Kusha Interceptor: क्या भारत को मिल गया S-400 का स्वदेशी विकल्प? जानिए कितनी ताकतवर है ‘कुशा’ मिसाइल 

Kusha Interceptor

Kusha Interceptor: भारत ने स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली बनाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO ने 23 जुलाई 2026 को ओडिशा तट के पास एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से ‘कुशा’ लॉन्ग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया। परीक्षण के दौरान मिसाइल ने तेज गति और अधिक ऊंचाई पर उड़ रहे हवाई खतरे जैसे एक इलेक्ट्रॉनिक लक्ष्य को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक परीक्षण के सभी तय उद्देश्य पूरे हुए।

कुशा मिसाइल को लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों, ड्रोन, मानव रहित विमानों और बड़े सैन्य एयरक्राफ्ट जैसे हवाई खतरों से निपटने के लिए विकसित किया जा रहा है। यह प्रणाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के Mission Sudarshan Chakra के तहत बनने वाले देशव्यापी और कई स्तर वाले सुरक्षा कवच का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है। सरकार का लक्ष्य 2035 तक सार्वजनिक स्थानों और महत्वपूर्ण ठिकानों के लिए एक विस्तृत राष्ट्रीय सुरक्षा कवच तैयार करना है।

ओडिशा के तट से हुआ पहला सफल उड़ान परीक्षण

DRDO ने कुशा मिसाइल का परीक्षण एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किया। यह भारत का प्रमुख मिसाइल परीक्षण केंद्र है। इस उड़ान में किसी वास्तविक विमान या ड्रोन को निशाना नहीं बनाया गया। इसके बजाय एक इलेक्ट्रॉनिक टारगेट तैयार किया गया, जिसने तेज रफ्तार और अधिक ऊंचाई पर आने वाले हवाई हमले जैसी स्थिति बनाई।

मिसाइल प्रणाली ने उस इलेक्ट्रॉनिक खतरे का पता लगाया, उसकी उड़ान का रास्ता समझा और तय स्थान पर उसे सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया। रक्षा मंत्रालय ने इसे कुशा लॉन्ग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल का maiden flight-test यानी पहला उड़ान परीक्षण बताया है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता को भारतीय रक्षा अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली ऐसी मिसाइल प्रणाली बनाने की क्षमता दुनिया के केवल कुछ देशों के पास है। उनके मुताबिक कुशा कार्यक्रम भारत की विदेशी एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भरता कम करेगा और देश की हवाई सुरक्षा क्षमता में बड़ा बदलाव लाएगा।

रक्षा सचिव और DRDO अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने परीक्षण के दौरान गतिविधियों की निगरानी की। उन्होंने मिसाइल के विकास और परीक्षण से जुड़ी वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों की टीम को सफलता के लिए बधाई दी।

 

पहली उड़ान में किस मिसाइल का परीक्षण हुआ?

रक्षा मंत्रालय की आधिकारिक प्रेस रिलीज में परीक्षण की गई मिसाइल को केवल ‘कुशा लॉन्ग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल’ कहा गया है। आधिकारिक बयान में इसे M-1 नाम नहीं दिया गया और इसकी अधिकतम रेंज का भी खुलासा नहीं किया गया।

हालांकि रक्षा मामलों से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों में इसे कुशा M-1 इंटरसेप्टर का परीक्षण बताया गया है। Hindustan Times की रिपोर्ट के मुताबिक परीक्षण के दौरान इंटरसेप्टर ने करीब 120 किलोमीटर वाली उड़ान क्षमता दिखाई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके बाद 150 किलोमीटर और लगभग 400 किलोमीटर तक के दूसरे इंटरसेप्टरों का परीक्षण किया जाना है।

दूसरी ओर Project Kusha पर पहले प्रकाशित कई रिपोर्टों में तीन मुख्य इंटरसेप्टरों की प्रस्तावित रेंज करीब 150 किलोमीटर, 250 किलोमीटर और 350 से 400 किलोमीटर बताई गई है। इनमें M-1 को करीब 150 किलोमीटर, M-2 को लगभग 250 किलोमीटर और M-3 को 350–400 किलोमीटर की श्रेणी में रखा गया है।

इस अंतर का एक संभावित कारण यह है कि किसी शुरुआती परीक्षण में मिसाइल को उसकी पूरी डिजाइन रेंज तक नहीं उड़ाया जाता। 120 किलोमीटर परीक्षण की वास्तविक दूरी या उस विशेष उड़ान का टारगेट हो सकता है, जबकि करीब 150 किलोमीटर उसकी तय ऑपरेशनल क्षमता हो सकती है। हालांकि DRDO ने अभी आधिकारिक तौर पर यह अंतर स्पष्ट नहीं किया है।

 

तीन इंटरसेप्टर से तैयार होगा लंबी दूरी का कवच

Project Kusha को कई स्तर वाली लंबी दूरी की एयर डिफेंस प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य अलग-अलग दूरी और ऊंचाई पर आने वाले खतरे के लिए अलग इंटरसेप्टर उपलब्ध कराना है।

रक्षा रिपोर्टों के अनुसार इसका पहला संस्करण M-1 करीब 150 किलोमीटर तक के खतरे को निशाना बनाने के लिए विकसित किया जा रहा है। यह लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और दूसरे हवाई लक्ष्यों से मुकाबला कर सकेगा।

M-2 की प्रस्तावित रेंज करीब 250 किलोमीटर बताई गई है। इसकी भूमिका उन खतरों को अधिक दूरी पर रोकने की होगी, जो भारत के महत्वपूर्ण सैन्य या नागरिक ठिकानों की ओर बढ़ रहे हों।

सबसे लंबी दूरी वाला M-3 इंटरसेप्टर करीब 350 से 400 किलोमीटर तक काम कर सकता है। इसका इस्तेमाल बड़े विमान, हवाई निगरानी करने वाले एयरक्राफ्ट, जैमर विमान और दूसरी अधिक दूरी वाली हवाई धमकियों के खिलाफ किया जा सकता है।

इन तीनों इंटरसेप्टरों की अंतिम रेंज और पूरी क्षमता विकास परीक्षण, यूजर ट्रायल और सेना की जरूरतों के बाद ही आधिकारिक रूप से स्पष्ट होगी। फिलहाल DRDO ने पहले परीक्षण के साथ किसी संस्करण की पूरी तकनीकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

 

कुशा इंटरसेप्टर मिसाइल क्या है?

Kusha Interceptor Missile जमीन से दागी जाने वाली लंबी दूरी की एयर डिफेंस मिसाइल है। इसका काम किसी दुश्मन ठिकाने पर हमला करना नहीं, बल्कि भारत की ओर आ रहे हवाई खतरे को रास्ते में ही नष्ट करना है।

जब कोई लड़ाकू विमान, ड्रोन या क्रूज मिसाइल भारतीय सीमा या किसी महत्वपूर्ण ठिकाने की ओर बढ़ती है तो लंबी दूरी का रडार सबसे पहले उसका पता लगाता है। रडार से मिली जानकारी कमांड एवं कंट्रोल सेंटर तक पहुंचती है। वहां कंप्यूटर सिस्टम खतरे की गति, दिशा, ऊंचाई और संभावित निशाने का अनुमान लगाता है।

इसके बाद सही रेंज वाला कुशा इंटरसेप्टर लॉन्च किया जाता है। यह रडार और कमांड सेंटर से लगातार जानकारी लेकर लक्ष्य की ओर बढ़ता है और हवा में उसे नष्ट कर देता है।

कुशा केवल एक मिसाइल नहीं है। इसका पूरा सिस्टम इंटरसेप्टर मिसाइलों, लंबी दूरी के निगरानी रडार, फायर कंट्रोल रडार, मोबाइल लॉन्चर और कमांड-कंट्रोल सेंटर से मिलकर बनेगा। रक्षा मंत्रालय ने बताया है कि मिसाइल, रडार और कमांड एवं कंट्रोल सेंटर समेत इसके प्रमुख हिस्से DRDO की प्रयोगशालाओं और भारतीय उद्योग भागीदारों ने देश में ही विकसित किए हैं।

लड़ाकू विमान से ड्रोन तक कई खतरे होंगे निशाने पर

कुशा मिसाइल प्रणाली को अलग-अलग रेंज और ऊंचाई पर आने वाले हवाई खतरों से मुकाबला करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसमें सबसे प्रमुख खतरा दुश्मन के लड़ाकू विमान होंगे। लंबी दूरी पर इंटरसेप्शन की क्षमता होने से ऐसे विमानों को हथियार छोड़ने से पहले ही निशाना बनाने का मौका मिल सकता है।

दूसरा बड़ा खतरा क्रूज मिसाइलों का है। ये कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ सकती हैं और जमीन की बनावट का इस्तेमाल करके रडार से बचने की कोशिश करती हैं। इन्हें समय रहते पकड़ने के लिए मजबूत रडार नेटवर्क और तेज कमांड सिस्टम जरूरी होता है।

कुशा को UAV और बड़े ड्रोन के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। छोटे और बहुत सस्ते ड्रोन के खिलाफ महंगी लंबी दूरी की मिसाइल का इस्तेमाल व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन भारी हथियार वाले ड्रोन, हाई-एल्टीट्यूड UAV और लंबी दूरी के लड़ाकू ड्रोन इसके निशाने पर आ सकते हैं।

यह प्रणाली बड़े सैन्य विमानों को भी निशाना बना सकती है। इनमें हवा में ईंधन भरने वाले टैंकर विमान, खुफिया जानकारी जुटाने वाले विमान और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट शामिल हो सकते हैं।

 

क्या कुशा बैलिस्टिक मिसाइल भी रोक सकेगी?

कुशा को लेकर कुछ रिपोर्टों में इसे भारत के एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल कवच का हिस्सा बताया गया है। हालांकि रक्षा मंत्रालय की 23 जुलाई की आधिकारिक जानकारी में बैलिस्टिक मिसाइल को कुशा के लक्ष्य की सूची में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया। आधिकारिक बयान ने लड़ाकू विमान, मिसाइल, UAV और बड़े दुश्मन विमानों जैसे व्यापक हवाई खतरों का उल्लेख किया है।

रक्षा विशेषज्ञों की कुछ रिपोर्टों के अनुसार Project Kusha का मुख्य काम विमान, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे एयर-ब्रीदिंग खतरों को रोकना है। इसे भारत की पूरी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस व्यवस्था का सीधा विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

बैलिस्टिक मिसाइल बहुत अधिक ऊंचाई और तेज गति से अलग तरह के रास्ते पर उड़ती है। उन्हें रोकने के लिए भारत अलग Ballistic Missile Defence Programme के तहत पृथ्वी के वायुमंडल के अंदर और बाहर काम करने वाले विशेष इंटरसेप्टर विकसित कर रहा है।

भविष्य में कुशा की किसी मिसाइल को सीमित बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा क्षमता दी जा सकती है, लेकिन ऐसी क्षमता को तब तक पक्का नहीं माना जाना चाहिए, जब तक DRDO इसके परीक्षण और तकनीकी जानकारी आधिकारिक रूप से जारी न करे।

 

मिशन सुदर्शन चक्र में कुशा की अहम भूमिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2025 को लाल किले से Mission Sudarshan Chakra की घोषणा की थी। मिशन का उद्देश्य देश के महत्वपूर्ण सैन्य, नागरिक और रणनीतिक ठिकानों के लिए स्वदेशी और कई स्तर वाला सुरक्षा कवच तैयार करना है।

प्रधानमंत्री ने कहा था कि यह सुरक्षा व्यवस्था केवल हमले को रोकने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि तेजी और सटीकता के साथ जवाब देने की क्षमता भी मजबूत करेगी। सरकार ने 2035 तक सार्वजनिक स्थानों को विस्तृत देशव्यापी सुरक्षा कवच के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा है।

Mission Sudarshan Chakra किसी एक मिसाइल या रडार का नाम नहीं है। इसे एक बड़े नेटवर्क के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें देश के अलग-अलग रडार, सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी, कमांड सेंटर, एयर डिफेंस मिसाइलें, एंटी-ड्रोन सिस्टम और तीनों सेनाओं के हथियार आपस में जुड़े होंगे।

इस व्यवस्था में कम दूरी से लेकर लंबी दूरी तक अलग-अलग सुरक्षा परतें होंगी। बहुत पास आने वाले छोटे ड्रोन और हेलिकॉप्टर के लिए छोटी दूरी के हथियार होंगे। इसके बाद आकाश, MR-SAM और दूसरी मध्यम दूरी की प्रणालियां काम करेंगी। सबसे बाहर की लंबी दूरी वाली परत में S-400 और भविष्य में Project Kusha जैसी प्रणाली की भूमिका होगी।

80 से 400 किलोमीटर के बीच की कमी भरेगा कुशा

भारत के पास अलग-अलग रेंज वाली कई एयर डिफेंस प्रणालियां हैं। स्वदेशी आकाश मिसाइल और भारत-इजराइल की साझेदारी में विकसित MR-SAM मध्यम दूरी के खतरों से निपटती हैं। इनके बाद लंबी दूरी के लिए रूस से खरीदी गई S-400 प्रणाली मौजूद है।

Project Kusha का उद्देश्य मध्यम दूरी की भारतीय प्रणालियों और S-400 की सबसे लंबी दूरी वाली क्षमता के बीच की कमी को भरना है। इसके तीन इंटरसेप्टर कम से कम करीब 150 किलोमीटर से लेकर अधिकतम लगभग 400 किलोमीटर तक अलग-अलग सुरक्षा परत उपलब्ध करा सकते हैं।

इससे किसी खतरे के खिलाफ केवल एक ही प्रकार की महंगी मिसाइल पर निर्भरता कम होगी। यदि कोई लक्ष्य 150 किलोमीटर के भीतर है तो उसके लिए सबसे लंबी दूरी वाली 400 किलोमीटर श्रेणी की मिसाइल इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कम दूरी के लक्ष्य के लिए छोटा इंटरसेप्टर और अधिक दूरी के लक्ष्य के लिए बड़ा इंटरसेप्टर चुना जा सकेगा।

ऐसी व्यवस्था से मिसाइलों की लागत नियंत्रित करने और उपलब्ध भंडार का सही इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।

 

Operation Sindoor के बाद तेज हुई लंबी दूरी के सिस्टम की जरूरत

Operation Sindoor के दौरान भारत को ड्रोन, मिसाइल और घूमते हुए लक्ष्य तलाशने वाले loitering munition जैसे कई प्रकार के हवाई खतरों का सामना करना पड़ा था। भारत की कई स्तर वाली एयर डिफेंस व्यवस्था ने इन हमलों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सरकार की आधिकारिक जानकारी के अनुसार स्वदेशी Akashteer एयर डिफेंस कंट्रोल एंड रिपोर्टिंग सिस्टम ने अलग-अलग रडार और हथियार प्रणालियों से मिली जानकारी को जोड़कर आने वाले खतरों के खिलाफ कार्रवाई में अहम भूमिका निभाई। Akashteer स्वयं इंटरसेप्टर मिसाइल नहीं है। यह एक कमांड और कंट्रोल सिस्टम है, जो रडार से खतरे की जानकारी लेकर सही एयर डिफेंस हथियार को कार्रवाई का निर्देश देता है।

ऑपरेशन ने यह भी दिखाया कि भविष्य के युद्ध केवल लड़ाकू विमानों के बीच नहीं होंगे। दुश्मन दूर से दागी जाने वाली मिसाइल, सस्ते ड्रोन, स्वार्म ड्रोन और loitering munition का एक साथ इस्तेमाल कर सकता है।

ऐसी स्थिति में भारत को छोटे ड्रोन के लिए कम लागत वाली प्रणाली, मध्यम दूरी के लक्ष्यों के लिए आकाश और MR-SAM तथा दूर मौजूद लड़ाकू विमान या क्रूज मिसाइल के लिए कुशा और S-400 जैसी लंबी दूरी वाली व्यवस्था की जरूरत होगी।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में Operation Sindoor के दौरान पाकिस्तान की ओर से करीब 1,000 प्रोजेक्टाइल इस्तेमाल किए जाने का दावा किया गया है। हालांकि सरकार की उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में इस निश्चित संख्या की पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए इसे आधिकारिक आंकड़े के बजाय मीडिया रिपोर्ट का दावा ही माना जाना चाहिए।

 

ईरान युद्ध ने दिखाई मिसाइल और ड्रोन हमलों की नई तस्वीर

हाल के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में मिसाइल और ड्रोन का बड़े स्तर पर इस्तेमाल हुआ है। दूर बैठकर दागे जाने वाले ऐसे हथियार लड़ाकू विमान और सैनिकों को सीधे खतरे में डाले बिना सैकड़ों किलोमीटर दूर मौजूद ठिकानों को निशाना बना सकते हैं।

इन हमलों में एक साथ बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन और महंगी मिसाइलें भेजकर एयर डिफेंस सिस्टम को उलझाने की कोशिश की जाती है। यदि सुरक्षा व्यवस्था सीमित इंटरसेप्टरों पर निर्भर हो तो कई हमलों के बाद उसका मिसाइल भंडार कम हो सकता है।

भारत के लिए इसका सबक यह है कि केवल लंबी दूरी की महंगी मिसाइल बनाना काफी नहीं होगा। उसे रडार, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, लेजर, बंदूक आधारित एंटी-ड्रोन सिस्टम और अलग-अलग लागत वाले इंटरसेप्टरों का बड़ा नेटवर्क बनाना होगा।

Project Kusha इस व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की लंबी दूरी वाली परत को मजबूत करेगा, लेकिन छोटे और सस्ते ड्रोन रोकने के लिए इसके साथ कम लागत वाली दूसरी प्रणालियों की जरूरत बनी रहेगी।

 

लंबी दूरी का रडार बनेगा सिस्टम की आंख

किसी भी एयर डिफेंस मिसाइल की सफलता केवल उसकी मारक क्षमता पर निर्भर नहीं करती। सबसे पहले खतरे का समय पर पता लगना जरूरी है। यदि रडार बहुत देर से किसी मिसाइल या विमान को पकड़ता है तो इंटरसेप्टर को प्रतिक्रिया के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा।

Project Kusha के साथ लंबी दूरी वाले निगरानी रडार और फायर कंट्रोल रडार विकसित किए जा रहे हैं। निगरानी रडार दूर मौजूद कई हवाई लक्ष्यों का पता लगाएगा। फायर कंट्रोल रडार चुने गए लक्ष्य को अधिक सटीकता से ट्रैक करेगा और इंटरसेप्टर को उसकी दिशा में भेजेगा।

कमांड एवं कंट्रोल सेंटर पूरे ऑपरेशन का दिमाग होगा। यह तय करेगा कि सामने मौजूद लक्ष्य ड्रोन है, लड़ाकू विमान है या क्रूज मिसाइल। इसके बाद खतरे की दूरी और महत्व के अनुसार सही इंटरसेप्टर चुना जाएगा।

यदि कई दिशाओं से एक साथ हमला होता है तो कंप्यूटर सिस्टम हर लक्ष्य को प्राथमिकता देगा और उपलब्ध मिसाइलों को उसके अनुसार बांटेगा। यह क्षमता आधुनिक नेटवर्क आधारित युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण है।

 

सीमा पार लॉन्च का जल्दी पता लगाने की तैयारी

लंबी दूरी के रडार का लाभ यह है कि वे खतरे को भारतीय सीमा के करीब आने से काफी पहले पकड़ सकते हैं। यदि कोई दुश्मन विमान सीमा से दूर रहकर क्रूज मिसाइल दागता है तो रडार और दूसरे सेंसर उस लॉन्च या उड़ते हुए हथियार की पहचान कर सकते हैं।

जल्दी चेतावनी मिलने से वायुसेना को अपने लड़ाकू विमान उड़ाने, महत्वपूर्ण ठिकानों को अलर्ट करने और इंटरसेप्टर तैयार करने के लिए ज्यादा समय मिलता है।

Mission Sudarshan Chakra में जमीन पर मौजूद रडारों के साथ विमान, समुद्री जहाज और भविष्य में अंतरिक्ष आधारित सेंसर से मिलने वाली जानकारी को जोड़ने की योजना है। ऐसा नेटवर्क भारत के बड़े क्षेत्र में एक साझा हवाई तस्वीर तैयार कर सकता है।

 

क्या Kusha भारत का स्वदेशी S-400 है?

Project Kusha को अक्सर भारत का स्वदेशी S-400 कहा जाता है, क्योंकि दोनों प्रणालियां लंबी दूरी के रडार और अलग-अलग रेंज के इंटरसेप्टरों के जरिए कई स्तर वाली एयर डिफेंस उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई हैं।

इसके बावजूद दोनों को पूरी तरह एक जैसा मानना सही नहीं होगा। S-400 रूस की पहले से तैनात और युद्ध के लिए तैयार प्रणाली है। इसकी अलग मिसाइलें लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल और कुछ प्रकार के बैलिस्टिक लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती हैं।

कुशा अभी विकास और परीक्षण के चरण में है। इसकी पूरी क्षमता, वास्तविक ऑपरेशनल रेंज, एक साथ कितने लक्ष्यों को ट्रैक करने की योग्यता और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा क्षमता यूजर ट्रायल पूरे होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

कुशा का सबसे बड़ा लाभ इसका स्वदेशी होना होगा। भारत अपनी जरूरत के अनुसार इसमें बदलाव कर सकेगा, मिसाइलों का घरेलू उत्पादन बढ़ा सकेगा और मरम्मत या अतिरिक्त सप्लाई के लिए पूरी तरह विदेशी देश पर निर्भर नहीं रहेगा।

इसलिए इसे S-400 की हूबहू नकल या तुरंत उसका पूरा विकल्प कहने के बजाय भारत की अपनी लंबी दूरी की एयर डिफेंस प्रणाली कहना ज्यादा सही होगा।

 

S-400 और कुशा एक साथ करेंगे काम

भारत की योजना S-400 को तुरंत हटाकर उसकी जगह कुशा लगाने की नहीं है। दोनों प्रणालियां आने वाले वर्षों में एक साथ देश की लंबी दूरी वाली एयर डिफेंस को मजबूत कर सकती हैं।

भारत ने 2018 में रूस से पांच S-400 स्क्वाड्रन खरीदने का समझौता किया था। रूस ने बाकी प्रणालियों की डिलीवरी 2026–27 तक पूरी करने की बात कही थी। 2026 में चौथे स्क्वाड्रन के पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई और पांचवें की डिलीवरी बाकी बताई गई।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में पांचवां सिस्टम नवंबर 2026 में मिलने और रूस से पांच अतिरिक्त S-400 सिस्टम खरीदने पर काम होने का दावा किया गया है। भारत और रूस के बीच अतिरिक्त सिस्टम को लेकर बातचीत की रिपोर्ट जरूर सामने आई है, लेकिन नए पांच सिस्टम की अंतिम सरकारी मंजूरी और 280 मिसाइल खरीदने की संख्या की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें तय सौदा नहीं माना जा सकता।

S-400 भारत को तत्काल लंबी दूरी की सुरक्षा देता रहेगा, जबकि Project Kusha भविष्य में घरेलू उत्पादन और अधिक संख्या में तैनाती की सुविधा दे सकता है।

 

स्वदेशी सिस्टम से विदेशी निर्भरता होगी कम

लंबी दूरी की एयर डिफेंस प्रणाली खरीदना और उसका रखरखाव करना बेहद महंगा होता है। विदेश से खरीदे गए सिस्टम के लिए मिसाइल, स्पेयर पार्ट्स, सॉफ्टवेयर सहायता और मरम्मत में सप्लायर देश पर निर्भर रहना पड़ता है।

किसी युद्ध या अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध के समय सप्लाई में देरी भी हो सकती है। अपने देश में विकसित सिस्टम से भारत उत्पादन की रफ्तार अपनी जरूरत के अनुसार बढ़ा सकेगा।

कुशा में इस्तेमाल होने वाले रडार, कमांड एवं कंट्रोल सेंटर और मिसाइलों का विकास भारतीय संस्थानों और उद्योगों के साथ किया जा रहा है। इससे केवल सेना को नया हथियार नहीं मिलेगा, बल्कि देश में रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्रोपल्शन, गाइडेंस और मिसाइल निर्माण की तकनीक भी आगे बढ़ेगी।

घरेलू उत्पादन का दूसरा लाभ यह है कि मिसाइलों का बड़ा भंडार तैयार करना आसान हो सकता है। आधुनिक युद्ध में केवल सिस्टम की क्षमता नहीं, बल्कि उसके पास उपलब्ध इंटरसेप्टरों की संख्या भी महत्वपूर्ण होती है।

 

पहला परीक्षण सफल, अभी कई चरण बाकी

23 जुलाई का परीक्षण Project Kusha के विकास में महत्वपूर्ण सफलता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रणाली अब तुरंत सेना में शामिल होने के लिए तैयार है।

पहले अलग-अलग इंटरसेप्टरों के कई विकास परीक्षण किए जाएंगे। इनमें कम और अधिक ऊंचाई, अलग गति और अलग दिशा से आने वाले लक्ष्यों के खिलाफ मिसाइल की क्षमता जांची जाएगी।

इसके बाद रडार, लॉन्चर और कमांड सेंटर को जोड़कर पूरे हथियार सिस्टम का परीक्षण होगा। सिस्टम को एक साथ कई लक्ष्यों का पता लगाने और अलग-अलग मिसाइलों से उन्हें रोकने की क्षमता भी दिखानी होगी।

विकास परीक्षण सफल होने के बाद भारतीय वायुसेना यूजर ट्रायल करेगी। इन ट्रायल में सेना वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में सिस्टम की विश्वसनीयता, तैनाती का समय, रखरखाव और इस्तेमाल की प्रक्रिया जांचेगी।

सभी परीक्षण पूरे होने और सेना की मंजूरी के बाद ही बड़े स्तर पर उत्पादन तथा तैनाती शुरू हो सकेगी। इससे Project Kusha के चरणबद्ध तरीके से इस दशक के अंतिम वर्षों या उसके बाद सेवा में आने की संभावना बनती है।

 

आने वाले 12 महीनों में अगले परीक्षणों की तैयारी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार DRDO आने वाले लगभग 12 महीनों में Project Kusha से जुड़े दूसरे इंटरसेप्टरों के परीक्षण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसमें मध्यम और सबसे लंबी दूरी वाले संस्करणों की उड़ान जांच शामिल हो सकती है।

हालांकि रक्षा मंत्रालय ने अभी अगले परीक्षणों की तारीख, उनकी वास्तविक रेंज या लक्ष्य की प्रकृति का आधिकारिक कार्यक्रम जारी नहीं किया है। मिसाइल परीक्षणों की तारीख तकनीकी तैयारी, मौसम और सुरक्षा जरूरतों के कारण बदल सकती है।

अगले परीक्षणों में केवल मिसाइल की उड़ान नहीं, बल्कि रडार और कमांड सिस्टम के साथ उसका तालमेल भी महत्वपूर्ण होगा। लंबी दूरी के संस्करण को सफल बनाने के लिए लक्ष्य का जल्दी पता लगाना और उड़ान के दौरान इंटरसेप्टर को लगातार सही जानकारी देना जरूरी होगा।

 

Mission Sudarshan Chakra को मिली पहली बड़ी तकनीकी बढ़त

Kusha Missile का पहला सफल परीक्षण Mission Sudarshan Chakra के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देशव्यापी सुरक्षा कवच केवल घोषणा से तैयार नहीं हो सकता। इसके लिए अलग-अलग रेंज के स्वदेशी हथियारों, सेंसरों और कमांड नेटवर्क को वास्तविक परीक्षणों में सफल होना होगा।

कुशा की सफलता भारत को लंबी दूरी वाले एयर डिफेंस सिस्टम बनाने वाले चुनिंदा देशों के करीब ले जाती है। इस क्षेत्र में अमेरिका, रूस, चीन, इजराइल और कुछ यूरोपीय देशों के पास उन्नत प्रणालियां हैं।

भारत के पास पहले से आकाश, आकाश-NG, MR-SAM, QRSAM और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस से जुड़े कार्यक्रम हैं। Kusha Interceptor इन प्रणालियों के ऊपर लंबी दूरी की एक नई परत जोड़ सकता है।

 

FAQ

1. कुशा इंटरसेप्टर मिसाइल क्या है?

कुशा DRDO द्वारा विकसित की जा रही स्वदेशी लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली है। इसका इस्तेमाल लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, बड़े ड्रोन, UAV और दूसरे हवाई खतरों को जमीन से इंटरसेप्ट करने के लिए किया जाएगा।

 

2. मिशन सुदर्शन चक्र का उद्देश्य क्या है?

Mission Sudarshan Chakra का उद्देश्य अलग-अलग रेंज की मिसाइलों, रडार, एंटी-ड्रोन सिस्टम, कमांड सेंटर और तीनों सेनाओं के हथियारों को जोड़कर देशव्यापी सुरक्षा कवच तैयार करना है। सरकार ने 2035 तक सार्वजनिक और महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा बढ़ाने का लक्ष्य रखा है।

 

3. भारत तीन कुशा इंटरसेप्टर का परीक्षण क्यों करेगा?

अलग-अलग दूरी और ऊंचाई वाले खतरों के लिए अलग मिसाइल की जरूरत होती है। छोटे इंटरसेप्टर से पास के लक्ष्य और लंबी दूरी वाले इंटरसेप्टर से दूर मौजूद विमान या मिसाइल को निशाना बनाया जा सकेगा। इससे महंगी मिसाइलों का सही इस्तेमाल और कई स्तर वाली सुरक्षा संभव होगी।

 

4. कुशा मिसाइल प्रणाली की मारक क्षमता कितनी है?

DRDO ने 23 जुलाई के आधिकारिक बयान में परीक्षण की रेंज नहीं बताई। रक्षा रिपोर्टों में Project Kusha के तीन संस्करणों की प्रस्तावित रेंज करीब 150 किलोमीटर, 250 किलोमीटर और 350–400 किलोमीटर बताई गई है। पहली उड़ान को एक मीडिया रिपोर्ट ने करीब 120 किलोमीटर का परीक्षण बताया है।

 

5. क्या यह प्रणाली S-400 का स्वदेशी विकल्प मानी जाती है?

कुशा को अक्सर भारत का स्वदेशी S-400 कहा जाता है, लेकिन अभी दोनों की क्षमता समान मानना जल्दबाजी होगी। S-400 पहले से तैनात प्रणाली है, जबकि कुशा विकास के चरण में है। भविष्य में दोनों एक साथ भारत की लंबी दूरी वाली एयर डिफेंस को मजबूत कर सकते हैं।