Trump New Tariffs : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत समेत 60 व्यापारिक साझेदारों से आयात होने वाले सामान पर 10% से 12.5% तक नया टैरिफ लागू कर दिया है। अमेरिका का आरोप है कि ये देश जबरन मजदूरी से बने सामान को अपनी सप्लाई चेन में आने से रोकने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। भारत को 10% टैरिफ वाले समूह में रखा गया है, जबकि चीन, इजराइल और कई दूसरे देशों पर 12.5% शुल्क लागू हुआ है। यह कार्रवाई अमेरिका के Trade Act, 1974 की Section 301 के तहत की गई है।
नई दरें अमेरिका के पूर्वी समय के अनुसार 24 जुलाई 2026 को रात 12:01 बजे लागू हुईं। ठीक उसी समय ट्रम्प प्रशासन का 150 दिनों के लिए लगाया गया अस्थायी 10% वैश्विक आयात शुल्क समाप्त हो गया। इसका अर्थ यह है कि भारत पर नया 10% शुल्क पुराने 10% टैरिफ के ऊपर नहीं जुड़ा। पुराने अस्थायी शुल्क की जगह अब Section 301 के तहत नया 10% टैरिफ लागू हुआ है।

भारत पर कुल शुल्क सीधे 20% नहीं हुआ
सबसे बड़ा भ्रम यही है कि अमेरिका ने भारत पर पहले से लागू 10% शुल्क के ऊपर एक और 10% टैरिफ लगा दिया है। ऐसा नहीं हुआ है। फरवरी 2026 में लगाया गया अस्थायी 10% वैश्विक सरचार्ज 24 जुलाई को खत्म हुआ और उसी समय भारत पर नया 10% Section 301 शुल्क लागू हो गया। इसलिए सामान्य रूप से टैरिफ का बेस स्तर 10% ही बना रहा।
हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि अमेरिका जाने वाले प्रत्येक भारतीय उत्पाद पर कुल शुल्क केवल 10% होगा। किसी सामान पर पहले से लागू सामान्य अमेरिकी आयात शुल्क, एंटी-डंपिंग ड्यूटी या किसी दूसरे कानून के तहत लगाया गया उत्पाद-विशेष शुल्क अलग से जुड़ सकता है। वास्तविक शुल्क उत्पाद के अमेरिकी सीमा शुल्क कोड के आधार पर तय होगा।
नई व्यवस्था का बड़ा अंतर इसकी अवधि है। पुराना 10% टैरिफ केवल 150 दिनों के लिए था, जबकि Section 301 के तहत लगाया गया शुल्क लंबी अवधि तक जारी रह सकता है। इसलिए भारतीय कंपनियों के लिए यह एक अस्थायी खर्च के बजाय लंबे समय की कारोबारी चुनौती बन सकता है।
60 देशों की जांच मार्च में शुरू हुई थी
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव यानी USTR ने राष्ट्रपति ट्रम्प के निर्देश पर 12 मार्च 2026 को 60 अर्थव्यवस्थाओं के खिलाफ अलग-अलग जांच शुरू की थी। जांच में यह देखा गया कि संबंधित देशों ने जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाया है या नहीं और मौजूद नियमों को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू किया जा रहा है या नहीं।
अप्रैल में सार्वजनिक सुनवाई हुई और 45 से ज्यादा सरकारों के साथ बातचीत की गई। जून में USTR ने निष्कर्ष दिया कि जांच के दायरे में आई सभी 60 अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों में किसी न किसी स्तर पर कमी है और इससे अमेरिकी कारोबार पर असर पड़ता है। प्रस्ताव पर 1,600 से ज्यादा लिखित टिप्पणियां मिलीं और जुलाई में 100 से ज्यादा गवाहों ने सुनवाई के दौरान अपनी बात रखी।
इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने 23 जुलाई को अंतिम आदेश जारी किया। नए टैरिफ 99.4% अमेरिकी आयात को दायरे में लेते हैं, लेकिन कई जरूरी उत्पादों को इससे बाहर रखा गया है।
भारत समेत 17 देशों पर सीधा 10% शुल्क
भारत के साथ अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, कनाडा, इक्वाडोर, अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला, होंडुरास, इंडोनेशिया, जॉर्डन, मलेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान, श्रीलंका, ब्रिटेन और त्रिनिदाद एवं टोबैगो को सीधे 10% टैरिफ वाले समूह में रखा गया है। भारत को शामिल करने पर इस सूची में कुल 17 अर्थव्यवस्थाएं हैं।
यूरोपीय संघ और ताइवान के लिए अलग फॉर्मूला अपनाया गया है। इनके किसी उत्पाद पर पहले से लागू सामान्य MFN शुल्क 10% से कम है तो नया Section 301 शुल्क जोड़कर कुल दर 10% तक की जाएगी। पहले से लागू शुल्क 10% या उससे अधिक है तो नया शुल्क नहीं जोड़ा जाएगा।
जापान, दक्षिण कोरिया और स्विट्जरलैंड के लिए इसी तरह कुल सीमा 12.5% रखी गई है। बाकी 38 अर्थव्यवस्थाओं पर सीधे 12.5% टैरिफ लगाया गया है।
भारत को 12.5% की जगह 10% क्यों मिला?
शुरुआती जांच के बाद भारत पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव था। उस समय अमेरिका का कहना था कि भारत में जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात को रोकने के लिए स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
USTR के शुरुआती निष्कर्ष सामने आने के बाद भारत ने ऐसे सामान के आयात पर रोक लगाने के लिए अपनी नीति में बदलाव किया। व्हाइट हाउस के अंतिम आदेश में कहा गया है कि भारत, कंबोडिया, ग्वाटेमाला, होंडुरास, श्रीलंका और त्रिनिदाद एवं टोबैगो ने forced labour से बने सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम उठाए। इसी कारण इन देशों को 12.5% के बजाय 10% समूह में रखा गया।
भारत को मिली 2.5 प्रतिशत अंक की राहत का अर्थ पूरी छूट नहीं है। अमेरिका का कहना है कि प्रतिबंध का केवल कागज पर होना पर्याप्त नहीं है। उसे प्रभावी तरीके से लागू करना, संदिग्ध सप्लाई चेन की जांच करना और नियम तोड़ने वाले आयात को रोकना भी जरूरी होगा।
इसलिए 10% टैरिफ भारत पर दबाव बनाए रखने का जरिया है। भविष्य में भारत नियमों को बेहतर तरीके से लागू करता है तो अमेरिकी प्रशासन शुल्क में बदलाव या इसे खत्म कर सकता है। राष्ट्रपति के आदेश में USTR को जरूरत के अनुसार टैरिफ, छूट और दूसरी शर्तों में संशोधन करने का अधिकार दिया गया है।
फोर्स्ड लेबर में केवल बंधुआ मजदूरी शामिल नहीं
फोर्स्ड लेबर यानी जबरन मजदूरी ऐसी स्थिति है, जिसमें किसी व्यक्ति से उसकी इच्छा के खिलाफ काम कराया जाता है। मजदूर को धमकी देना, हिंसा करना, वेतन रोकना, पहचान या यात्रा से जुड़े दस्तावेज जब्त करना, कर्ज के बदले काम कराना और नौकरी छोड़ने की आजादी न देना इसके उदाहरण हो सकते हैं।
इसमें प्रवासी मजदूरों से पासपोर्ट छीनकर काम कराना, बिचौलियों का कर्ज चुकाने के नाम पर वर्षों तक मजदूरी करवाना या नौकरी छोड़ने पर पुलिस कार्रवाई और हिंसा की धमकी देना भी शामिल हो सकता है।
अमेरिका का कहना है कि forced labour से बने उत्पादों की लागत कम होती है। इससे सही वेतन और श्रम नियमों का पालन करने वाली अमेरिकी कंपनियों को नुकसान होता है। USTR के मुताबिक यह मानवाधिकार उल्लंघन होने के साथ व्यापार को बिगाड़ने वाली गलत प्रथा भी है।
Section 301 ने ट्रम्प को नया कानूनी रास्ता दिया
Section 301 अमेरिका के Trade Act, 1974 का एक प्रावधान है। इसके तहत USTR किसी विदेशी सरकार की ऐसी नीति या कार्रवाई की जांच कर सकता है, जिसे अमेरिका के लिए अनुचित, भेदभावपूर्ण या उसके कारोबार को नुकसान पहुंचाने वाला माना जाता है।
जांच में गड़बड़ी मिलने पर अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है, आयात पर रोक लगा सकता है या दूसरे व्यापारिक कदम उठा सकता है। जांच के दौरान संबंधित देश से बातचीत की जाती है, कंपनियों और आम लोगों से टिप्पणियां मांगी जाती हैं और सार्वजनिक सुनवाई भी हो सकती है।
ट्रम्प प्रशासन ने यह रास्ता इसलिए चुना, क्योंकि फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन कानून के तहत लगाए गए पुराने व्यापक टैरिफ को खारिज कर दिया था। Section 301 के तहत पहले भी चीन पर बड़े पैमाने पर शुल्क लगाए जा चुके हैं और यह कानूनी रास्ता अदालतों में पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत माना जाता है।

भारत-अमेरिका वस्तु व्यापार 149 अरब डॉलर के पार
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है। USTR के 2025 के आंकड़ों के अनुसार दोनों देशों के बीच वस्तुओं का कुल व्यापार 149.4 अरब डॉलर रहा। अमेरिका ने भारत को 45.6 अरब डॉलर का सामान बेचा, जबकि भारत से 103.8 अरब डॉलर का सामान खरीदा। अमेरिका का भारत के साथ वस्तु व्यापार घाटा 58.2 अरब डॉलर रहा।
इस हिसाब से भारत का अमेरिका को वस्तु निर्यात भारतीय मुद्रा में करीब ₹9 लाख करोड़ के आसपास बैठता है, हालांकि वास्तविक राशि डॉलर-रुपया विनिमय दर के अनुसार बदलती रहती है। पुराने 2024 के आंकड़ों में कुल कारोबार लगभग ₹11 लाख करोड़ दिखाया गया था, लेकिन 2025 के ताजा आंकड़े इससे ज्यादा हैं।

भारत अमेरिका को दवाइयां, स्मार्टफोन और टेलीकॉम उपकरण, रत्न एवं आभूषण, पेट्रोलियम उत्पाद, कपड़े, मशीनरी, ऑर्गेनिक केमिकल और इंजीनियरिंग सामान बेचता है। अमेरिका से भारत कच्चा तेल, कोयला, मशीनरी, विमान और उनके पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक सामान तथा कीमती पत्थर खरीदता है।
कपड़ा और गारमेंट सेक्टर पर बढ़ेगा कीमत घटाने का दबाव
भारत का टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट उद्योग अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर है। नया 10% टैरिफ लगने से भारतीय कपड़े अमेरिका पहुंचने के बाद महंगे हो सकते हैं। अमेरिकी खरीदार इसका कुछ बोझ खुद उठा सकते हैं, ग्राहकों के लिए कीमत बढ़ा सकते हैं या भारतीय कंपनियों से रेट कम करने को कह सकते हैं।
छोटी और मध्यम भारतीय कंपनियों के लिए यह बड़ी चुनौती हो सकती है, क्योंकि उनके पास मुनाफा घटाने की गुंजाइश कम होती है। खरीदार किसी सस्ते देश से ऑर्डर लेने का विकल्प भी तलाश सकते हैं।
हालांकि बांग्लादेश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया और कंबोडिया जैसे भारत के कई प्रतिद्वंद्वी देशों पर भी 10% शुल्क लगाया गया है। इसलिए हर मामले में भारतीय कंपनियों का ऑर्डर दूसरे देश में चला जाए, यह जरूरी नहीं है।
अमेरिका बांग्लादेश, कंबोडिया, इंडोनेशिया और मलेशिया के लिए कपड़ा और गारमेंट से जुड़ा विशेष कोटा बनाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी कॉटन या टेक्सटाइल इनपुट खरीदने के आधार पर इन देशों को तय मात्रा में कुछ सामान बिना Section 301 शुल्क के भेजने की सुविधा मिल सकती है। यह व्यवस्था लागू होने पर भारतीय कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है।
जेम्स-ज्वेलरी में घट सकता है कंपनियों का मार्जिन
अमेरिका भारतीय हीरे, सोने के आभूषण और लैब में तैयार हीरों का बड़ा बाजार है। टैरिफ के कारण अमेरिकी बाजार में इनकी अंतिम लागत बढ़ सकती है।
अमेरिकी रिटेल कंपनियां भारतीय निर्यातकों से कीमत कम करने के लिए कह सकती हैं। इससे भारतीय कंपनियों का मुनाफा घट सकता है। जिन उत्पादों में दूसरे देशों से सप्लाई आसानी से मिल सकती है, उनमें ऑर्डर बदलने का खतरा ज्यादा होगा।
हालांकि हीरे और कुछ दूसरे उत्पादों को अमेरिकी आदेश में छूट भी दी गई है। इसलिए पूरे जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर पर समान 10% टैरिफ लगने की बात सही नहीं होगी। असर संबंधित उत्पाद के सीमा शुल्क कोड और छूट की सूची पर निर्भर करेगा।
लेदर, फुटवियर और हस्तशिल्प के लिए अमेरिकी बाजार अहम
भारत अमेरिका को जूते, चमड़े के बैग, बेल्ट, ग्लव्स, फर्नीचर, होम डेकोर और हस्तशिल्प उत्पाद निर्यात करता है। इन सेक्टरों में छोटे कारोबार और ज्यादा मजदूर जुड़े हुए हैं।
इन सामानों में कीमत बड़ा फैक्टर होती है। 10% शुल्क के बाद अमेरिकी खरीदार भारतीय सप्लायर से रेट कम करने की मांग कर सकते हैं। इससे खासकर छोटे निर्यातकों पर दबाव बढ़ेगा।
दूसरी ओर चीन और कई दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों पर 12.5% टैरिफ होने से भारतीय सामान को उनके मुकाबले 2.5 प्रतिशत अंक का फायदा मिल सकता है। इसलिए कुछ कंपनियों को नुकसान होने के साथ भारत को नए ऑर्डर मिलने की संभावना भी बनी रह सकती है।
इंजीनियरिंग और केमिकल सेक्टर में नए ऑर्डर पर असर
भारत अमेरिका को ऑटो पार्ट्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल उपकरण, औद्योगिक कलपुर्जे, केमिकल, डाई और प्लास्टिक से जुड़े कई सामान भेजता है। इन उत्पादों में सप्लायर बदलना कपड़े या सामान्य उपभोक्ता सामान के मुकाबले मुश्किल होता है।
पुराने कॉन्ट्रैक्ट तुरंत प्रभावित न भी हों, लेकिन नए सौदों में अमेरिकी कंपनियां भारतीय सप्लायर से कम कीमत मांग सकती हैं। जिन भारतीय उत्पादों की खास तकनीक, अच्छी गुणवत्ता या समय पर सप्लाई के कारण ज्यादा मांग है, वे टैरिफ का असर बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं।
कम मार्जिन वाले सामान्य इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए स्थिति मुश्किल हो सकती है। वहां कीमत बढ़ने पर खरीदार दूसरे देश की ओर जा सकते हैं।
कृषि और फूड प्रोडक्ट्स पर असर एक जैसा नहीं
भारत अमेरिका को मसाले, चावल, चाय, कॉफी, समुद्री उत्पाद, तैयार खाद्य पदार्थ और दूसरे कृषि उत्पाद भेजता है। नया शुल्क कुछ सामान की कीमत बढ़ा सकता है, लेकिन सभी कृषि और खाद्य उत्पाद इसके दायरे में नहीं हैं।
व्हाइट हाउस के आदेश में उन वस्तुओं को छूट देने का प्रावधान है, जिनकी अमेरिका में पर्याप्त सप्लाई नहीं है, जिन्हें दूसरे स्रोतों से खरीदना मुश्किल है या जिन पर शुल्क लगाने से अमेरिकी बाजार में कीमतों और उपलब्धता पर बड़ा असर पड़ सकता है।
रॉयटर्स के अनुसार तेल, गैस, खाद, कुछ खाद्य पदार्थ, विमान और उनके पुर्जे, जरूरी खनिज तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अलग टैरिफ वाले कुछ उत्पादों को नए शुल्क से छूट दी गई है।
इसलिए किसी भारतीय कृषि या फूड प्रोडक्ट पर वास्तविक असर जानने के लिए उसकी अलग श्रेणी और अमेरिकी टैरिफ कोड देखना जरूरी होगा।
दवा कंपनियों को मिल सकती है सीमित राहत
भारत अमेरिकी बाजार में जेनेरिक दवाओं का प्रमुख सप्लायर है। कम कीमत वाली भारतीय दवाएं अमेरिका के हेल्थ सिस्टम के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन पर व्यापक टैरिफ लगने से अमेरिकी मरीजों और अस्पतालों की लागत बढ़ सकती है।
अमेरिकी आदेश में जरूरी और घरेलू स्तर पर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होने वाले उत्पादों को छूट देने का प्रावधान है। इससे कुछ दवाओं और फार्मा कच्चे माल को राहत मिल सकती है। हालांकि पूरे फार्मा सेक्टर को अपने आप छूट प्राप्त मानना सही नहीं होगा।
हर दवा, मेडिकल उत्पाद और कच्चे माल पर शुल्क उसकी अलग सीमा शुल्क श्रेणी और छूट वाली सूची के आधार पर तय होगा।
टैरिफ भारत नहीं, अमेरिकी आयातक चुकाता है
अमेरिका में टैरिफ का भुगतान सबसे पहले सामान मंगाने वाली अमेरिकी कंपनी करती है। भारत सरकार या भारतीय निर्यातक सीधे अमेरिकी सीमा शुल्क विभाग को यह पैसा नहीं देते।
इसके बाद अमेरिकी आयातक के पास कई विकल्प होते हैं। वह सामान की कीमत बढ़ाकर अमेरिकी ग्राहक से पैसा वसूल सकता है, भारतीय कंपनी से कीमत कम करा सकता है, अपना मुनाफा घटा सकता है या दूसरे देश से सामान खरीद सकता है।
इसलिए टैरिफ का पूरा नुकसान केवल भारत को नहीं होता। इसका कुछ हिस्सा भारतीय निर्यातक, अमेरिकी आयातक और वहां का ग्राहक मिलकर उठाते हैं। आयातित सामान महंगा होने पर इसका असर अमेरिकी महंगाई पर भी पड़ सकता है।
चीन और इजराइल पर 12.5% टैरिफ
चीन और इजराइल को 12.5% वाले समूह में रखा गया है। USTR का कहना है कि इन देशों ने forced labour से बने सामान के आयात पर अमेरिका की अपेक्षा के अनुसार प्रभावी रोक नहीं लगाई है।
चीन के मामले में अमेरिका पहले से शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले कॉटन, टमाटर और सोलर पैनल जैसे उत्पादों की जांच करता रहा है। अमेरिका का आरोप है कि कुछ सप्लाई चेन में उइगर समुदाय से जबरन काम कराया जाता है। चीन इन आरोपों को खारिज करता है।
इजराइल पर लगाया गया शुल्क किसी युद्ध या एक खास उद्योग से सीधे जुड़ा नहीं है। उसे भी forced labour import rules से जुड़ी 60 अर्थव्यवस्थाओं की संयुक्त जांच के तहत 12.5% समूह में रखा गया है।
चीन पर यह नया टैरिफ पहले से लागू दूसरे अमेरिकी शुल्कों से अलग है। कुछ चीनी औद्योगिक उत्पादों पर ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौरान लगाए गए 25% तक के शुल्क पहले से लागू हैं। इसलिए कई चीनी उत्पादों पर कुल शुल्क 12.5% से कहीं ज्यादा हो सकता है।
भारत को कुछ क्षेत्रों में मिल सकता है फायदा
चीन और दूसरे देशों पर 12.5% शुल्क के कारण भारत को कुछ उत्पादों में 2.5 प्रतिशत अंक का तुलनात्मक फायदा मिल सकता है। किसी अमेरिकी कंपनी के पास भारत और चीन से समान कीमत पर सामान खरीदने का विकल्प हो तो कम टैरिफ के कारण भारतीय सामान ज्यादा आकर्षक बन सकता है।
यह फायदा इंजीनियरिंग सामान, केमिकल, टेक्सटाइल, लेदर और कुछ सामान्य मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों में मिल सकता है। हालांकि इसका लाभ तभी होगा, जब भारत की उत्पादन लागत, गुणवत्ता और सप्लाई समय दूसरे देशों के बराबर हो।
जिन सेक्टरों में भारत का मुकाबला बांग्लादेश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया या मलेशिया से है, वहां टैरिफ से कोई खास फायदा नहीं मिलेगा, क्योंकि इन देशों पर भी 10% शुल्क लागू है।
सभी भारतीय सामान पर टैरिफ नहीं लगेगा
US New Tariffs का दायरा बहुत बड़ा है, लेकिन हर उत्पाद पर शुल्क लागू नहीं होगा। अमेरिकी आदेश में कच्चे माल, जरूरी वस्तुओं, घरेलू स्तर पर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होने वाले उत्पादों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकने वाले सामान को छूट देने की व्यवस्था है।
तेल और गैस, खाद, कुछ फूड प्रोडक्ट्स, विमान और उनके पुर्जे, जरूरी खनिज तथा अमेरिका के Section 232 राष्ट्रीय सुरक्षा शुल्क के दायरे वाले ऑटो, स्टील, एल्युमीनियम और कॉपर जैसे उत्पाद नई ड्यूटी से बाहर रखे गए हैं।
अमेरिका ने छूट वाली सूची में करीब 471 और उत्पाद भी जोड़े हैं। इसलिए भारतीय कंपनियों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उनके हर सामान पर सीधे 10% शुल्क लगेगा। सही स्थिति उत्पाद के HTS कोड के आधार पर ही सामने आएगी।
सप्लाई चेन का पूरा रिकॉर्ड रखना होगा
नए टैरिफ के बाद भारतीय निर्यातकों को यह साबित करना पड़ सकता है कि उनके उत्पाद या कच्चे माल में जबरन मजदूरी का इस्तेमाल नहीं हुआ है। केवल अपनी फैक्ट्री में नियमों का पालन करना पर्याप्त नहीं होगा।
कॉटन, चमड़ा, कोको, रबर, पाम ऑयल, समुद्री खाद्य, खनिज और सोलर उपकरणों में कच्चा माल कई देशों और सप्लायरों से आता है। सप्लाई चेन के किसी स्तर पर forced labour का संदेह होने पर अमेरिकी अधिकारी शिपमेंट रोक सकते हैं या कंपनी से दस्तावेज मांग सकते हैं।
कंपनियों को सप्लायर की जानकारी, मजदूरों के वेतन रिकॉर्ड, काम के घंटे, भर्ती प्रक्रिया, कच्चे माल का स्रोत और श्रमिकों की सहमति से जुड़े प्रमाण रखने होंगे। बड़ी कंपनियां यह खर्च उठा सकती हैं, लेकिन छोटे निर्यातकों के लिए compliance की लागत बढ़ सकती है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर भी पड़ेगा असर
नया टैरिफ ऐसे समय आया है, जब दोनों देश व्यापार समझौते और बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दों पर बातचीत कर रहे हैं। अब forced labour नियमों का पालन, सप्लाई चेन की जांच और संदिग्ध आयात को रोकने की व्यवस्था भी बातचीत का अहम हिस्सा बन सकती है।

भारत को अमेरिका को यह दिखाना होगा कि नए नियम केवल कागज पर नहीं हैं। सीमा शुल्क विभाग संदिग्ध उत्पादों की पहचान कर सकता है, कंपनियों से रिकॉर्ड मांग सकता है और नियम तोड़ने वाले आयात को रोक सकता है।
यदि अमेरिका भारत की कार्रवाई से संतुष्ट होता है तो भविष्य में टैरिफ की समीक्षा संभव है। वहीं नियमों का पालन कमजोर रहने पर दबाव जारी रह सकता है।
वैश्विक व्यापार में बढ़ सकता है टकराव
60 व्यापारिक साझेदारों पर नए Import Tariffs लगने से Global Trade में अनिश्चितता बढ़ सकती है। ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और नॉर्वे समेत कई देशों ने अमेरिकी आरोपों और टैरिफ को गलत बताया है। कुछ देश अमेरिका के साथ बातचीत करेंगे, जबकि कुछ जवाबी कार्रवाई पर विचार कर सकते हैं।
यदि दूसरे देश अमेरिकी सामान पर भी टैरिफ लगाते हैं तो Trade War का खतरा बढ़ सकता है। इससे दुनियाभर की कंपनियों को सप्लाई चेन बदलनी पड़ सकती है और सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं।
अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई मानवाधिकार और सही व्यापारिक मुकाबले के लिए है। आलोचकों का आरोप है कि ट्रम्प प्रशासन forced labour जैसे गंभीर मुद्दे का इस्तेमाल अपना वैश्विक टैरिफ सिस्टम दोबारा खड़ा करने के लिए कर रहा है।
अमेरिका में भी बढ़ सकती हैं कीमतें
Donald Trump का दावा है कि टैरिफ से अमेरिकी कंपनियों को विदेश से आने वाले सस्ते सामान के मुकाबले सुरक्षा मिलेगी और घरेलू उत्पादन बढ़ेगा। लेकिन आयातित सामान पर शुल्क बढ़ने से अमेरिकी कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है।
कपड़े, जूते, ज्वेलरी, मशीनरी और रोजमर्रा के उत्पाद महंगे होने पर अमेरिकी ग्राहकों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। इससे US Economy में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
जिन अमेरिकी कंपनियों का उत्पादन विदेशी कच्चे माल या पुर्जों पर निर्भर है, उनकी लागत बढ़ने का खतरा ज्यादा होगा। इसलिए नए टैरिफ का असर केवल भारत, चीन या दूसरे निर्यातक देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
ओवरप्रोडक्शन के नाम पर आ सकते हैं और टैरिफ
ट्रम्प प्रशासन आने वाले हफ्तों में उन देशों पर भी कार्रवाई कर सकता है, जिन पर सरकारी मदद से जरूरत से ज्यादा उत्पादन करने और सस्ता सामान विश्व बाजार में बेचने का आरोप है।
इस जांच में चीन, यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको और वियतनाम जैसे बड़े व्यापारिक साझेदार शामिल हो सकते हैं। इसके बाद स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर उपकरण, केमिकल और दूसरे मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों पर नए शुल्क लगाए जा सकते हैं।
इसका अर्थ है कि forced labour से जुड़ा 10% टैरिफ भारत और दूसरे देशों के लिए अंतिम अमेरिकी व्यापारिक कार्रवाई नहीं हो सकता। आगे अलग जांच के आधार पर और उत्पादों पर शुल्क बढ़ने का खतरा बना हुआ है।
FAQ
1. डोनाल्ड ट्रम्प ने नए टैरिफ क्यों लगाए हैं?
ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि 60 व्यापारिक साझेदार forced labour से बने सामान के आयात पर प्रभावी रोक नहीं लगा रहे हैं। अमेरिका इसे मानवाधिकार उल्लंघन और अमेरिकी कंपनियों के लिए गलत व्यापारिक मुकाबला मानता है। इसलिए Section 301 के तहत 10% से 12.5% तक शुल्क लगाया गया है।
2. भारत पर 10% टैरिफ लगाने का कारण क्या है?
अमेरिका ने भारत की पुरानी व्यवस्था को forced labour से बने सामान को रोकने के लिए कमजोर माना था। भारत ने बाद में ऐसे सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में नीति बदली। इसके कारण प्रस्तावित 12.5% टैरिफ घटाकर 10% कर दिया गया, लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन के लिए दबाव बनाए रखने को पूरी छूट नहीं दी गई।
3. चीन और इजराइल पर 12.5% टैरिफ क्यों लगाया गया?
USTR के अनुसार चीन और इजराइल ने forced labour से बने सामान के आयात को रोकने के लिए अमेरिका की अपेक्षा के अनुसार पर्याप्त और प्रभावी व्यवस्था नहीं बनाई। इसलिए दोनों को 12.5% वाले समूह में रखा गया।
4. इन टैरिफ का वैश्विक व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
टैरिफ से आयातित सामान महंगा हो सकता है, कंपनियां अपनी सप्लाई चेन बदल सकती हैं और देशों के बीच जवाबी शुल्क लगने का खतरा बढ़ सकता है। इससे Global Trade धीमा पड़ने और उपभोक्ता कीमतें बढ़ने की आशंका है।
5. भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर इसका क्या असर होगा?
भारतीय निर्यातकों की लागत और मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में forced labour नियमों का पालन, सप्लाई चेन की निगरानी और उत्पादों को मिलने वाली छूट महत्वपूर्ण मुद्दे बनेंगे।
6. क्या यह टैरिफ सभी उत्पादों पर लागू होंगे?
नहीं। तेल, गैस, खाद, कुछ खाद्य वस्तुओं, विमान और उनके पुर्जों, जरूरी खनिजों तथा कुछ दूसरे उत्पादों को छूट दी गई है। किसी भारतीय सामान पर वास्तविक शुल्क उसके अमेरिकी सीमा शुल्क कोड और छूट की सूची के आधार पर तय होगा।

