत इंटरनेट पर युवाओं की समस्याओं को व्यंग्यात्मक तरीके से उठाने वाले समूह के रूप में हुई थी। बाद में यह पेपर लीक, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और सरकारी जवाबदेही के मुद्दों पर बड़े युवा आंदोलन के रूप में उभरा। इसके संस्थापक अभिजीत दीपके बताए जाते हैं। मई 2026 तक यह समूह सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हो चुका था और बाद में इसके नेतृत्व में दिल्ली समेत कई शहरों में प्रदर्शन हुए।
CJP का पूरा नाम कॉकरोच जनता पार्टी
CJP का पूरा नाम Cockroach Janta Party, हिंदी में कॉकरोच जनता पार्टी है। यह नाम शुरू में व्यंग्य और विरोध के प्रतीक के रूप में अपनाया गया था। समूह खुद को परंपरागत राजनीतिक दल से अधिक युवाओं की समस्याएं उठाने वाला आंदोलन बताता रहा है। इसका विरोध केवल NEET तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकारी नौकरियों, बेरोजगारी और परीक्षा संस्थानों की जवाबदेही तक फैल गया।
कुछ रिपोर्टों में CJP के नाम का अलग विस्तार भी दिखाई देता है, लेकिन रॉयटर्स और AP जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय स्रोत इसे Cockroach Janta Party ही बताते हैं। इसलिए लेख में इसी नाम का इस्तेमाल किया गया है।
पेपर लीक से शुरू हुआ आंदोलन, बेरोजगारी तक पहुंची आवाज
CJP Protest की शुरुआत मेडिकल प्रवेश परीक्षा में कथित प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा परिणाम रद्द होने के बाद बढ़े आक्रोश से हुई। इस विवाद से करीब 20 लाख से अधिक अभ्यर्थी प्रभावित हुए। मामला सामने आने के बाद परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित करनी पड़ी, जिससे छात्रों और उनके परिवारों पर आर्थिक तथा मानसिक दबाव बढ़ा।
धीरे-धीरे यह विरोध केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहा। युवाओं ने सरकारी भर्ती में देरी, लगातार सामने आते पेपर लीक, पारदर्शिता की कमी, बेरोजगारी और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई न होने जैसे मुद्दे भी उठाने शुरू कर दिए। दिल्ली में हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे और संसद की ओर मार्च करने की कोशिश के दौरान पुलिस से टकराव भी हुआ।
28 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुई थी भूख हड़ताल
सोनम वांगचुक ने 28 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन Hunger Strike शुरू की। उनकी प्रमुख मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करना था।
अनशन के दौरान उनका वजन लगातार गिरा और स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। 16 जुलाई तक वे अनशन के 19वें दिन में पहुंच चुके थे। डॉक्टरों के अनुसार उनका लगभग नौ किलोग्राम वजन कम हो गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से उनकी स्वास्थ्य स्थिति की नियमित निगरानी कराने और जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने को कहा।
18 जुलाई को अनशन के 21वें दिन दिल्ली पुलिस उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध अस्पताल ले गई। पुलिस का कहना था कि बिगड़ती सेहत को देखते हुए यह कदम उठाया गया, जबकि आंदोलनकारियों और वांगचुक के परिवार ने इसे जबरन हटाए जाने के रूप में देखा।
बाद में उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल ले जाया गया, जहां केंद्रीय मंत्रियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने उनसे मुलाकात की। आखिरकार 23 जुलाई की देर रात, यानी अनशन के 26 दिन पूरे होने के बाद, उन्होंने जूस पीकर उपवास समाप्त किया।
विपक्षी सांसदों की अपील ने खोला बातचीत का रास्ता
विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों ने वांगचुक से अनशन समाप्त करने की अपील की थी। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, CPI(M), आम आदमी पार्टी और अन्य दलों के सांसदों ने उनकी मांगों के प्रति समर्थन जताया और भरोसा दिया कि परीक्षा प्रणाली में सुधार का मुद्दा संसद में उठाया जाएगा।
वांगचुक के अनुसार लगभग 65 सांसदों ने उनसे मुलाकात कर या संदेश भेजकर समर्थन दिया। शुरुआती संयुक्त अपील में करीब 55 सांसदों के हस्ताक्षर होने और बाद में यह संख्या बढ़ने की बात आंदोलन पक्ष ने कही। इस राजनीतिक समर्थन ने सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद की संभावना बढ़ाई।
AP की रिपोर्ट के अनुसार सांसदों की अपील, सरकार के मंत्रियों से हुई बैठक और देश में संभावित हिंसा की चिंता वांगचुक के अनशन समाप्त करने के प्रमुख कारण बने।
मोदी ने फास्ट-ट्रैक कोर्ट और सख्त कानून का दिया भरोसा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक मामलों में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट और सख्त कानून लाने की बात कही। सरकार का कहना है कि युवाओं की मेहनत और भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को समयबद्ध सजा दिलाई जाएगी। हालांकि आंदोलनकारी संगठनों ने केवल नई घोषणाओं के बजाय पिछले मामलों में दोषसिद्धि और संस्थागत सुधार की मांग की है।
वांगचुक के अनशन समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री ने उनके स्वास्थ्य को लेकर भी संदेश दिया। उन्होंने वांगचुक से डॉक्टरों की सलाह के अनुसार दिनचर्या अपनाने, खोया हुआ वजन फिर हासिल करने और स्वास्थ्य का ध्यान रखने का आग्रह किया।

आंदोलन की आगे की राह बातचीत और प्रदर्शन दोनों से तय होगी
Sonam Wangchuk Call Off Fast के बाद सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत का रास्ता खुला है। इसके बावजूद CJP ने राष्ट्रव्यापी विरोध वापस नहीं लिया है। आंदोलन का अगला चरण सरकार के लिखित निर्णय, संसद में होने वाली चर्चा, छात्रों पर दर्ज मामलों की स्थिति और शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही पर निर्भर करेगा।
CJP नेताओं के अनुसार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा अब भी उनकी केंद्रीय मांग है। सरकार ने इस पर झुकने का संकेत नहीं दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में बातचीत और Public Protest दोनों समानांतर चल सकते हैं।
लद्दाख के लिए भी लंबे समय से आंदोलन कर रहे वांगचुक
सोनम वांगचुक की पहचान केवल शिक्षा सुधारक और Climate Activist के रूप में नहीं है। वे लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा दिलाने के आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। मार्च 2024 में उन्होंने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने, राज्य का दर्जा देने, स्थानीय लोगों के लिए भूमि और रोजगार सुरक्षा तथा हिमालयी पर्यावरण बचाने की मांग को लेकर 21 दिन का उपवास किया था।
लद्दाख आंदोलन की मुख्य मांगें पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत जनजातीय और सांस्कृतिक संरक्षण, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार में सुरक्षा, भूमि अधिकार और क्षेत्र के नाजुक पर्यावरण की रक्षा रही हैं।
सितंबर 2024 में वांगचुक ने अपनी मांगों को लेकर लद्दाख से दिल्ली तक पदयात्रा की थी। दिल्ली सीमा पर उन्हें और उनके साथियों को हिरासत में लिया गया था। इस घटना के बाद Ladakh Statehood और संवैधानिक सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा में आया।
सितंबर 2025 में लेह में लद्दाख की मांगों को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़कने के बाद प्रशासन ने वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हिरासत में लिया था। केंद्र सरकार ने 14 मार्च 2026 को करीब 170 दिन बाद उनकी नजरबंदी रद्द कर दी और उन्हें रिहा किया।
शिक्षा सुधार से लेकर आइस स्तूप तक फैला वांगचुक का काम
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख में हुआ था। वे इंजीनियर, शिक्षा सुधारक, नवप्रवर्तक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उन्होंने लद्दाख में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को स्थानीय जरूरतों से जोड़ने के लिए काम किया और SECMOL की स्थापना से जुड़े।
उन्होंने 1987 में श्रीनगर स्थित रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, जिसे अब NIT श्रीनगर कहा जाता है, से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। बाद में उन्होंने फ्रांस के CRATerre से अर्थ आर्किटेक्चर का प्रशिक्षण लिया। वे कृत्रिम हिमनदों जैसे दिखने वाले ‘आइस स्तूप’ विकसित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने गए, जिनका उद्देश्य सर्दियों के पानी को जमा कर गर्मियों में खेती के लिए उपलब्ध कराना है।
उनके काम के लिए उन्हें 2002 में अशोक फेलोशिप, 2008 में रियल हीरोज अवॉर्ड, 2016 में रोलेक्स अवॉर्ड फॉर एंटरप्राइज, 2017 में ग्लोबल अवॉर्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर और 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फाउंडेशन ने उन्हें लद्दाख में शिक्षा सुधार और स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाले काम के लिए सम्मानित किया था।
भारत में पहले भी हुए लंबे और चर्चित अनशन
सोनम वांगचुक का 26 दिन का उपवास हाल के वर्षों के सबसे चर्चित आंदोलनों में शामिल है, लेकिन भारत में इससे कहीं अधिक लंबे अनशन भी हुए हैं। इनकी परिस्थितियां और स्वरूप अलग-अलग थे। कुछ अनशन पूर्ण उपवास थे, जबकि इरोम शर्मिला के मामले में उन्हें हिरासत में रखकर नाक की नली से तरल आहार दिया जाता रहा।
जतिन दास ने 1929 में लाहौर जेल में भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ भेदभाव और खराब सुविधाओं के विरोध में भूख हड़ताल की थी। 63 दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनकी शहादत ने जेलों में राजनीतिक कैदियों की स्थिति को स्वतंत्रता आंदोलन का बड़ा मुद्दा बना दिया।
पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल, जिन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से भी जाना जाता था, ने 2018 में गंगा संरक्षण और नदी के लिए मजबूत कानून की मांग को लेकर अनशन किया। 111 दिन बाद उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद गंगा संरक्षण की नीतियों और बांध परियोजनाओं पर बहस तेज हुई, लेकिन उनकी सभी प्रमुख मांगें लागू नहीं हुईं।
स्वामी निगमानंद ने हरिद्वार में गंगा किनारे अवैध खनन रोकने की मांग को लेकर 2011 में लंबा अनशन किया। करीब 115 दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद अवैध खनन और गंगा के पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।
भगत सिंह और उनके साथियों ने 1929 में जेल के भीतर भारतीय और ब्रिटिश कैदियों के बीच भेदभाव के खिलाफ लंबी भूख हड़ताल की। उनकी मांगों में बेहतर भोजन, स्वच्छ कपड़े, पढ़ने के लिए किताबें और राजनीतिक कैदियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार शामिल था। भगत सिंह के अनशन की अवधि को अलग-अलग स्रोतों में 116 दिन तक बताया जाता है। इस आंदोलन ने उनकी लोकप्रियता को पूरे देश में फैलाया और ब्रिटिश शासन पर जेल सुधारों का दबाव बनाया।
इरोम शर्मिला का 16 साल चला ऐतिहासिक आंदोलन
भारत के सबसे लंबे अनशन आंदोलन का उल्लेख इरोम शर्मिला के संदर्भ में किया जाता है। उन्होंने नवंबर 2000 में मणिपुर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम यानी AFSPA हटाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी और 9 अगस्त 2016 को इसे समाप्त किया।

उन्हें आत्महत्या के प्रयास के आरोप में बार-बार हिरासत में लिया गया और जीवित रखने के लिए नाक के रास्ते तरल आहार दिया जाता रहा। इस कारण उनका आंदोलन बिना किसी पोषण वाले लगातार सामान्य उपवास से अलग था, लेकिन यह आधुनिक भारत का सबसे लंबा राजनीतिक भूख हड़ताल आंदोलन माना जाता है।
उनका अनशन AFSPA को पूरी तरह समाप्त नहीं करा पाया, लेकिन पूर्वोत्तर में मानवाधिकार, सैन्य शक्तियों और जवाबदेही पर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बहस खड़ी करने में सफल रहा।
अनशन खत्म हुआ, लेकिन परीक्षा सुधार की लड़ाई बाकी
Sonam Wangchuk Call Off Fast सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बने गतिरोध में महत्वपूर्ण मोड़ है। वांगचुक ने छात्रों पर कार्रवाई रोकना और बातचीत का रास्ता खोलना तत्काल उपलब्धि माना है। दूसरी ओर CJP का कहना है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, निष्पक्ष जांच और परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार हुए बिना आंदोलन समाप्त नहीं होगा।
सरकार के लिए चुनौती केवल पेपर लीक करने वालों को पकड़ना नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि परीक्षा रद्द होने पर छात्रों को बार-बार आर्थिक और मानसिक नुकसान न उठाना पड़े, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो और जांच के परिणाम समय पर सार्वजनिक किए जाएं।
वांगचुक का अनशन समाप्त होने से उनके स्वास्थ्य पर मंडरा रहा तत्काल खतरा कम हुआ है, लेकिन परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही, Ladakh Movement और युवाओं की व्यापक नाराजगी जैसे मुद्दे अब भी India Politics के केंद्र में बने हुए हैं।
FAQ
1. सोनम वांगचुक ने अपना अनशन क्यों समाप्त किया?
वांगचुक ने सरकार से बातचीत शुरू होने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी छात्रों पर कानूनी प्रतिशोध नहीं लेने के भरोसे, सांसदों की अपील और देश में संभावित हिंसा की चिंता को देखते हुए अनशन समाप्त किया। उनका कहना था कि आगे की लड़ाई जारी रखने के लिए स्वास्थ्य और जीवन बचाना जरूरी है।
2. CJP का राष्ट्रव्यापी आंदोलन किस मुद्दे पर है?
CJP का आंदोलन NEET समेत प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, परीक्षा संस्थाओं की जवाबदेही, बेरोजगारी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहा है।
3. लद्दाख के लोगों की मुख्य मांगें क्या हैं?
लद्दाख आंदोलन की प्रमुख मांगों में पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा, स्थानीय लोगों के भूमि और रोजगार अधिकार तथा हिमालयी पर्यावरण का संरक्षण शामिल है।
4. सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच क्या बातचीत हुई?
बातचीत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कार्रवाई न करने, परीक्षा व्यवस्था की जवाबदेही, पेपर लीक पर कड़ी कार्रवाई और छात्रों से जुड़े मामलों में राहत जैसे मुद्दे उठाए गए। सरकार की ओर से सबसे स्पष्ट रूप से पुष्ट आश्वासन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कानूनी प्रतिशोध नहीं लेने का है।
5. क्या आंदोलन अब भी जारी रहेगा?
हां। सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त कर दिया है, लेकिन CJP ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और व्यापक परीक्षा सुधार तक विरोध जारी रखने की घोषणा की है।
6. CJP का पूरा नाम क्या है?
CJP का पूरा नाम Cockroach Janta Party, यानी कॉकरोच जनता पार्टी है। यह युवाओं का एक आंदोलन है, जो परीक्षा में कथित अनियमितताओं, बेरोजगारी और सरकारी जवाबदेही से जुड़े मुद्दे उठा रहा है।

