Balen Shah India China: भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग मिलेंगे बालेन शाह, आखिर क्यों बदलना पड़ा अपना नियम? 

Balen Shah India China

Balen Shah Change Diplomatic Rule : नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह यानी बालेन शाह अपनी सरकार की शुरुआत में बनाए गए एक अहम कूटनीतिक नियम से पीछे हटने जा रहे हैं। नेपाली मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक बालेन शाह भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीन के राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। दोनों बैठकें एक ही दिन और एक के बाद एक रखने की तैयारी है, ताकि भारत और चीन में से किसी को भी यह संदेश न जाए कि नेपाल दूसरे देश को ज्यादा प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि बैठकों की सटीक तारीख अभी सार्वजनिक नहीं की गई है और नेपाल का विदेश मंत्रालय कार्यक्रम को अंतिम रूप दे रहा है।

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने के बाद शाह ने विदेशी राजदूतों और अपेक्षाकृत निचले स्तर के विदेशी अधिकारियों से व्यक्तिगत मुलाकात करने से दूरी बनाई थी। उनकी सरकार का संदेश था कि विदेश नीति निजी संपर्कों से नहीं, बल्कि विदेश मंत्रालय और तय सरकारी व्यवस्था के तहत चलाई जाएगी। अप्रैल में शाह ने भारत, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन समेत 17 देशों तथा संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों से एक साथ बैठक की थी। बाद में यूरोपीय संघ और दूसरे देशों के 23 राजदूतों तथा उप मिशन प्रमुखों से भी समूह में मुलाकात की गई थी।

भारत और चीन के राजदूतों के साथ प्रस्तावित बैठक को उनकी पुरानी नीति के पूरी तरह खत्म होने के बजाय उसमें व्यावहारिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। यह बताता है कि प्रचार के दौरान बनाई गई राजनीतिक छवि और सरकार चलाने की वास्तविक जरूरतें हमेशा एक जैसी नहीं होतीं।

भारत और चीन को एक ही दिन का समय

रिपोर्ट के अनुसार बालेन शाह भारत और चीन के राजदूतों से संयुक्त बैठक नहीं करेंगे। दोनों राजदूतों के साथ अलग-अलग बातचीत होगी, लेकिन मुलाकातें एक ही दिन और एक के बाद एक रखने की योजना है। इसका उद्देश्य दोनों पड़ोसी देशों के साथ समान व्यवहार का सार्वजनिक संदेश देना है।

नेपाल की भौगोलिक स्थिति इस फैसले को खास बनाती है। नेपाल की दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की सीमा भारत से लगती है, जबकि उत्तर में चीन है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने के कारण काठमांडू के हर बड़े कूटनीतिक कदम को भारत-चीन संतुलन के नजरिए से देखा जाता है।

यदि बालेन शाह पहले केवल भारतीय राजदूत से मिलते तो नेपाल के भीतर और चीन में यह सवाल उठ सकता था कि क्या काठमांडू नई दिल्ली की ओर झुक रहा है। इसी तरह केवल चीनी राजदूत को समय देने से भारत में गलत राजनीतिक संदेश जा सकता था। दोनों बैठकों को एक ही दिन रखकर शाह इस तरह की अटकलों को सीमित करना चाहते हैं।

यह वही संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति है, जिसका उल्लेख शाह ने विदेशी राजदूतों के साथ अपनी शुरुआती बैठकों में किया था। उन्होंने कहा था कि नेपाल के पड़ोसी और विकास साझेदारों के साथ संबंध आपसी सम्मान, संप्रभु समानता और साझा समृद्धि के सिद्धांत पर आधारित होंगे।

 

विदेश मंत्रालय को फिर केंद्र में लाना चाहते थे शाह

बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने से पहले नेपाल में विदेशी राजदूतों की शीर्ष नेताओं तक सीधी पहुंच लंबे समय से चर्चा का विषय रही थी। विदेशी राजदूत और अधिकारी कई बार प्रधानमंत्री, मंत्री और राजनीतिक दलों के नेताओं से उनके कार्यालय या निजी आवास पर अलग-अलग मुलाकात करते थे।

ऐसी बैठकों में विदेश मंत्रालय की भूमिका हमेशा स्पष्ट नहीं रहती थी। कई बार बातचीत का पूरा आधिकारिक रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं होता था। नेपाल के कुछ पूर्व राजनयिकों का मानना रहा है कि इससे विदेश नीति संस्थाओं के बजाय व्यक्तिगत संबंधों पर निर्भर होने लगती है।

नेपाल के पूर्व राजदूत शंभू राम सिमखड़ा ने कहा था कि पिछली सरकारों के दौरान नेताओं और राजदूतों के बीच अनौपचारिक तथा लगातार बैठकें होती थीं और कई बार विदेश मंत्रालय को दरकिनार कर दिया जाता था। उनके अनुसार इससे यह भी स्पष्ट नहीं रहता था कि विदेश नीति के लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार कौन है।

शाह सरकार ने इसी व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया। 8 अप्रैल को हुई समूह बैठक में नेपाल के विदेश सचिव अमृत बहादुर राय ने राजदूतों का स्वागत किया और सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में जानकारी दी। प्रधानमंत्री ने बाद में अपनी बात रखी। यह केवल बैठक की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि विदेश मंत्रालय की संस्थागत भूमिका दोबारा स्थापित करने का संकेत था।

 

अलग ‘रैंक प्रोटोकॉल’ का क्या मतलब था?

शाह सरकार की शुरुआती नीति के तहत प्रधानमंत्री विदेशी सरकारों के शीर्ष नेताओं और विदेश मंत्री स्तर के अधिकारियों से व्यक्तिगत मुलाकात कर सकते थे। लेकिन राजदूतों, सहायक मंत्रियों, उप-मंत्रियों और दूसरे अधिकारियों से बातचीत विदेश मंत्रालय की मौजूदगी, तय प्रोटोकॉल या समूह बैठक के माध्यम से की जानी थी।

इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि नेपाल में किसी विदेशी देश के राजदूत को केवल व्यक्तिगत पहुंच के आधार पर प्रधानमंत्री से विशेष व्यवहार नहीं मिलेगा। सरकार यह भी चाहती थी कि सभी महत्वपूर्ण बातचीत का आधिकारिक रिकॉर्ड रहे और नेपाल की विदेश नीति अलग-अलग नेताओं के निजी संदेशों के बजाय एक तय दिशा में चले।

नेपाल में राजनयिक आचार संहिता पहले से मौजूद है। 2011 से लागू इस दस्तावेज में विदेशी प्रतिनिधियों से मुलाकात के तौर-तरीकों और सरकारी अधिकारियों के आचरण से जुड़े नियम हैं। हालांकि नेपाली कूटनीतिक जानकारों के अनुसार पिछली सरकारों ने इसे नियमित और सख्त तरीके से लागू नहीं किया था। शाह सरकार ने मंत्रियों को इस कोड और विदेश नीति के प्रोटोकॉल पर औपचारिक जानकारी भी दिलाई।

इसी वजह से उनकी नीति को केवल किसी राजदूत से न मिलने का निजी फैसला नहीं, बल्कि नेपाल की विदेश नीति को व्यक्तिगत संपर्कों से निकालकर संस्थागत ढांचे में लाने की कोशिश माना गया।

 

17 राजदूतों को एक साथ बुलाकर दिया था पहला संदेश

प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद बालेन शाह ने 8 अप्रैल को काठमांडू में मौजूद 17 देशों और संगठनों के राजदूतों तथा मिशन प्रमुखों से एक साथ मुलाकात की। इनमें भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, सऊदी अरब, कतर, इजराइल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, मिस्र और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि शामिल थे।

इस बैठक के जरिए शाह सरकार ने साफ संदेश दिया कि वह किसी एक बड़े देश को शुरुआती व्यक्तिगत बैठक देकर विशेष प्राथमिकता नहीं देना चाहती। नेपाल में भारत, चीन और अमेरिका के बढ़ते प्रभाव के बीच तीनों के प्रतिनिधियों को एक ही मंच पर बुलाना संतुलन दिखाने का तरीका था।

बैठक में शाह ने नेपाली प्रवासी कामगारों की सुरक्षा, सुशासन, आर्थिक विकास और सभी देशों के साथ संतुलित संबंधों को सरकार की प्राथमिकता बताया। उन्होंने शांति को नेपाल की साझा प्राथमिकता बताया था।

इसके बाद 26 मई को यूरोपीय संघ तथा कई दूसरे देशों के 23 राजदूतों और उप मिशन प्रमुखों ने भी प्रधानमंत्री से संयुक्त मुलाकात की। इस बैठक में विदेश मंत्री, विदेश सचिव और प्रधानमंत्री के दूसरे सलाहकार मौजूद थे।

 

ADB अध्यक्ष से मुलाकात पहला अपवाद बनी

विदेशी अधिकारियों से व्यक्तिगत मुलाकात न करने की नीति में पहला सार्वजनिक अपवाद एशियाई विकास बैंक के अध्यक्ष मसातो कांडा के साथ बैठक थी। नेपाली मीडिया ने इसे शाह की किसी विदेशी अधिकारी के साथ पहली अलग बैठक बताया था। बैठक 7 जुलाई के आसपास प्रस्तावित थी और कांडा के साथ ADB के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहने वाले थे।

यहां यह समझना जरूरी है कि ADB किसी विदेशी सरकार का दूतावास नहीं, बल्कि एक बहुपक्षीय विकास बैंक है। नेपाल में उसकी कई विकास परियोजनाएं चलती हैं। इसलिए कांडा के साथ बैठक को किसी देश को राजनीतिक प्राथमिकता देने के बजाय विकास और निवेश से जुड़ी मुलाकात माना गया।

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने उस समय यह भी कहा था कि प्रधानमंत्री ने विदेशी अधिकारियों से मिलने या विदेश यात्रा पर कोई औपचारिक रोक नहीं लगाई है। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री जरूरत के आधार पर विदेशी नेताओं, अधिकारियों और राजनयिकों से मुलाकात करेंगे।

इस बयान से संकेत मिल गया था कि जिस नीति को बाहर से कठोर नियम माना जा रहा था, उसे सरकार जरूरत पड़ने पर लचीले तरीके से लागू कर सकती है।

 

विक्रम मिस्री का दौरा क्यों टला?

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री का मई 2026 में प्रस्तावित नेपाल दौरा स्थगित होना बालेन शाह की कूटनीतिक नीति से जुड़ा सबसे चर्चित मामला बना। मिस्री को 11 और 12 मई को काठमांडू जाना था। इस यात्रा के दौरान वह नई नेपाली सरकार की प्राथमिकताओं पर बातचीत करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से बालेन शाह को भारत यात्रा का निमंत्रण सौंपने वाले थे।

भारतीय पक्ष ने आधिकारिक रूप से मिस्री की दूसरी व्यस्तताओं को दौरा स्थगित होने की वजह बताया था। हालांकि नेपाल के विदेश मंत्रालय से जुड़े सूत्रों ने नेपाली मीडिया को बताया कि शाह ने विदेश सचिव स्तर के अधिकारी से व्यक्तिगत मुलाकात के लिए समय नहीं दिया था। भारत ने कथित रूप से कई बार बैठक का अनुरोध किया था।

इसके साथ भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख तथा मानसरोवर यात्रा मार्ग को लेकर चल रहे विवाद को भी एक संभावित कारण बताया गया। भारत की ओर से दौरा टालने की निश्चित वजह आधिकारिक रूप से नहीं बताई गई थी। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि शाह से बैठक तय न होना दौरा स्थगित होने की मीडिया में बताई गई संभावित वजहों में से एक था, न कि दोनों सरकारों द्वारा घोषित अंतिम कारण।

यह भी सही नहीं होगा कि भारत यात्रा का निमंत्रण पूरी तरह समाप्त हो गया था। जून में प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रबी लामिछाने से मुलाकात के दौरान कहा कि वह बालेन शाह को निमंत्रण भेज चुके हैं और नई दिल्ली में उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

 

अमेरिकी अधिकारियों को भी नहीं दिया अलग समय

बालेन शाह की नीति केवल भारत के अधिकारियों पर लागू नहीं हुई। नेपाली मीडिया के अनुसार उन्होंने अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री समीर पॉल कपूर और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के विशेष दूत सर्जियो गोर से भी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं की थी।

सर्जियो गोर अमेरिका के भारत में राजदूत होने के साथ दक्षिण और मध्य एशिया के लिए विशेष दूत की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे। अप्रैल में उनकी नेपाल यात्रा ऐसे समय हुई थी, जब अमेरिका और चीन दोनों काठमांडू की नई सरकार से संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे।

कपूर ने अपनी नेपाल यात्रा में वित्त मंत्री, विदेश मंत्री और सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष समेत कई नेताओं से मुलाकात की, लेकिन प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत बैठक नहीं हो पाई। इससे शाह सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की कि नियम किसी एक देश के खिलाफ नहीं है।

 

चीन के प्रतिनिधिमंडल को लेकर भी यही रुख

चीन से आए अधिकारियों के साथ शाह की व्यक्तिगत बैठक न होने की खबरें भी नेपाली मीडिया में सामने आईं। हालांकि चीन के उप वाणिज्य मंत्री या कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारी यान डोंग से मुलाकात न करने के विशेष दावे की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

इसीलिए इसे पक्की सरकारी घटना की तरह नहीं लिखा जा सकता। इतना जरूर स्पष्ट है कि शाह ने शुरुआती महीनों में चीन समेत सभी देशों के राजदूतों को समूह बैठक के माध्यम से संबोधित किया और किसी एक देश को व्यक्तिगत मुलाकात देकर विशेष संकेत देने से बचते रहे।

भारत और चीन के राजदूतों से अब अलग-अलग मिलने का प्रस्ताव इसी कारण एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

 

क्या बालेन शाह ने सचमुच अपना नियम तोड़ दिया?

तकनीकी रूप से देखें तो बालेन शाह की ओर से विदेशी राजदूतों से व्यक्तिगत बैठक पर लिखित और स्थायी सरकारी प्रतिबंध की सार्वजनिक घोषणा उपलब्ध नहीं है। यह उनकी सरकार की शुरुआती कार्यशैली और प्रोटोकॉल के रूप में सामने आया था।

नेपाल के विदेश मंत्री ने भी जुलाई में कहा था कि प्रधानमंत्री ने बैठकों पर कोई औपचारिक रोक नहीं लगाई और जरूरत के अनुसार वह विदेशी अधिकारियों से मिलेंगे।

इसलिए भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात को कानून या औपचारिक सरकारी आदेश तोड़ना कहना सही नहीं होगा। यह उनकी उस राजनीतिक और कूटनीतिक कार्यशैली से बदलाव है, जिसके तहत वह राजदूतों से अलग मिलने के बजाय समूह बैठक को प्राथमिकता दे रहे थे।

आम भाषा में इसे उनका अपना नियम बदलना कहा जा सकता है, लेकिन अधिक सटीक शब्दों में यह उनकी शुरुआती कूटनीतिक नीति में व्यावहारिक ढील है।

 

सरकार चलाने की जरूरत ने बदला कूटनीतिक तरीका

बालेन शाह ने काठमांडू के मेयर के रूप में खुद को नेपाल के पारंपरिक राजनीतिक नेताओं से अलग पेश किया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने वही छवि बनाए रखने की कोशिश की। विदेशी दूतों से व्यक्तिगत बैठक न करना उनके इसी संदेश का हिस्सा था कि नई सरकार पुरानी अनौपचारिक राजनीतिक व्यवस्था में काम नहीं करेगी।

लेकिन देश चलाने में केवल प्रतीकात्मक संदेश पर्याप्त नहीं होते। विदेश नीति में कई मुद्दे ऐसे होते हैं, जिन पर सीधे और गोपनीय स्तर पर विस्तार से बातचीत करनी पड़ती है। सीमा, व्यापार, ऊर्जा, सड़क, रेल, निवेश, सुरक्षा और लोगों की आवाजाही जैसे मुद्दों को हमेशा समूह बैठक में प्रभावी तरीके से नहीं संभाला जा सकता।

भारत और चीन जैसे पड़ोसियों के साथ राजदूत सरकारों के बीच मुख्य संपर्क का काम करते हैं। किसी बड़े निर्णय, प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा या संवेदनशील राजनीतिक विवाद से पहले राजदूत के साथ अलग बातचीत सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया है।

इसीलिए इस बदलाव को केवल दबाव में पीछे हटना कहना अधूरा होगा। यह राजनीतिक आदर्श और प्रशासनिक आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास भी हो सकता है।

 

भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार

भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और नेपाल को तीसरे देशों के साथ व्यापार के लिए प्रमुख समुद्री तथा जमीन आधारित पारगमन सुविधा भी देता है। भारतीय दूतावास के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तु व्यापार लगभग 9.38 अरब डॉलर रहा और नेपाल के कुल वस्तु व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब 62.3% थी।

नेपाल के निर्यात के लिए भी भारत सबसे बड़ा बाजार है। नेपाली वित्त वर्ष 2024-25 में नेपाल के कुल निर्यात का लगभग 81.1% भारत गया था।

दोनों देशों के बीच करीब 1,750 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। नेपाल और भारत के नागरिक सामान्य रूप से पासपोर्ट या वीजा के बिना दोनों देशों के बीच आ-जा सकते हैं। लाखों नेपाली नागरिक रोजगार, शिक्षा, इलाज और व्यापार के लिए भारत पर निर्भर हैं।

नेपाल का अधिकांश ईंधन भारत से आता है। नेपाल की अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था भी भारतीय बंदरगाहों और रेल नेटवर्क से जुड़ी है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच बिजली व्यापार, हाइड्रोपावर, सड़क, रेलवे और पेट्रोलियम पाइपलाइन से जुड़ी कई परियोजनाएं चल रही हैं।

इसलिए नेपाल का कोई भी प्रधानमंत्री भारत के साथ लंबे समय तक केवल औपचारिक दूरी बनाकर नहीं चल सकता।

 

चीन आर्थिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में अहम

नेपाल के लिए चीन का महत्व भी लगातार बढ़ा है। चीन नेपाल का उत्तरी पड़ोसी होने के साथ सड़क, एयरपोर्ट, ऊर्जा, संचार और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भागीदार है।

नेपाल चीन की Belt and Road Initiative से जुड़ा हुआ है। दोनों देशों के बीच सीमा पार सड़क, रेल संपर्क और व्यापारिक रास्तों को विकसित करने पर बातचीत होती रही है। हालांकि चीन-नेपाल रेलवे जैसी कई बड़ी परियोजनाएं अभी अध्ययन, योजना या शुरुआती चरण में हैं और उन्हें पूरा होने में समय लग सकता है।

नेपाल चीन से बड़ी मात्रा में मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपभोक्ता वस्तुएं आयात करता है। इसके साथ चीन नेपाल के पर्यटन और निवेश क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण है।

रणनीतिक रूप से चीन नेपाल से तिब्बत से जुड़े सुरक्षा मामलों और ‘एक चीन नीति’ पर स्पष्ट समर्थन चाहता है। नेपाल आधिकारिक तौर पर एक चीन नीति का समर्थन करता है और अपनी जमीन का इस्तेमाल चीन विरोधी गतिविधियों के लिए न होने देने की बात कहता रहा है।

इसलिए काठमांडू के लिए चीन से दूरी बनाना भी व्यावहारिक विकल्प नहीं है।

 

नेपाल की विदेश नीति में संतुलन इतना जरूरी क्यों?

नेपाल भारत और चीन के बीच स्थित एक छोटा, स्थलरुद्ध देश है। उसकी आर्थिक जरूरतें भारत से गहराई से जुड़ी हैं, जबकि विकास निवेश और रणनीतिक विकल्प के रूप में चीन का महत्व बढ़ा है।

नेपाल के राजनीतिक दल लंबे समय से भारत और चीन के साथ संतुलित संबंधों की बात करते रहे हैं। लेकिन नेपाल की घरेलू राजनीति में नेताओं पर अक्सर किसी एक देश की ओर झुकाव रखने के आरोप लगते हैं।

भारत के साथ ज्यादा करीबी दिखाने पर सरकार को नेपाल के भीतर राष्ट्रवादी आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। चीन के साथ अत्यधिक निकटता दिखाने पर भारत और पश्चिमी देशों में रणनीतिक चिंता बढ़ सकती है।

इसी कारण नेपाल के नेता प्रतीकों को भी गंभीरता से लेते हैं। पहली विदेश यात्रा किस देश की होगी, प्रधानमंत्री पहले किस राजदूत से मिलेंगे और किस देश के प्रतिनिधि को कितना समय दिया जाएगा—इन सभी बातों को कूटनीतिक संकेत की तरह देखा जाता है।

भारत और चीन के राजदूतों को एक ही दिन समय देना इसी संतुलन की राजनीति का हिस्सा है।

 

बैठक में किन मुद्दों पर हो सकती है चर्चा?

बैठकों का आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है। भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री की संभावित भारत यात्रा, सीमा से जुड़े मतभेद, व्यापार, बिजली निर्यात, रेल संपर्क, सड़क परियोजनाएं और लोगों के बीच संबंध प्रमुख विषय हो सकते हैं।

विक्रम मिस्री की स्थगित यात्रा और भारत की ओर से बालेन शाह को दिए गए निमंत्रण के बाद दोनों देशों को उच्चस्तरीय संपर्क का नया कार्यक्रम तय करना है। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही नेपाली नेतृत्व को भारत के साथ नए तरीके से संबंध आगे बढ़ाने का संदेश दे चुके हैं।

चीनी राजदूत के साथ व्यापार, निवेश, BRI परियोजनाएं, सीमा पार संपर्क, ऊर्जा, पर्यटन और उच्चस्तरीय यात्राओं पर बातचीत हो सकती है।

हालांकि किसी भी संभावित मुद्दे को बैठक में निश्चित रूप से शामिल मानना सही नहीं होगा, क्योंकि नेपाल सरकार ने बातचीत का औपचारिक एजेंडा जारी नहीं किया है।

 

भारत-नेपाल रिश्तों को मिल सकता है सकारात्मक संकेत

भारतीय राजदूत के साथ प्रधानमंत्री की अलग बैठक दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर सीधे संवाद की शुरुआत कर सकती है। पिछले कुछ महीनों में विक्रम मिस्री की यात्रा स्थगित होने, सीमा संबंधी बयान और लिपुलेख विवाद के कारण संबंधों में कुछ असहजता दिखाई दी थी।

मुलाकात का अर्थ यह नहीं होगा कि सभी विवाद समाप्त हो गए हैं। लेकिन इससे दोनों सरकारों को संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत का सीधा रास्ता मिलेगा।

बालेन शाह की भारत यात्रा की तैयारी भी इस बैठक के बाद आगे बढ़ सकती है। भारत पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुका है कि वह नेपाल को अपनी ‘Neighbourhood First’ नीति के तहत प्राथमिक साझेदार मानता है।

नेपाल की नई सरकार के लिए आर्थिक विकास सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में है। इसके लिए भारत के बाजार, निवेश, बिजली व्यापार और कनेक्टिविटी का इस्तेमाल किए बिना तेज आर्थिक प्रगति हासिल करना मुश्किल होगा।

 

चीन के साथ भी दूरी का संदेश नहीं देना चाहते शाह

भारत से मुलाकात के साथ उसी दिन चीनी राजदूत को समय देना इस बात का संकेत है कि शाह सरकार नई दिल्ली के साथ संबंध सुधारते हुए बीजिंग को नजरअंदाज नहीं करना चाहती।

नेपाल की सरकार पहले ही संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति की बात कर चुकी है। दोनों बैठकों का समान प्रारूप इसी नीति का सार्वजनिक प्रदर्शन होगा।

चीन नेपाल में अपना आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बनाए रखना चाहता है। भारत के साथ नेपाल की बढ़ती बातचीत पर बीजिंग की नजर रहती है। इसी तरह भारत भी नेपाल में चीन की बड़ी परियोजनाओं और रणनीतिक गतिविधियों को ध्यान से देखता है।

शाह एक देश से संबंध सुधारने के लिए दूसरे देश के साथ तनाव का जोखिम नहीं लेना चाहते। यही कारण है कि दोनों राजदूतों के साथ बैठक का समय और क्रम भी कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

 

चीन से जुड़े मुद्दों पर शाह का रुख

बालेन शाह ने अब तक चीन विरोधी या चीन समर्थक कोई स्पष्ट वैचारिक विदेश नीति सार्वजनिक नहीं की है। उनकी सरकार ने संतुलित और व्यावहारिक संबंधों की नीति अपनाने की बात कही है।

शाह सरकार के लिए चीन से जुड़े प्रमुख मुद्दों में निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, सीमा पार संपर्क, व्यापार घाटा और परियोजनाओं को समय पर पूरा करना शामिल हैं। इसके अलावा नेपाल एक चीन नीति का समर्थन जारी रखता है।

भारत और चीन से जुड़े सीमा तथा मानसरोवर यात्रा मार्ग के सवाल पर शाह सरकार ने आपत्ति जरूर जताई थी। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी उसके क्षेत्र हैं। भारत इस दावे को स्वीकार नहीं करता।

शाह के कुछ सीमा संबंधी बयानों पर नेपाल के भीतर भी विवाद हुआ है। इसके बावजूद उनकी सरकार ने आधिकारिक रूप से विवादों को कूटनीतिक बातचीत से सुलझाने की बात कही है।

 

बालेन शाह कौन हैं?

बालेंद्र शाह का जन्म 27 अप्रैल 1990 को हुआ। वह पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर हैं और राजनीति में आने से पहले रैपर तथा संगीत कलाकार के रूप में भी पहचान बना चुके थे।

वर्ष 2022 में वह स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में काठमांडू के मेयर चुने गए थे। उन्होंने नेपाल के स्थापित राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को हराकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।

काठमांडू के मेयर रहते हुए शाह ने अवैध निर्माण हटाने, शहरी सफाई, सरकारी जमीन खाली कराने और नगर प्रशासन को डिजिटल बनाने जैसे कदमों के कारण समर्थक और आलोचक दोनों बनाए।

मार्च 2026 के चुनाव के बाद उनकी राजनीतिक ताकत तेजी से बढ़ी और वह नेपाल के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने खुद को पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के विकल्प, युवा नेतृत्व और सुशासन के चेहरे के रूप में पेश किया।

प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सबसे बड़ी चुनौती मेयर वाली निर्णायक और व्यक्तिगत कार्यशैली को संसदीय सरकार, विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जटिल ढांचे के साथ जोड़ने की रही है।

 

नियम बदलना कमजोरी या व्यावहारिक राजनीति?

विपक्ष और आलोचक बालेन शाह के इस कदम को उनकी शुरुआती नीति की असफलता बता सकते हैं। उनका तर्क हो सकता है कि प्रधानमंत्री ने ऐसा नियम बनाया, जिसे लंबे समय तक लागू करना संभव ही नहीं था।

दूसरी ओर, सरकार समर्थक इसे लचीली और व्यावहारिक विदेश नीति कह सकते हैं। उनका मानना होगा कि शाह ने पहले विदेश मंत्रालय की भूमिका स्थापित की और अब जरूरत के आधार पर राजदूतों से सीधे बातचीत कर रहे हैं।

दोनों पक्षों के तर्क में कुछ आधार है। राजदूतों से अनियंत्रित निजी बैठकों पर रोक लगाना संस्थागत विदेश नीति के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन सभी व्यक्तिगत बैठकों से लंबे समय तक बचना भी किसी सरकार के लिए संभव नहीं है।

असली परीक्षा यह होगी कि नई बैठकों के दौरान विदेश मंत्रालय के अधिकारी मौजूद रहते हैं या नहीं, बातचीत का आधिकारिक रिकॉर्ड रखा जाता है या नहीं और बैठकें व्यक्तिगत संपर्क के बजाय सरकार की तय विदेश नीति के तहत होती हैं या नहीं।

यदि ये शर्तें पूरी होती हैं तो इसे पुरानी व्यवस्था की वापसी के बजाय ज्यादा व्यवस्थित कूटनीतिक संपर्क कहा जा सकता है।

 

FAQ

1. बालेन शाह ने अपनी कूटनीतिक नीति क्यों बदली?

प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने विदेश नीति को व्यक्तिगत संबंधों के बजाय विदेश मंत्रालय और सरकारी प्रोटोकॉल के तहत चलाने के लिए राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात करने से दूरी बनाई थी। भारत और चीन के साथ व्यापार, सीमा, निवेश और उच्चस्तरीय यात्राओं से जुड़े मुद्दों पर सीधे संवाद की जरूरत के कारण अब इस नीति में व्यावहारिक ढील दी जा रही है।

 

2. भारत और चीन को लेकर बालेन शाह का नया रुख क्या है?

शाह दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहते हैं। इसी कारण भारत और चीन के राजदूतों से बैठकें अलग-अलग होंगी, लेकिन उन्हें एक ही दिन आयोजित करने की तैयारी है। इससे किसी एक देश को अधिक महत्व देने का संदेश नहीं जाएगा।

 

3. बालेन शाह कौन हैं?

बालेंद्र शाह नेपाल के प्रधानमंत्री, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और पूर्व रैपर हैं। वह 2022 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में काठमांडू के मेयर बने थे। बाद में राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ताकत बढ़ी और मार्च 2026 के चुनाव के बाद वह प्रधानमंत्री बने।

 

4. नेपाल-भारत संबंधों पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?

भारतीय राजदूत से सीधे बातचीत से दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर का संपर्क बेहतर हो सकता है। इससे बालेन शाह की प्रस्तावित भारत यात्रा, व्यापार, ऊर्जा, सीमा, रेलवे और कनेक्टिविटी से जुड़े मामलों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

 

5. क्या चीन से जुड़े मुद्दों पर भी उन्होंने बयान दिया है?

शाह सरकार ने चीन को लेकर संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति की बात कही है। नेपाल एक चीन नीति का समर्थन करता है। चीन के साथ निवेश, व्यापार, BRI, सड़क और सीमा पार संपर्क जैसे विषय नेपाल की प्राथमिकताओं में शामिल हैं, लेकिन प्रस्तावित राजदूत बैठक का आधिकारिक एजेंडा अभी जारी नहीं हुआ है।