China Tariff Evasion: चीन का माल दूसरे देशों से अमेरिका पहुंचा, ट्रंप सरकार ने 40 से ज्यादा देशों पर लगाया टैरिफ चोरी का आरोप  – जानिए क्या है मामला?

China Tariff Evasion

US Accuses 40 Countries China Tariff Evasion: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति अब सिर्फ चीन तक सीमित नहीं रह गई है। ट्रंप प्रशासन ने 40 से ज्यादा देशों और यूरोपीय संघ पर आरोप लगाया है कि उनके रास्ते चीन के सामान को अमेरिका तक पहुंचाकर अमेरिकी टैरिफ से बचने की कोशिश की गई। अमेरिका ने इसे ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम’ नाम दिया है।

अमेरिकी सरकार के मुताबिक, चीन से आने वाले सामान को सीधे अमेरिका भेजने के बजाय तीसरे देशों के रास्ते भेजा गया। कई मामलों में सामान की पैकेजिंग या कागजों में उसके मूल देश यानी चीन की पहचान छिपाने की कोशिश की गई। इसका मकसद ऐसे देश का नाम दिखाना था, जहां से अमेरिका में सामान भेजने पर चीन की तुलना में कम टैरिफ देना पड़े।

व्हाइट हाउस का दावा है कि इस तरीके से करीब 60 अरब डॉलर के व्यापार पर टैरिफ से बचने की कोशिश हुई। हालांकि, रिपोर्ट में अलग-अलग सरकारी और निजी अनुमानों का हवाला देते हुए संभावित ट्रांसशिपमेंट का दायरा करीब 40 अरब डॉलर से 303 अरब डॉलर तक बताया गया है।

आखिर चीन पर टैरिफ चोरी का आरोप कैसे लगा?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए पहले ट्रांसशिपमेंट को समझना जरूरी है। मान लीजिए चीन में कोई सामान तैयार हुआ। अगर वह सामान सीधे अमेरिका जाता है तो उस पर चीन के लिए लागू ऊंचा अमेरिकी टैरिफ लग सकता है। लेकिन अगर वही सामान पहले किसी तीसरे देश में पहुंचता है और वहां से अमेरिका भेजा जाता है, तो कुछ परिस्थितियों में उस सामान पर तीसरे देश के हिसाब से अलग टैरिफ लागू हो सकता है। यहीं से विवाद शुरू होता है।

अमेरिका का आरोप है कि कुछ मामलों में तीसरे देश का इस्तेमाल सिर्फ रास्ता बदलने के लिए किया गया। यानी सामान की वास्तविक उत्पत्ति चीन ही रही, लेकिन कागजों और सप्लाई चेन के जरिए उसे दूसरे देश से आया हुआ दिखाने की कोशिश हुई।

इसे ही ट्रांसशिपमेंट यानी तीसरे देश के रास्ते सामान भेजना कहा जाता है। हालांकि हर ट्रांसशिपमेंट गैरकानूनी नहीं होता। वैश्विक सप्लाई चेन में कंपनियां सामान्य और वैध कारोबारी कारणों से भी दूसरे देशों के रास्ते सामान भेजती हैं। असली सवाल यह है कि क्या सामान की Country of Origin यानी वास्तविक उत्पत्ति को जानबूझकर गलत बताया गया।

अमेरिकी व्यापार नियमों में इसी वजह से Rules of Origin महत्वपूर्ण हैं। ये नियम तय करते हैं कि किसी उत्पाद को किस देश का उत्पाद माना जाएगा और उस पर कौन-सा टैरिफ लागू होगा।

 

अमेरिका की नजर में 40 से ज्यादा देश क्यों आए?

व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में कनाडा, मैक्सिको, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ समेत 40 से ज्यादा देशों को चीन के सामान के संभावित ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क से जोड़ा गया है।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन पर ऊंचे टैरिफ लगाए जाने के बाद उन देशों का महत्व बढ़ गया, जहां से अमेरिका में सामान भेजने पर अपेक्षाकृत कम शुल्क लगता है।

यानी अमेरिका के हिसाब से टैरिफ में पैदा हुआ अंतर ही कारोबारियों को रास्ता बदलने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

व्हाइट हाउस के व्यापार और मैन्युफैक्चरिंग नीति कार्यालय के प्रमुख पीटर नवारो ने आरोप लगाया कि चीन ने 2018 में पहली बड़ी अमेरिकी टैरिफ कार्रवाई के बाद से इस व्यवस्था को ज्यादा संगठित और जटिल बनाया है। उनके मुताबिक अब यह केवल सामान को दूसरे बंदरगाह से भेजने का मामला नहीं है, बल्कि एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बन चुका है।

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी देश को ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क में इस्तेमाल किया जाना और उस देश की सरकार द्वारा जानबूझकर चीन को टैरिफ चोरी में मदद करना एक ही बात नहीं है। यूरोपीय आयोग ने अमेरिकी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ट्रांसशिपमेंट का जोखिम वैध व्यापार प्रवाह में भी मौजूद होता है और रिपोर्ट में किसी देश का उल्लेख अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि वह अवैध ट्रांसशिपमेंट को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा देता है।

 

ट्रंप की टैरिफ नीति के लिए यह मामला इतना बड़ा क्यों है?

ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति का मूल उद्देश्य अमेरिकी बाजार में विदेशी सामान को महंगा करना और अमेरिकी कंपनियों को घरेलू उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना रहा है।

लेकिन अगर चीन पर ऊंचा टैरिफ लगा दिया जाए और वही सामान किसी दूसरे देश के रास्ते कम टैरिफ पर अमेरिका पहुंच जाए, तो अमेरिकी सरकार के हिसाब से पूरी नीति कमजोर पड़ जाती है।

यही वजह है कि नवारो ने ट्रांसशिपमेंट को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी समस्या बताया है। पहला नुकसान अमेरिकी ट्रेजरी को टैरिफ राजस्व के रूप में होता है और दूसरा अमेरिकी कंपनियों को, जिन्हें चीन से आने वाले सस्ते सामान के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

व्हाइट हाउस के ताजा अनुमान के मुताबिक ट्रांसशिपमेंट के कारण अमेरिका को सालाना करीब 19 अरब से 26 अरब डॉलर तक टैरिफ राजस्व का नुकसान हो सकता है।

 

अब अमेरिका सामान की असली पहचान AI से करेगा

ट्रंप प्रशासन ने इस समस्या से निपटने के लिए सिर्फ नए टैरिफ लगाने के बजाय कस्टम जांच को मजबूत करने की योजना बनाई है।

पीटर नवारो के मुताबिक अमेरिकी Customs and Border Protection यानी CBP अब ‘Detective Border’ नाम के AI सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है। इसका उद्देश्य सामान के रूट, उसकी घोषित उत्पत्ति, उत्पाद की संरचना और दूसरे व्यापारिक डेटा का विश्लेषण करके संदिग्ध मामलों की पहचान करना है।

यानी अगर किसी सामान को कागजों में किसी दूसरे देश का बताया गया है, लेकिन उसके सप्लाई चेन और उत्पाद की संरचना से चीन से संबंध दिखाई देता है, तो AI आधारित सिस्टम ऐसे मामलों को जांच के लिए चिन्हित कर सकता है।

अमेरिका का अनुमान है कि इस तरह की कार्रवाई से अरबों डॉलर का अतिरिक्त टैरिफ राजस्व जुटाया जा सकता है और अमेरिकी नौकरियों को भी फायदा होगा।

 

दूसरे देशों के साथ व्यापार समझौतों में भी अमेरिका ने कड़े नियम जोड़े

ट्रांसशिपमेंट रोकने की कोशिश केवल कस्टम विभाग तक सीमित नहीं है। अमेरिकी United States Trade Representative यानी USTR ने नए व्यापार समझौतों में भी ट्रांसशिपमेंट और Rules of Origin को लेकर कड़े प्रावधानों पर जोर दिया है।

Rules of Origin का काम यह तय करना है कि कोई उत्पाद वास्तव में किस देश में बना है। यह खास तौर पर तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब किसी उत्पाद में कई देशों से आए हुए हिस्से इस्तेमाल किए गए हों।

उदाहरण के लिए अगर किसी उत्पाद का बड़ा हिस्सा चीन में बनाया गया और बाद में दूसरे देश में केवल मामूली बदलाव किया गया, तो सिर्फ अंतिम चरण दूसरे देश में होने से जरूरी नहीं कि वह उत्पाद कानूनी रूप से उसी देश का माना जाए। इसके लिए अलग-अलग उत्पादों और व्यापार समझौतों के तहत तय नियम लागू होते हैं।

अमेरिका अब इन्हीं नियमों को और सख्त तरीके से लागू करना चाहता है।

USTR प्रमुख जैमीसन ग्रीर ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन जिन देशों के साथ टैरिफ और व्यापार समझौते करता है, उसका फायदा उन्हीं देशों को मिलना चाहिए। अमेरिका के मुताबिक किसी तीसरे देश के जरिए चीन के सामान को कम टैरिफ पर अमेरिकी बाजार में भेजना इन समझौतों का फायदा उठाने जैसा है।

 

भारत पर आरोप का मतलब क्या है?

अमेरिकी रिपोर्ट में भारत का नाम भी उन देशों में शामिल है, जिनके रास्ते चीन से जुड़े ट्रांसशिपमेंट का जोखिम बताया गया है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि अमेरिका ने भारत सरकार पर चीन के साथ मिलकर टैरिफ चोरी कराने का सीधा आरोप लगाया है।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और चीन के बीच पहले से ही बड़े स्तर पर व्यापार होता है और भारत खुद भी चीन से आने वाले कई उत्पादों पर अपनी व्यापार नीतियों और सीमा शुल्क व्यवस्था के तहत निगरानी रखता है।

अमेरिकी रिपोर्ट का असर यह हो सकता है कि भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में Country of Origin, सप्लाई चेन और उत्पाद में इस्तेमाल होने वाले चीनी कंपोनेंट्स से जुड़े दस्तावेज और ज्यादा स्पष्ट रखने पड़ें।

अगर अमेरिका आने वाले समय में नियमों को और सख्त करता है, तो ऐसे भारतीय कारोबारियों के लिए जोखिम बढ़ सकता है जिनकी सप्लाई चेन में चीन से बड़ी मात्रा में कच्चा माल या कंपोनेंट आता है।

दूसरी तरफ, अगर कोई भारतीय कंपनी वास्तव में भारत में पर्याप्त स्तर पर उत्पादन या मैन्युफैक्चरिंग करती है और नियमों के मुताबिक भारतीय मूल का दर्जा हासिल करती है, तो केवल चीन से किसी कंपोनेंट की मौजूदगी के आधार पर पूरे उत्पाद को अपने-आप चीनी उत्पाद नहीं माना जाता। Origin का फैसला संबंधित नियमों के तहत होता है।

 

यूरोप ने अमेरिका के आरोप पर क्या कहा?

यूरोपीय संघ ने अमेरिकी रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। यूरोपीय आयोग ने कहा कि वह अमेरिका के साथ रिपोर्ट को समझने के लिए बातचीत कर रहा है, लेकिन ट्रांसशिपमेंट का जोखिम सामान्य और वैध व्यापार प्रवाह में भी मौजूद होता है।

आयोग ने साफ किया कि रिपोर्ट में किसी देश या क्षेत्र का वर्गीकरण अपने-आप में यह आरोप नहीं माना जाना चाहिए कि यूरोपीय संघ अवैध ट्रांसशिपमेंट को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा देता है।

साथ ही EU ने कहा कि वह कस्टम फ्रॉड रोकने के अमेरिकी उद्देश्य से सहमत है और नियमित customs cooperation के जरिए अमेरिका के साथ काम करने को तैयार है।

 

चीन ने भी अमेरिका के आरोप को खारिज किया

चीन ने अमेरिकी टैरिफ कार्रवाई और चीन की कंपनियों को निशाना बनाने वाली अमेरिकी नीतियों का विरोध किया है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि trade wars have no winners यानी व्यापार युद्ध में किसी की जीत नहीं होती।

चीन ने यह भी कहा कि ट्रांसशिपमेंट से जुड़े किसी भी एकतरफा अमेरिकी कदम से तीसरे देशों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

इसका मतलब साफ है कि मामला सिर्फ चीन और अमेरिका के बीच टैरिफ का नहीं रह गया है। अब उन देशों की कंपनियां भी इसकी चपेट में आ सकती हैं जिनकी सप्लाई चेन चीन से जुड़ी हुई है।

 

ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात से पहले बढ़ा दबाव

इस पूरे घटनाक्रम का समय भी काफी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सितंबर में वॉशिंगटन में संभावित मुलाकात की तैयारी चल रही है।

Image: चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर के अलावा कई मुद्दों - जैसे साउथ चाइना सी, ताइवान, शिनजियांग और जासूसी के आरोपों - पर तनाव बढ़ रहा है। इसी बीच शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच संभावित मुलाकात की खबर आई है। | Credit: निकोलस असफौरी/AFP/गेटी इमेजेज

इससे पहले दोनों देशों के बीच टैरिफ को लेकर तनाव कम करने के लिए बातचीत और अस्थायी समझौतों की कोशिशें हुई थीं। लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच कई दूसरे मुद्दों पर टकराव जारी है।

अमेरिका चीन के rare earth exports को लेकर भी चिंतित है, जबकि चीन अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई नए प्रतिबंधों से नाराज है।

ऐसे में ट्रांसशिपमेंट का मुद्दा आने वाली अमेरिका-चीन बातचीत में एक और दबाव का कारण बन सकता है। सिंगापुर मैनेजमेंट यूनिवर्सिटी की अर्थशास्त्र विशेषज्ञ चांग पाओ ली के मुताबिक, वॉशिंगटन इस रिपोर्ट का इस्तेमाल बातचीत में अपनी bargaining position मजबूत करने के लिए कर सकता है।

 

असली लड़ाई सिर्फ टैरिफ की नहीं, सप्लाई चेन की है

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ सकता है। पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों ने चीन पर निर्भरता कम करने के लिए वियतनाम, भारत, मैक्सिको, मलेशिया और दूसरे देशों में उत्पादन बढ़ाया है।

इसका कुछ हिस्सा वास्तविक supply-chain diversification है, यानी कंपनियां सचमुच अपना उत्पादन दूसरे देशों में ले जा रही हैं। लेकिन अमेरिका को डर है कि इसी प्रक्रिया की आड़ में कुछ कंपनियां केवल सामान का रास्ता बदलकर चीन के ऊंचे टैरिफ से बच रही हैं।

यही अंतर आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण होगा।

अगर अमेरिका यह साबित करने में सफल रहता है कि बड़े पैमाने पर चीनी सामान सिर्फ कागजों में दूसरे देशों का दिखाकर अमेरिका पहुंचाया जा रहा है, तो वहां के कस्टम नियम और सख्त हो सकते हैं। इसका असर भारत समेत उन सभी देशों पर पड़ेगा जो चीन के साथ गहरी सप्लाई-चेन कनेक्टिविटी रखते हैं।

दूसरी तरफ, अगर हर ट्रांसशिपमेंट को संदेह की नजर से देखा गया तो इससे वैध वैश्विक व्यापार भी महंगा और जटिल हो सकता है। यही वजह है कि आगे की लड़ाई इस बात पर होगी कि कहां वैध व्यापार है और कहां वास्तव में टैरिफ चोरी।

 

FAQ

1. US ने 40 से ज्यादा देशों पर चीन की टैरिफ चोरी में मदद का आरोप क्यों लगाया?

अमेरिकी सरकार का आरोप है कि चीन के कुछ सामान को तीसरे देशों के रास्ते अमेरिका भेजा गया, ताकि चीन पर लागू ऊंचे टैरिफ से बचा जा सके। हालांकि, किसी देश का रिपोर्ट में शामिल होना अपने-आप में उसकी सरकार द्वारा अवैध गतिविधि में शामिल होने का प्रमाण नहीं है।

 

2. China Tariff Evasion क्या है?

इस संदर्भ में इसका मतलब ऐसी व्यवस्था से है जिसमें चीन में बने सामान की वास्तविक उत्पत्ति छिपाकर उसे किसी दूसरे देश से आया हुआ दिखाया जाए और इस तरह कम टैरिफ हासिल करने की कोशिश की जाए।

 

3. Donald Trump Tariffs से बचने के लिए China कौन-सा तरीका इस्तेमाल कर रहा है?

अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के सामान को तीसरे देशों के रास्ते भेजना, उसकी पैकेजिंग या कागजी दस्तावेजों में वास्तविक origin छिपाना और कम टैरिफ वाले देशों को अमेरिकी बाजार तक पहुंचने के रास्ते के रूप में इस्तेमाल करना प्रमुख तरीके हैं।

 

4. US ने किन देशों का नाम लिया है?

रिपोर्ट में 40 से ज्यादा देशों और EU का उल्लेख किया गया है। इनमें भारत, कनाडा, मैक्सिको, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदार शामिल हैं।

 

5. China Transshipment क्या होता है?

Transshipment का सामान्य अर्थ है किसी सामान को उसके अंतिम destination तक पहुंचने से पहले किसी तीसरे देश या स्थान के जरिए भेजना। यह अपने-आप में गैरकानूनी नहीं है; समस्या तब होती है जब इसका इस्तेमाल गलत country of origin बताकर टैरिफ से बचने के लिए किया जाए।

 

6. US-China Trade War में इसका क्या महत्व है?

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका की टैरिफ नीति तभी प्रभावी होगी जब चीनी सामान सीधे या तीसरे देशों के जरिए कम शुल्क पर अमेरिकी बाजार में पहुंचने से रोका जा सके। इसी कारण अमेरिका अब tariffs के साथ-साथ customs enforcement, AI monitoring और rules of origin को भी मजबूत कर रहा है।

latest posts