₹3,600 करोड़ के घोटाले के बाद अगस्ता वेस्टलैंड की भारत वापसी, आखिर भारत ने क्यों दी हरी झंडी ?

एक दशक तक भारतीय राजनीति में भूचाल लाने वाली इटालियन कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड अब भारत के रक्षा बाजार में दोबारा कदम रखने की तैयारी में है। क्लीन चिट मिलने के पांच वर्ष बाद यह कंपनी फिर से भारतीय रक्षा उद्योग का हिस्सा बनने जा रही है।

 

अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने अगस्ता की मूल कंपनी लियोनार्डो के साथ समझौते को अंतिम रूप दे दिया है। अडाणी समूह की ओर से बताया गया है कि इस साझेदारी की आधिकारिक घोषणा मंगलवार को की जाएगी। गौरतलब है कि लियोनार्डो पहले फिनमैकेनिका नाम से पहचानी जाती थी।

 

क्या था अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला?

यह 3,600 करोड़ रुपए का एक विशाल VVIP हेलिकॉप्टर खरीद घोटाला था। आरोप था कि कंपनी ने 12 एडब्ल्यू-101 हेलिकॉप्टरों की खरीद के लिए भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों और बिचौलियों को करीब 360 करोड़ रुपए की रिश्वत दी थी।

 

2014 में भारत सरकार ने इस सौदे को आधिकारिक तौर पर निरस्त कर दिया और कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। लेकिन पर्याप्त साक्ष्यों की कमी के कारण पहले इटली की न्यायालय ने और बाद में नवंबर 2021 में भारत के रक्षा मंत्रालय ने भी अगस्ता वेस्टलैंड को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।

AgustaWestland returns to India after ₹3600 crore scam

कंपनी की पृष्ठभूमि

अगस्ता वेस्टलैंड की स्थापना जुलाई 2000 में हुई थी और इसका मुख्यालय रोम, इटली में स्थित है। यह कंपनी VVIP, सैन्य और खोज-बचाव हेलिकॉप्टरों का निर्माण करती है। यह यूरोपीय रक्षा समूह फिनमैकेनिका की प्रमुख इकाई रही है।

 

2016 में कंपनी का नाम बदलकर लियोनार्डो हेलिकॉप्टर्स कर दिया गया। इसके कुछ प्रमुख हेलिकॉप्टर मॉडल में AW101, AW139, AW169 और नया AW249 शामिल हैं। यह विश्व की सबसे बड़ी रक्षा ठेकेदार कंपनियों में से एक मानी जाती है।

 

UPA शासनकाल में हुई थी डील

यह सौदा 2010 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के कार्यकाल में इटली की फिनमैकेनिका की सहायक इकाई ‘अगस्ता वेस्टलैंड’ के साथ संपन्न हुआ था। 2013 में इटली की जांच एजेंसियों ने रिश्वत देने के आरोपों की तहकीकात शुरू की।

 

जांच में बिचौलियों की संदिग्ध भूमिका उजागर हुई। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को मामला सौंपा गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सौदे के समय वायु सेना प्रमुख रहे एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी और कुछ अन्य लोगों को जेल की सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा।

 

कितने रुपए का नुकसान हुआ?

सीबीआई ने 2010 में 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टरों की आपूर्ति संबंधी सौदे में सरकारी खजाने को 398.21 मिलियन यूरो यानी लगभग 2,666 करोड़ रुपए के घाटे का आरोप लगाया था।

 

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 2016 में दाखिल अपने आरोप पत्र में दावा किया था कि बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल को अगस्ता वेस्टलैंड से 30 मिलियन यूरो अर्थात करीब 225 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे।

 

न्यायिक प्रक्रिया का सफर

CBI का मामला अदालत में चलता रहा। रक्षा मंत्रालय ने इस केस से संबंधित भारतीय कंपनी डेफसिस प्राइवेट लिमिटेड पर पिछले साल जून में प्रतिबंध की अवधि को और बढ़ा दिया था। हालांकि, दिल्ली उच्च न्यायालय ने रक्षा मंत्रालय के इस आदेश को रद्द कर दिया।

 

बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस कंपनी के विरुद्ध केंद्र की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नए सबूतों के अभाव में प्रतिबंध को बढ़ाना उचित नहीं है।

 

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

6 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने घोटाले में आरोपी वकील गौतम खेतान की याचिका को खारिज कर दिया। खेतान ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की एक धारा को चुनौती दी थी।

 

न्यायालय ने इसे मुकदमे से बचने का प्रयास बताया और कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा – “यह एक नया चलन बन गया है कि धनी आरोपी मुकदमे का सामना करने के बजाय कानून की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने लगते हैं।”

 

सेना की जरूरतों का सवाल

सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्रों में तैनात सैनिकों को रसद पहुंचाने के लिए हेलिकॉप्टरों की अत्यधिक आवश्यकता है। रक्षा मंत्रालय ने थल सेना के लिए 120 और वायु सेना के लिए 80 हेलिकॉप्टरों की खरीद को मंजूरी दी थी।

 

इससे पहले, जनवरी 2014 में सौदे के तहत तीन हेलिकॉप्टरों की आपूर्ति हो चुकी थी, लेकिन न्यायालय मामले के कारण उन्हें बोरों में लपेटकर भंडारण में रख दिया गया था।

 

कंपनी की वापसी के निहितार्थ

अगस्ता वेस्टलैंड की भारत में पुनः प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। एक ओर जहां भारत को अत्याधुनिक हेलिकॉप्टर तकनीक की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर अतीत के विवादों की छाया अभी भी मौजूद है।

 

अडाणी समूह के साथ साझेदारी से यह कंपनी भारतीय रक्षा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह सहयोग पूर्व की तरह विवादों में घिरता है या यह बार पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ आगे बढ़ता है।

 

निष्कर्ष:

अगस्ता वेस्टलैंड प्रकरण भारतीय रक्षा खरीद प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है। जबकि कंपनी को कानूनी रूप से क्लीन चिट मिल चुकी है, इसकी वापसी पर नजरें टिकी रहेंगी। भारतीय रक्षा क्षेत्र को उन्नत तकनीक की जरूरत है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि भविष्य में ऐसे घोटाले न हों। अडाणी-लियोनार्डो साझेदारी इस दिशा में एक नया अध्याय खोलने जा रही है, जिसकी सफलता पारदर्शिता और निष्पक्षता पर निर्भर करेगी।