मेक इन इंडिया को पंख: क्या अडानी-एम्ब्रेयर साझेदारी बदल देगी भारत की एविएशन ताकत?

भारत का नागरिक उड्डयन क्षेत्र इस समय ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। अब तक भारत को दुनिया के सबसे बड़े विमान उपभोक्ता बाजारों में गिना जाता था, लेकिन विमान निर्माण के क्षेत्र में उसकी भूमिका सीमित रही है। ऐसे समय में अडानी ग्रुप और ब्राजील की एयरोस्पेस दिग्गज कंपनी एम्ब्रेयर के बीच प्रस्तावित साझेदारी भारत को केवल विमान उड़ाने वाला देश नहीं, बल्कि विमान बनाने वाला देश बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। यह पहल भारत सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।

 

भारत का तेजी से बढ़ता विमानन बाजार और रणनीतिक आवश्यकता

भारत आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते नागरिक उड्डयन बाजारों में शामिल है। यात्रियों की संख्या, क्षेत्रीय संपर्क योजना (UDAN), नए हवाई अड्डों का निर्माण और एयरलाइनों द्वारा बड़े पैमाने पर विमान ऑर्डर किए जाना-ये सभी संकेत देते हैं कि आने वाले दशकों में भारत का एविएशन सेक्टर और अधिक विस्तार करेगा। भारतीय एयरलाइनों द्वारा 1,800 से अधिक विमानों के ऑर्डर इस बात का प्रमाण हैं कि भविष्य में विमानों की मांग स्थायी रूप से बनी रहेगी।

 

अब तक भारत इस मांग को पूरा करने के लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहा है। एयरबस और बोइंग जैसी विदेशी कंपनियों से विमान खरीदने के कारण न केवल विदेशी मुद्रा का बड़ा बहिर्गमन होता है, बल्कि देश में उच्च तकनीकी निर्माण क्षमता भी विकसित नहीं हो पाती। इसी पृष्ठभूमि में भारत में ही कमर्शियल विमानों के असेंबली और निर्माण की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

अडानी–एम्ब्रेयर समझौता: केवल फैक्ट्री नहीं, पूरा इकोसिस्टम

अडानी एयरोस्पेस एंड डिफेंस और एम्ब्रेयर के बीच हुआ समझौता केवल विमान असेंबल करने तक सीमित नहीं है। दोनों कंपनियों की मंशा भारत में रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (छोटे यात्री विमान) के लिए एक संपूर्ण इकोसिस्टम विकसित करने की है। इसमें विमान निर्माण के साथ-साथ सप्लाई चेन, मेंटेनेंस-रिपेयर-ओवरहॉल (MRO), आफ्टरमार्केट सेवाएं, पायलट प्रशिक्षण और तकनीकी मानव संसाधन का विकास शामिल है।

 

यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विमान उद्योग केवल अंतिम असेंबली से नहीं चलता। इसके लिए हजारों कंपोनेंट्स, उच्च स्तरीय इंजीनियरिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और दीर्घकालिक सपोर्ट सिस्टम की आवश्यकता होती है। यदि यह इकोसिस्टम भारत में विकसित होता है, तो यह देश को वैश्विक एविएशन वैल्यू चेन में एक मजबूत स्थान दिला सकता है।

 

एम्ब्रेयर की भूमिका और भारत के लिए उपयुक्तता

एम्ब्रेयर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी विमान निर्माता कंपनी है और विशेष रूप से रीजनल जेट्स के क्षेत्र में उसकी मजबूत पकड़ है। भारत जैसे विशाल लेकिन विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश के लिए छोटे और मध्यम दूरी के विमान अत्यंत उपयोगी हैं। दूरदराज़ और कम यात्री घनत्व वाले क्षेत्रों को जोड़ने में ऐसे विमानों की भूमिका निर्णायक होती है।

 

एम्ब्रेयर की भारत में पहले से मौजूद उपस्थिति भी इस साझेदारी को व्यवहारिक बनाती है। इसके विमान भारतीय वायु सेना, सरकारी एजेंसियों और क्षेत्रीय एयरलाइनों द्वारा पहले से उपयोग किए जा रहे हैं। इससे तकनीकी परिचय, रखरखाव अनुभव और नियामकीय समझ पहले से उपलब्ध है, जो नई विनिर्माण पहल को गति देने में सहायक होगी।

 

अडानी ग्रुप की औद्योगिक क्षमता और रणनीतिक विस्तार

अडानी ग्रुप पहले ही हवाई अड्डों, रक्षा उत्पादन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। अब विमान निर्माण में प्रवेश उसके औद्योगिक विस्तार की स्वाभाविक अगली कड़ी है। अडानी समूह की वित्तीय क्षमता, परियोजना प्रबंधन अनुभव और सरकार के साथ समन्वय की क्षमता इस परियोजना को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

 

यह साझेदारी यह भी दर्शाती है कि निजी क्षेत्र अब भारत के उच्च-प्रौद्योगिकी रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है, जो पहले मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित था।

 

मेक इन इंडिया’ और रणनीतिक स्वायत्तता

भारत में विमान निर्माण केवल आर्थिक परियोजना नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान, भू-राजनीतिक तनाव और तकनीकी निर्भरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संवेदनशील क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता आवश्यक है। यदि भारत नागरिक विमानों के निर्माण में सक्षम होता है, तो भविष्य में रक्षा और विशेष प्रयोजन विमानों के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

 

इसके अलावा, यह पहल भारत को केवल उपभोक्ता बाजार से आगे बढ़ाकर निर्यातक देश बनाने की क्षमता भी रखती है, विशेषकर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे उभरते बाजारों के लिए।

 

चुनौतियाँ और आगे का रास्ता

हालांकि संभावनाएं बड़ी हैं, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। विमान निर्माण एक अत्यंत पूंजी-सघन, तकनीकी रूप से जटिल और कड़े नियामकीय मानकों वाला उद्योग है। तकनीक हस्तांतरण की वास्तविक गहराई, स्थानीयकरण का स्तर, कुशल मानव संसाधन की उपलब्धता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा-ये सभी कारक परियोजना की सफलता तय करेंगे।

 

इसके अलावा, फैक्ट्री का स्थान, उत्पादन समय-सीमा और साझेदारी की संरचना अभी तय होना बाकी है। इन निर्णयों में देरी परियोजना की गति को प्रभावित कर सकती है।

 

निष्कर्ष:

अडानी–एम्ब्रेयर साझेदारी भारत के विमानन इतिहास में एक संभावित निर्णायक मोड़ है। यदि यह परियोजना योजनानुसार आगे बढ़ती है, तो भारत न केवल अपने बढ़ते विमानन बाजार की जरूरतें घरेलू स्तर पर पूरी कर सकेगा, बल्कि वैश्विक एयरोस्पेस उद्योग में भी अपनी पहचान बना सकता है। यह पहल भारत को “विमान उड़ाने वाले देश” से “विमान बनाने वाले देश” में बदलने की दिशा में एक ठोस कदम है।

 

UPSC प्रीलिम्स प्रश्न

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. एम्ब्रेयर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी विमान निर्माता कंपनी है।
  2. भारत में प्रस्तावित अडानी–एम्ब्रेयर साझेदारी का मुख्य फोकस रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट पर है।
  3. भारत में अब तक निजी क्षेत्र को सैन्य और नागरिक विमान निर्माण की अनुमति नहीं थी।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

 

 

 

UPSC मेन्स प्रश्न

भारत में कमर्शियल विमान निर्माण की दिशा में अडानी–एम्ब्रेयर साझेदारी के महत्व का विश्लेषण कीजिए। यह पहल ‘मेक इन इंडिया’ और भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता को कैसे मजबूत कर सकती है?